एबीएन सेंट्रल डेस्क। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें अत्यंत तीखी होने के चलते वातावरण के तापमान को बढ़ा देती है जिसके परिणाम स्वरूप द्रव्यों से जल का अंश धीरे-धीरे कम होने लगता है। चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, चार महीनों यानी अप्रैल, मई, जून और जुलाई में व्यक्ति को खान -पान, रहन -सहन में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। विश्व के 245 शहरों के आंकड़े हैं कि हीट वेव के कारण प्रतिवर्ष 12000 लोगों की जान चली जाती है। भारत में हीटवेव के संदर्भ में 640 जिलों में से 10 बहुत अधिक और 97 बहुत जोखिम वाले जिलों की श्रेणी में आते हैं।
शोध से ज्ञात हुआ कि तापमान में सामान्य से 10 डिग्री फारेनहाइट की बढ़त से हृदय रोग, स्ट्रोक, श्वसन रोग, निमोनिया, निर्जलीकरण, गर्मी से स्ट्रोक और किडनी फेल सहित कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। शरीर में पित्त विकार बढ़ने लगते हैं जिनके कारण शरीर में टूटन, सिर दर्द, आंखों में भारीपन, आलस, मूत्र विकार और कमजोरी आ जाती है।
गर्मी के दिनों में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए दिन भर में 8 से 10 गिलास पानी अवश्य पीना चाहिए। इसके अलावा लस्सी, केरी का पानी, नारियल पानी, गन्ने का रस, फ्रूट जूस, शिकंजी आदि का सेवन करते रहें। प्रात: जल्दी उठकर 30-40 मिनट ताजी हवा में घूमना चाहिए।
ठंडा पानी पीना चाहिए। चाय-कॉफी के स्थान पर दूध,दही व ठंडाई को प्राथमिकता दें। सुबह हल्का नाश्ता लें। सार्वजनिक स्थानों पर पानी स्वच्छ न हो तो वहां पानी नहीं पीना चाहिए। पानी फिटकरी से शुद्ध करके, उबालकर अथवा वॉटर फिल्टर से छानकर पीयें।
हल्के रंग के ढीले व सूती वस्त्र पहनें। कपड़े ऐसे हों कि शरीर अधिक से अधिक ढका हो क्योंकि खुले कपड़े पहनने से शरीर की त्वचा झुलस जाती है जिससे लू लगने का डर रहता है। सिर को साड़ी, चुन्नी या रुमाल से ढकें व चश्मे का प्रयोग करें। दोपहर में यात्रा से बचें। बाजार के कार्य सुबह जल्दी या शाम के समय करें।
घर से बाहर जाते समय पानी पीकर तो अवश्य जाएं वैसे लस्सी, शिकंजी या केरी का पानी पीकर निकले। खाली पेट बाहर न निकलें।
गर्मी में पेट दर्द, उल्टी, एसिडिटी या डायरिया जैसी परेशानी हो तो प्याज खाएं जो गर्मी सोख लेता है। क्योंकि इसमें फाइबर होता है जो पाचन के लिए अच्छा रहता है। यह फाइबर पेट के अच्छे बैक्टीरिया बनता है।
गर्मी के मौसम में थोड़ी सी लापरवाही लू लगने का कारण बन सकती है। लू गंभीर बीमारी की कारक व जानलेवा भी हो सकती है। अत: गर्मी के दिनों में बहुत ही सावधानी रखें। लू उस समय लगती है जब हमारा शरीर बाहर की गर्मी से अपना सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता है। शरीर का तापमान एकाएक बढ़ जाता है और पसीना निकलना बंद हो जाता है। तलुओं में जलन सी महसूस होती है। बेहोशी आ जाती है। प्राकृतिक चिकित्सक सुनीता जायसवाल के अनुसार, लू लगने से चक्कर आने लगते हैं। श्वास लेने में कठिनाई होने लगती है।
नब्ज की गति बढ़ जाती है। सिर दर्द, बदन दर्द और कमजोरी महसूस होती है। इस स्थिति में चादर गीली कर पेशेंट को उस पर लिटाएं। हाथ-पैरों की मालिश करें। तुलसी पत्तों का रस या भुने प्याज का रस पियें, नमक नाभी पर रखें व उस पर पानी की धार बनाकर डालें। इससे लू बाहर निकल जायेगी। इमली का गूदा मसलकर हाथ-पैरों पर मलें, लू का असर जल्दी खत्म हो जायेगा। रोगी को नींबू पानी, आम पन्ना, बेल का शरबत व इलेक्ट्रॉल पाउडर आदि पिलाते रहें।
कहते हैं धूप में जा रहे हों तो प्याज को जेब में रखो, लू नहीं लगेगी। मेडिकल साइंस के अनुसार, प्याज एक नेचुरल कूलेंट है। वहीं लू से बचने तथा लू लगने पर केरी का पन्ना लाभदायक है। इसमें पुदीना व जरा सी शक्कर मिलाकर पीयें। गर्मी में इमली का पानी पीना भी लाभदायक रहता है। इमली को भिगोकर उसमें थोड़ा सा गुड़ मिलाकर इसका पानी पीयें।
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