एबीएन एडिटोरियल डेस्क। लोकसभा चुनाव रूझानों के अनुसार राजग की सरकार तीसरी बार बनती दिख रही है। सभी पूर्व सर्वेक्षणों से अलग कांग्रेसनीत गठबंधन को भी बेहतर सफलता मिली है लेकिन पूर्ण बहुमत से दूर हैं। भाजपा को अकेले बहुमत नहीं मिला। नीतिश कुमार और चंद्रबाबू नायडू सहित अन्य के सहयोग से ही उन्हें सरकार चलानी होगी।
भाजपा को मध्य प्रदेश, दिल्ली, गुजरात और ओड़िसा में बेहतरीन सफलता मिली। ओड़िसा जहां राज्य के विधानसभा के चुनाव भी हुए थे, वहां राज्य विधानसभा में पहली बार भाजपा सरकार बन रही है और 24 साल तक चली पटनायक सरकार का अंत हो गया है। साथ ही आंध्र प्रदेश में भी टीडीपी के साथ राज्य के चुनाव में उसे सफलता मिली है।
इस प्रकार भाजपा दो राज्यों में अपनी सरकार बनाने में सफल हो गयी है। वहीं उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में भाजपा को उम्मीद से अधिक हार का सामना करना पड़ा, जिससे पार्टी का पुराना जनादेश 303 सीट को दोहराया नहीं जा सका। भाजपा 240 सीटों के आसपास सिमट गयी है। वहीं कांग्रेस को भी 99 के आसपास सीटें मिल रही है।
विगत दस साल से सरकार में रही भाजपा ने हिंदी पट्टी में रोजगार और रियायत पर अपने विचार स्पष्ट नहीं किये, जिससे युवाओं और मध्यम निम्न वर्ग का आक्रोश पार्टी को झेलना पड़ा। सबसे बड़ी बात पीएम मोदी का वाराणसी से मात्र डेढ़ लाख वोट से जीतना यह संकेत देता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की नीतियों को लेकर आम लोगों में उत्साह नहीं था। देश के चुनाव परिणाम को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे थे।
पांच साल बाद हुए इस चुनाव में कोई ठोस मुद्दा तो नहीं था, लेकिन विपक्ष ने संविधान बचाने और सत्ता पक्ष ने इसे हिंदू-मुस्लिम आरक्षण सहित दर्जनों मुद्दों के बीच अपनी जीत सुनिश्चत करने का प्रयास किया। भारतीय लोकतंत्र की यही शोभा है कि आम जनता अपने मत से सत्ता के उन सभी अनुमानों को ध्वस्त करती है जो कुछ क्षेत्र या सीमित चिंतन और समझ के माध्यम से बनाये जाते हैं। देश का आम आदमी अगर निराश हो तो सत्ता का इसका दंश झेलना ही पड़ता है।
चाहे भाजपा हो या कांग्रेस दोनों को इस चुनाव के परिणाम से सबक लेना चाहिए। आम जन को लुभाकर कोई निश्चित परिणाम हासिल नहीं किया जा सकता है। देश के लोकतंत्र में कल्याणकारी सरकार की अवधारणा है जिसमें 100 करोड़ लोगों और 25 करोड़ परिवार गांवों में 10 हजार रुपये और शहरों में अधिकतम 30 हजार रुपये से अपने परिवार का भरण पोषण करता है।
इन परिवारों पर चाहे पेट्रोलियम पदार्थ के अधिकतम मूल्य हो या टोल टैक्स, चाहे परोक्ष जीएसटी का उच्च दर हो या फिर दर्जनों प्रकार के विविध शुल्क इन सब से वो परेशान होता है। कोरोना के दो-दो लॉकडाउन से त्रस्त आमलोंगों के इस चुनाव में वृद्ध जनों की रेल रियायत खत्म करने वाली सरकार को पूर्ण बहुमत मिलना कठिन था।
मंगलवार, 4 जून को उनकी वेल्थ लगभग 31 लाख करोड़ कम हो गयी। बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का ओवरआल मार्केट कैप 395 लाख करोड़ रुपये हो गया। एक दिन पहले यह लगभग 426 लाख करोड़ था। यह मंगल वित्त बाजार के लिए, उद्यागपतियों के लिए और भाजपा के लिए अमंगल साबित हुआ।
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