एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री परिवार शाखा रांची युगतीर्थ शक्तिपीठ सेक्टर टू परिसर में आज गुरुवार महिला मंडल सत्संग में गायत्री महामंत्र जप, लेखन का अनुष्ठान, भजन और अखंड ज्योति मासिक पत्रिका का स्वाध्याय हुआ। विषयगत स्वाध्याय पाठ में दीदी ने बताया कि हम विकास के चरम पर हैं, फिर भी वैश्विक संकट के एक नये दौर से गुजर रहे हैं।
तकनीकी विकास में पूरा विश्व एक गाँव के रूप में तब्दील हो गया है। फिर भी लोगो के दिलों के बीच की दूरिया बढ़ रही हैं।भयंकर घृणा, विद्वेष, संघर्ष, हिंसात्मक, युद्धात्मक रूप बन रहा है। ऐसे में आपसी सद्भाव, विश्वास और मानवीय मूल्यों की आवश्यकता व अपेक्षा है, जो पहले से कहीं अधिक आन पड़ी है।
इस विषय पर चर्चा हुई कि यहाँ भारतीय संस्कृति की महत्ता अधिक प्रासंगिक हो जाती है, जो सार्वभौम स्वरूप एवं शाश्वत मूल्यों के आधार पर विश्व संस्कृति की भूमिका में अपना योगदान दे सकती है। इस पर महर्षि अरविंद के शब्दों में बताया गया कि आध्यात्मिकता भारतीय संस्कृति को समझने की कुंजी है, जो इसे अन्य संस्कृतियों से अलग करती है।
आत्मा-परमात्मा पर जितना चिंतन यहाँ पर हुआ है, उतना शायद ही अन्यत्र कहीं हुआ हो।आगे श्रीअरविंद लिखते हैं कि भारतीय सभ्यता में धर्म द्वारा क्रियाशील हुआ दर्शन और दर्शन द्वारा आलोकित हुआ धर्म ही नेतृत्व करते आये हैं। भारतीय संस्कृति आरंभ से ही एक आध्यात्मिक एवं अंतर्मुखी धार्मिक व दार्शनिक संस्कृति रही है। इसकी
व्यापकता व समग्रता भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
जीवन के समग्र परिष्कार, समाज के बहुमुखी विकास, चेतना के उत्तम उत्कर्ष का जो चिन्तन यहाँ मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसकी सर्वोच्चता, श्रेष्ठता में निहित शाश्वत व चिरस्थायी मूल्य में आतमवत् सर्वभूतेषु और वसुधैव कुटुंबकम् जैसे उदात्त जीवन दर्शन को संभव बनाते हैं। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक जय नारायण प्रसाद ने दी।
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