एबीएन सोशल डेस्क। यज्ञ परमार्थ प्रयोजन के लिए किया गया एक उच्चस्तरीय पुरुषार्थ है। श्रद्धेया शशिकिरण बहिन द्वारा राँची गायत्री युगतीर्थ शक्तिपीठ सेक्टर टू में महिला मंडल सत्संग स्वाध्याय में यज्ञीय जीवन, उसका क्रम, उसका यज्ञीय वातावरण विस्तार, भावार्थ व व्याखात्मक विश्लेषण पर प्रकाश डाला।
उन्होंने गुरुवरश्री के लेखनी के अनुसार बताया कि यज्ञ शब्द के अर्थ को समझाते हुए परमपूज्य गुरुदेव समग्र जीवन को यज्ञमय बना लेने को ही वास्तविक यज्ञ कहते हैं। यज्ञ शब्द मात्र स्वाहा मंत्रों के माध्यम से आहुति दिये जाने के परिप्रेक्ष्य में नहीं समझा जाना चाहिए, यह स्पष्ट करते हुए उनने इसमें लिखा है कि यज्ञीय जीवन से हमारा आशय है - परिष्कृत देवोपम व्यक्तित्व। वास्तविक देव पूजन यही है कि व्यक्ति अपने अंतःकरण में निहित देव शक्तियों को यथोचित सम्मान देते हुए उन्हें निरन्तर बढ़ाता चले।
महायज्ञैश्च, यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः उक्ति के अनुसार सर्वश्रेष्ठ यज्ञ वह है, जिसमें व्यक्ति ब्रह्ममय व ब्राह्मणत्व भरा देवोपम जीवन जीते हुए स्वयं को अपने तन, मन, अंतःकरण को परिष्कृत करता हुआ चला जाता है। यज्ञ परमार्थ प्रयोजन के लिए किया गया एक उच्चस्तरीय पुरुषार्थ है। मानव जीवन में अंतरस्तल में, भावनाओं में यदि सत्प्रवृत्ति का समावेश होता चला जाय तो यही वास्तविक यज्ञ है।
युग ऋषि ने यज्ञ के भावार्थ में कहते हैं कि यज् धातु से बना यज्ञ शब्द देवपूजन, दान व परमार्थ के बाद तीसरे अंतिम अर्थ संगतिकरण सज्जनों के संगठन, राष्ट्र को समर्थ सशक्त बनाने वाली सत्ताओं के एकीकरण के अर्थ में परिभाषित करता है।
चौबीस अवतारों में एक अवतार यज्ञ भगवान भी है। यज्ञ हमारी संस्कृति का आराध्य इष्ट रहा है तथा यज्ञ के बिना हमारे किसी दैनन्दिन् क्रिया कलाप की कल्पना तक नहीं की जा सकती। आगे बताया कि यज्ञ का विज्ञान पक्ष समझाते हुए पूज्यवर ने बताया है कि सारी सृष्टि की सुव्यवस्था बनाये रखने के लिए यज्ञ प्रक्रिया बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।
संचालन को सुस्थिर बनाये रखने वाली शक्तियों का पारस्परिक संतुलन।
यज्ञ एक प्रकार का टैक्स है, कर है देव-सत्ताओं के प्रति इसे न देने पर जैसे :- राज्य प्रशासन, जन समुदाय को दण्डित करता है, उसी प्रकार विभीषिकाएँ भिन्न-भिन्न रूपों में आकर सारी जगती पर अपना प्रकोप मचा देती हैं।
अपने इस प्रतिपादन की पुष्टि में परमपूज्य गुरुदेव ने यज्ञ की महिमा का वेदों में, उपनिषदों में, गीता में, रामायण में, श्रीमद्भागवत में, महाभारत में, पुराणों में, गुरु ग्रन्थ साहब आदि में कहाँ-कहाँ किस प्रकार वर्णन किया गया है- यह प्रमाण सहित विस्तार से अपने वांग्मय में दिया है। यज्ञ मात्र समस्त कामनाओं की पूर्ति का ही मार्ग नहीं है।
यज्ञोऽयं सर्वकामधुक् अपितु जीवन जीने की एक श्रेष्ठतम विज्ञानसम्मत पद्धति है।
यज्ञ का भावार्थ है- परमार्थ, उदार कृत्य।संस्कृति की यज् धातु से यज्ञ शब्द बना है, जिसके तीन अर्थ होते हैं- (१) देवत्त्व, (२) दानकरण, (३) संगठन। इन तीनों ही प्रवृत्तियों को व्यक्ति और समाज के उत्कर्ष की दिव्य धारायें कहा जा सकता है।
देवत्त्व का अर्थ है- परिष्कृत व्यक्तित्त्व, दैवी सद्गुण।संगठन अर्थात् एकता, सहकारिता, संघबद्धता। दान अर्थात् समाज परायणता, विश्व कौटुम्बिकता, उदार सहृदयता। इन तीन प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्त्व यज्ञ करता है।
यज्ञ अभियान में सद्भावनाओं को सत्कर्मों के रूप में परिणत करने की प्रेरणा है। इनमें गायत्री और यज्ञ के सिद्धान्तों को झाँकते हुए देखा जा सकता है।
संक्षेप में यज्ञदर्शन-व्यक्तिगत जीवन में चरित्रनिष्ठा और लोक व्यवहार में समाज निष्ठा के आदर्श को अपनाये जाने की प्रेरणा देता है। व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति और सुख-शान्ति का यही एक महत्वपूर्ण मार्ग है। उक्त जानकारी जय नारायण प्रसाद वरिष्ठ-साधक, रांची जिला समन्वयक ने दी।
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