झारखंड भाजपा की चांडाल चौकड़ी

 

टीम एबीएन, रांची। झारखंड में सिर्फ दो तरह के लोग रहते हैं। पहला, जिन्हें झारखंड से प्यार है और दूसरे, जो झारखंड में सिर्फ माल बटोरने आते हैं। 

झारखंड का दायित्व संभालने आये कुछ लोगों को ही देखिये न, जब आते हैं तो सिर्फ कुर्ता- पैजामा और दीन हीन अवस्था, चेहरे से गरीबी और विनम्रता। लेकिन जब जाते हैं तो भौकाल टाईट। हाथ में महंगी घड़ी, महंगी गाड़ियां, बैंक बैलेंस, अपने राज्य में कई जगहों पर प्लॉट और कभी- कभी कमर्शियल कॉम्प्लेक्स। 

कुछ दिन तो गुजारो झारखंड में...

जाहिर है, ये सब झारखंड में कुछ दिन गुजारने का ही परिणाम है। फिलहाल तो मीडिया में चारों ओर चर्चा थार गाड़ी की है। कई लोग रीडो घड़ी की भी बातें कर रहे हैं।। तो कुछ टिकट के नाम पर एडवांस पेमेंट की...

यहां भी हनी और ट्रैप दोनों है, पर वो गुजरे जमाने की बात है, अपने गृह प्रदेश की, लेकिन कुछ लोग पुरानी चीजों को भी सहेज कर रखते हैं। पता नहीं क्यों? 

वाह! क्या संस्कार हैं। पंडित दीनदयाल उपाध्याय होते तो दौड़कर गले लगा लेते।  मेरे छुपे हुए कोहिनूर, कहां थे अबतक?
तो कहानी ये है कि भाई साहब ने बयाना एडवांस में उठा लिया। शादी का सट्टा जानते हैं ना, यहां पर इसे विधानसभा का एडवांस बुकिंग समझ लीजिए। 

टिकट दिला दूंगा, इस नाम पर कई जगहों से एडवांस ले चुके हैं।  

एडवांस तो लोकसभा चुनाव के लिए भी था। पर काम नहीं करवा सके। एडवांस की रकम में से थार तो चली गईं गृह प्रदेश... अब वो तो वापस हो नहीं सकती, कम से कम पैसे तो दे देते। अब जिसने दिया, वो छटपटा रहे थे, पता नहीं पैसे वापस मिले या नहीं, पूछ कर बताना पड़ेगा। 

भाई साहब की कहानी इतने पर ही खत्म नहीं होती।

यूपी के दो छोरे का जलवा राहुल गांधी-अखिलेश यादव तक ही नहीं है, बल्कि यहां तक आ पहुंची है।

तू मुझे खुजा, मैं तुझे खुजाऊं 
मेरे दिलबर जानी...
कौन है वो, कैसी है वो 
तेरे सपनो की रानी...

दोनों छोरे एक दूसरे की हर मुमकिन मदद करते हैं । और तो और माल कहां से बटोरा जा सकता है, उसमें भी एक दूसरे के सीक्रेट पार्टनर हैं।

इसी लोक सभा चुनाव में पता करवा लीजिए न, कोल्हान से लेकर संथाल तक जलवा-जलवा, बस तेरा जलवा गाने की गूंज थी। 
एक कैंडिडेट ने तो झुंझलाकर बहस भी कर लिया, कहां से लाऊं इतना पैसा", "किस बात के लिए दूं पैसा ...

जिलाध्यक्षों की हालत तो पूछिये मत। पर सफलता के रास्ते में ये सब थोड़ा बहुत चलता रहता है। 

बैठकों में खुलेआम कहते हैं कि झारखंड के कुछ दो कौड़ी के पत्रकार बिना तथ्य के कुछ भी लिखते हैं, उन्हें फॉलो या लाइक किया तो संगठन के कार्यकर्ताओं की खैर नहीं
जब पत्रकार दो कौड़ी का हो, और वो तथ्यहीन बातें करता है तो फिर रिएक्ट क्या करना? कम से कम पद के बराबर कद तो होना ही चाहिए 

वैसे भी बेईमान को ज्यादा डर लगता है, ईमानदार निडर और  निश्चिंत रहता है। 
भाई साहब के कारनामों की पुरी कुंडली, फाइल बनाकर ऊपर पहुंच चुकी है। मैंने नहीं, पार्टी के लोगों ने ही पहुंचायी है। 
जो होना है, वो तो होगा ही। 
बस वक्त का इंतजार है...
नमस्ते सदा वत्सले...
(वरिष्ठ पत्रकार पंकज प्रसून के फेसबुक वॉल से साभार)

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