एबीएन हेल्थ डेस्क। षट्कर्म शब्द की उत्पत्ति षट् और कर्म इन दो शब्दों के मेल से हुई है। इनमें षट् का अर्थ है छः (6) और कर्म का अर्थ है कार्य । इस प्रकार षट्कर्म का अर्थ हुआ छः कार्य। हां पर षट्कर्म का अर्थ ऐसे छः विशेष कर्मों से है जिनके द्वारा शरीर की शुद्धि होती है।
हठयोग में इन छः प्रकार के शुद्धि कर्मों को षट्कर्म कहते हैं। इन्हें अंग्रेजी में सिक्स बॉडी क्लींजिंग प्रोसेस कहा जाता है। योगाचार्य महेश पाल विस्तार पूर्वक बताते हैं कि महर्षि घेरण्ड ने छः षट्कर्मों को घेरण्ड संहिता में सप्तांग योग (घटस्थ योग) के पहले अंग के रूप में वर्णित किया है।
उनका मानना है कि बिना षट्कर्म के अभ्यास के कोई भी साधक योग मार्ग में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । सबसे पहले शरीर की शुद्धि आवश्यक है। बिना शरीर की शुद्धि के योग के अन्य अंगों के पालन में साधक को आगे बढ़ने में कठिनाई होती है। इसलिए महर्षि घेरण्ड ने षट्कर्म को योग के पहले अंग के रूप में स्वीकार किया है।
स्वामी स्वात्माराम ने हठप्रदीपिका में षट्कर्म का वर्णन करते हुए कहा है कि जिन साधको के शरीर में चर्बी ( मोटापा ) और कफ अधिक है उन साधको को पहले षट्कर्मों का अभ्यास करना चाहिए। जिनमें चर्बी व मोटापा नहीं है उन योग साधकों को षट्कर्मों की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार स्वामी स्वात्माराम ने केवल चर्बी व कफ की अधिकता वालों के लिए ही षट्कर्म करने का उपदेश दिया है ।
मुख्य रूप से यह छह कर्मों द्वारा बॉडी को डिटॉक्स किया जाता है जिनमें, धौति, बस्ति, नेति,त्राटक लौलिकी( नौलि),कपालभाति शामिल हैं धौति क्रिया से पाचनतंत्र एवं आहार नलिका की सफाई होती है और कब्ज, अपच, अम्लता ( एसिडिटी ) व कफ रोग ठीक होते हैं, वस्ति क्रिया से उत्सर्जन तंत्र व बड़ी आँत की सफाई होती है।
कब्ज, बवासीर, भगन्दर , प्लीहा, वायु गोला, वात, पित्त व कफ से उत्पन्न रोग समाप्त होते हैं, नेति क्रिया से आँख, नाक व गले से सम्बंधित बीमारियों को ठीक होती है, नौलि क्रिया को लोकिकी भी कहा जाता है । यह उदर ( पेट ) से सम्बंधित रोगों के लिए उपयोगी होती है, त्राटक क्रिया से हमारी आँखों की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं जिससे हमारे आँखों के रोग दूर होते हैं।
कपालभाति क्रिया मस्तिष्क सम्बंधित रोगों के लिए बहुत ही लाभकारी होती है । इससे हमारे श्वसनतंत्र की शुद्धि होती है ।षट्कर्मों की हमारे जीवन में बहुत उपयोगिता है इनके अभ्यास से हमारे सारे शरीर की शुद्धि होती है ।षट्कर्म का अभ्यास करने से पहले हमें कुछ सावधानी बरतनी चाहिए षट्कर्मों के अभ्यास से पूर्व साधक को अपने आहार की शुद्धि रखनी चाहिए ।
साधक को केवल पथ्य (सात्विक) आहार ही ग्रहण करना चाहिए। किसी भी प्रकार का तामसिक भोजन नहीं लेना चाहिए । आहार का योग साधना में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। किसी बीमारी या रोग की अवस्था में पहले चिकित्सक से सुझाव लेना आवश्यक है । उसके बाद ही आप षट्कर्मों का अभ्यास करें षट्कर्मों के अभ्यास की शुरुआत अकेले ही घर पर नहीं करनी चाहिए,इसके लिए विधिवत रूप से योग केन्द्र पर जाकर, योग गुरु से ही इनका प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए।
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