ओडिशा में भाजपा की प्रचंड जीत शोध का विषय

 

मुरलीधर

एबीएन सेंट्रल डेस्क। उड़िसा में लोस, विस में भाजपा की प्रचंड जीत राजनीतिक पंडितों के लिये शोध का विषय है। भाजपा ने इन लोकसभा चुनावों में उड़िसा में अप्रत्याशित सफलता प्राप्त की है। एक ऐसे राज्य में जहां बीजद के शोर में किसी और दल की उपस्थिति न दिखती हो वहां चुपचाप बिना किसी करंट के दिखे भाजपा ने 21 में से 19 सीटें जीत ली। 

यह एक प्रकार से यूपी में हुई क्षति की अच्छी खासी भरपाई भी है और भाजपा का चुपचाप उड़िसा में तख्तापलट सा प्रदर्शन है। हमें यह भी याद रखना होगा कि उड़िसा से धर्मेंद्र प्रधान और संबित पात्रा प्रधान के अलावा कोई और परिचित भाजपाई चेहरा तक नहीं दिखता। फिर भी बिना शोर या किसी नायक के भाजपा ने उड़िसा लोक सभा और विधानसभा कैसे विजित किया? 

यह राजनीतिक विश्लेषकों, पंडितों और एग्जिट पोल वालों के लिए भी शोध का विषय है।भाजपा की जीत अप्रत्याशित क्यों है इसे जानने के लिये उड़िसा, बीजद और नवीन पटनायक के अतीत को देखना होगा। 4 जून से पहले उड़िसा के पूर्व सीएम नवीन बाबू सदैव अपराजेय लगते थे। मेरा भी मानना था कि उड़िसा में बीजू जनता दल को कहीं से कोई चुनौती नहीं है। एक दूसरा तथ्य भी जुड़ा रहा कि उड़िसा में नवीन बाबू भारतीय राजनीति में अजातशत्रु सी छवि के साथ रहे हैं। 

मुझे याद है भाजपा कभी भी उनके खिलाफ आक्रामक नहीं रही और नवीन पटनायक को अघोषित रूप से एनडीए का साथी मानती रही, वहीं यूपीए के भी किसी पार्टी ने उनके खिलाफ कोई तल्खी या विरोधी रूख नहीं दिखाया। सिर्फ इन चुनावों में भाजपा और पीएम मोदी ने उनपर कुछ विरोधी बयानबाजी की। जैसे पीएम मोदी का ये कहना कि नवीन पटनायक अस्वस्थ हैं वो सीएम की कुर्सी और बीजद की कमान संभालने की स्थिति में नहीं हैं। किसी ने कहा कि वो अपना उत्तराधिकारी किसे बनायेंगे? एक ब्यूरोक्रेट को जो उनका करीबी और विश्वासपात्र है? नवीन पटनायक पर ये सारे हमले चुनावी थे, इनमें वास्तव में नवीन पटनायक के प्रति कोई खास नाराजगी या दुर्भावना नहीं थी।

दो साल पहले मैं भुवनेश्वर में था। वहां एक लोकल टैक्सी ड्राइवर ने बातचीत में कहा कि जब तक नवीन पटनायक  स्वस्थ हैं तब तक वही उड़िसा के सीएम रहेंगे और किसी पार्टी के लिये कोई चांस नहीं। उस उड़िया ड्राइवर का ये भी कहना था कि नवीन बाबू सीएम रहने का हर रिकार्ड तोड़ देंगे।

नवीन पटनायक संयोग से राजनीति में आये थे और दुर्घटनावश उड़िसा के सीएम बने और रिकार्ड बार सीएम बनते रहे। वर्ष 2000 में वह अपने पिता बीजू पटनायक की मृत्यु के बाद अचानक बीजद पार्टी के उत्तराधिकारी के तौर पर विदेश से उड़िसा अवतरित हुए। पार्टी नेताओं के कहने पर बागडोर संभाला और जन समर्थन से वह चुनाव जीत सीएम बने। तब वह उड़िया भी नहीं बोल पाते थे।

आम उड़िया जन से जमीनी जुड़ाव उनका नहीं हो पाता था। फिर भी पहली बार जीतने पर जनता से वादा किया कि मैं अगली बार उड़िया सीख कर आऊंगा और आप लोगों से मधुर सुंदर उड़िया में बात करूंगा। मुझे नहीं पता था नवीन बाबू उड़िया सीख पाये या नहीं? मैंने उन्हें हमेशा दबी और धीमी आवाज में अंग्रेजी बोलते ही सुना है। फिर भी वह 24 साल तक सीएम बने रहे।

अपने पिता बीजू पटनायक  के उलट हैं नवीन पटनायक

उड़िसा उन एक दो राज्यों में है जहां लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव भी होते हैं। नवीन पटनायक कम बोलने वाले और अप्रिय या विवादास्पद बयानों से दूरी रखने वाले व्यक्ति हैं। दस साल पहले जब नवीन पटनायक एक बार फिर से विस चुनाव जीत कर सीएम बने और राजदीप सरदेसाई उन्हें बधाई देते हुते कुछ सवाल पूछ रहे थे, पर नवीन बाबू भावहीन चेहरे से यंत्रवत जवाब दे रहे थे।

तब राजदीप ने उन्हें टोका और कहा कि नवीन बाबू आज आप तीसरी बार सीएम बने हैं अरे अब थोड़ा तो मुस्कुराइये और जवाब दीजिये? तब जाकर नवीन पटनायक कुछ सेकेंड के लिए चेहरे पर मुस्कुराहट ला पाये थे, अन्यथा नवीन बाबू आये हरख न गये विसाद वाले व्यक्ति हैं। आज हार भी गये तो न कोई बयान न कोई दुख या अफसोस पूर्ववत भावहीन हैं नवीन बाबू। वहीं उनके पायलट पिता बीजू पटनायक एक मुखर और वाचाल राजनेता थे। वह चुनाव हारने पर पुरी जाकर भगवान जगन्नाथ से भी लड़ आते थे।

एक बार बीजू चुनाव हारे तो पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ से तल्खी में पूछ रहे थे कि आखिर ऐसा क्यों हुआ मैं चुनाव कैसे हार गया, कहां गलती थी मेरी? एक बार बीजू पटनायक को किसी बेरोजगार युवक ने थप्पड़ मार दिया तो बीजू ने भी पलट कर थप्पड़ दे मारा। इन वाक्यों को देखें तो नवीन पटनायक बिल्कुल शांत सौम्य मुख्यमंत्री रहे।

आज इंजीनियरिंग प्रबंधन की उत्कृष्ट पढ़ाई के लिए बिहार, झारखंड, बंगाल का छात्र उड़िसा का रुख करते हैं। पुरी और भुवनेश्वर में पेयजल की व्यवस्था ऐसी कि आप कहीं भी नल से पानी लेकर पी सकते हैं। जब केंद्र सरकार ने वाहनों के कागजात को अप-टू-डेट रखने या कार्रवाई का फरमान जारी किया तो नवीन पटनायक ने उड़िसा की जनता को तीन महीने का समय दिया था ताकि सभी लोग अपने वाहन के कागजात दुरूस्त करवा सकें।

नवीन पटनायक के मुख्यमंत्रित्व में उड़िसा बहुत कम मौकों पर किसी गलत वाकये की वजह से चर्चा में आया। अमूमन उड़िसा को एक शांत राज्य माना जाता है। ओलंपिक खेलों में दशकों बाद हॉकी में कांस्य पदक जीतने वाली हमारी टीम को जब कोई प्रायोजक नहीं मिला, तो नवीन पटनायक ने उड़िसा सरकार के माध्यम से पूरा खर्च उठाया था।  

बेशक नवीन पटनायक दशकों तक उड़िसा के एक सफल मुख्यमंत्री रहे। उनके खिलाफ इस बार कोई हवा या अंडरकरंट नहीं दिख रहा था, यहां न तमिलनाडू के तरह यहां कोई अन्नामलाई थे न बंगाल की तरह शुभेंदू फिर भी भाजपा के हाथों बीजू जनता दल का सूपड़ा साफ होना और विधानसभा में प्रचंडता से भाजपा का बहुमत प्राप्त करना एक आश्चर्यजनक राजनीतिक घटना है।

तीन साल पहले मैं पुरी में समुद्र तट पर घूम रहा था। तभी एकाएक वहां पुलिस आयी और लाउडस्पीकर पर चेतावनी देकर समुद्र तट पर दुकान सजाये छोटे-छोटे  दुकानदारों को भगाने लगी। दुकानदारों ने विरोध किया तो पुलिस जब्ती और सख्ती पर उतर आयी। तब सैकड़ों दुकानदार तट स्थित मुख्य सड़क पर ही बैठ कर धरना देने लगे और सड़क को जाम कर दिया। पुलिस देखती रही।

संभव है वैसे छोटे-छोटे आक्रोश बड़े होते गये और भाजपा ने चुपचाप भुना लिया या फिर ये मान लिया जाये कि एक अच्छे कर्मठ पर भावहीन चेहरे वाले सीएम से उड़िया जन का मन भर गया और सिर्फ इसी आधार पर उन्हें जनता ने हरा दिया और भाजपाई सीएम मोहन मांझी के लिए वोट किया? जवाब अनुत्तरित हैं। जवाब  श्री जगन्नाथ ही जानें...।

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