टीम एबीएन, रांची। पूर्व केंद्रीय मंत्री और बड़े आदिवासी नेता अर्जुन मुंडा की हार से भाजपा का नेतृत्व चिंतित है। अर्जुन मुंडा के राजनीतिक भविष्य और उनकी भूमिका को लेकर भाजपा में मंथन शुरू हो गया है। अर्जुन मुंडा का कहां किस स्तर पर उपयोग किया जाए इस पर विचार विमर्श चल रहा है। झारखंड में इसी साल के अंत में विधानसभा का चुनाव भी होना है। इसलिए अर्जुन मुंडा के दायित्व को लेकर चिंता बढ़ गयी है। पार्टी में रांची से लेकर दिल्ली तक हलचल है।
सूत्र बताते हैं कि फिलहाल अर्जुन मुंडा को केंद्रीय संगठन में शामिल किया जायेगा। उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिलेगी। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल 30 जून को समाप्त हो रहा है। भाजपा में नये अध्यक्ष पर मंथन तेज है। जल्दी घोषणा की जायेगी। नयी टीम में अर्जुन मुंडा को शामिल किये जाने की संभावना है।
झारखंड से अभी केंद्रीय टीम में कोई नेता नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास उपाध्यक्ष और आशा लकड़ा सचिव थी। रघुवर दास ओडिशा के राज्यपाल बना दिये गये और आशा लकड़ा अनुसूचित जनजाति आयोग में सदस्य हैं। ऐसे में अर्जुन मुंडा को महासचिव या उपाध्यक्ष का दायित्व दिया जा सकता है।
अर्जुन मुंडा खूंटी से चुनाव हार चुके हैं। लेकिन भाजपा नेतृत्व ने जिस तरह से राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नया प्रयोग करते हुए अधिकांश बड़े व कद्दावर नेताओं को विधानसभा चुनाव में उतारा था। इसी तरह अर्जुन मुंडा को भी विधानसभा चुनाव लड़ाया जा सकता है।
हालांकि इस संबंध में पक्के तौर पर कुछ कहना जल्दबाजी होगी। अर्जुन मुंडा पर निर्भर करता है कि वह खुद चुनाव लड़ेंगे या किसी को अपनी सीट खरसावां से मैदान में उतारेंगे। अर्जुन मुंडा को लेकर केंद्रीय नेतृत्व इसलिए भी चिंतित है कि वह नहीं चाहता है कि झारखंड में पार्टी गुटों में बटी रहे। भाजपा नेतृत्व ने बाबूलाल मरांडी के हाथों में पार्टी की कमान सौंप कर उन्हें खुली छूट दे रखी है।
मरांडी को किसी बड़े नेता से चुनौती न मिले इसी उद्देश्य से पार्टी के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को ओडिशा का राज्यपाल बना राज्य की राजनीति से अलग कर दिया गया। रघुवर दास की विदाई के बाद उनका गुट खुद समाप्त होगा। रघुवर दास की अच्छी पैठ रहने के बावजूद राज्य की राजनीति से उन्हें अलग कर दिया गया।
अर्जुन मुंडा को लेकर केंद्रीय नेतृत्व की चिंता इसलिए भी अधिक है कि अर्जुन मुंडा भी आदिवासी समुदाय से आते हैं और बड़े नेता हैं। कार्यकर्ताओं में अभी सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। और उनको चाहने वाले अधिक हैं। ऐसे में यदि वह राज्य की राजनीति में सक्रिय रहेंगे तो बाबूलाल मरांडी के लिए चुनौती पैदा करेंगे।
बाबूलाल को यदि फ्री हैंड देना हैं तो अर्जुन मुंडा को केंद्रीय टीम में रखना होगा नहीं तो फिर बाबूलाल मरांडी की परेशानी बढ़ जायेगी। राज्य में राजनीति के दो केंद्र बन जायेंगे बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा। ऐसे में अधिक समर्थन अर्जुन मुंडा को मिलना तय है। हालांकि यह भी सच है कि बाबूलाल मरांडी भी आदिवासी वोटरों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है।
सूत्र बताते हैं कि अर्जुन मुंडा को यह आभास था कि खूंटी से चुनाव जीतना मुश्किल है। इसलिए वह लोकसभा के बजाय राज्यसभा की सीट चाहते थे। जिस सीट से प्रदीप वर्मा चुने गये उस पर मुंडा की नजर थी। लेकिन पीएम मोदी ने साफ कर दिया था कि पार्टी के सभी बड़े नेता इस बार लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। इसलिए अर्जुन मुंडा को न चाहते हुए भी चुनाव लड़ना पड़ा और परिणाम सबके सामने है। अर्जुन मुंडा को लेकर पार्टी की दुविधा बढ़ गयी है।
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