थायराइड, घेंघा रोग व खर्राटों को नियंत्रित करता है उज्जायी प्राणायाम : योगाचार्य महेश पाल

 

एबीएन हेल्थ डेस्क। उज्जायी प्राणायाम गले से सांस लेने की तकनीक है, जो योग मे अंतर्निहित है। योगाचार्य महेश पाल बताते हैं कि यह एकमात्र ऐसा प्राणायाम है। इसको कभी भी खाने से पहले, खाने के बाद, उठते, बैठते, सोते किया जा सकता है। यह किसी के शरीर में ऊर्जा को नियंत्रित कर सकता है और सांस को उचित चैनल पर नियंत्रित करता है उज्जायी प्राणायाम को सागर श्वास या विजयी श्वास के नाम से भी जाना जाता है। 

उज्जायी दो शब्दों से मिलकर बना है- उद जिसका अर्थ है श्रेष्ठता या शक्ति का भाव, और जया का अर्थ है जीत, विजय या सफलता, जो इसे विजयी श्वास का अर्थ देता है। सांस छोड़ने और सांस लेने के दौरान समुद्री लहर जैसी ध्वनि के कारण इसे समुद्री श्वास के रूप में जाना जाता है। वायु के साथ गले के घर्षण के कारण ध्वनि उत्पन्न होती है, उज्जायी प्राणायाम उन प्राणायाम में से एक है, जिसे गले की थायराइड समस्या से निदान पाने के लिए किया जाता है। 

इस प्राणायाम को मन एवं तन की शांति के लिए प्रयोग में लाया जाता है। यह प्राणायाम हमें सभी बंधनों से मुक्त कर देता है और एक ताजगी का अनुभव कराता है। उज्जयी सांस एक प्रकार की डायाफ्रामिक सांस है जिसके माध्यम से गले की ग्लोटिस की मांसपेशियां थोड़ी संकुचित हो जाती हैं, जिससे हवा मुखर डोरियों के अंदर और बाहर गुजरते समय फुसफुसाहट, श्रव्य कंपन पैदा करती है, जिससे गले में उपस्थित अविटु ग्रंथी (थायराइड) को एक्टिव कर हाइपोथायरायडिज्म और हाइपरथायरायडिज्म रोग को नियंत्रित किया जाता है। अवटु ग्रंथि हाइपोथैलेमस, पीयूष ग्रंथि आदि कारकों द्वारा नियंत्रित होती है।

अवटु ग्रंथि की सबसे सामान्य समस्याएं अवटु ग्रंथि की अतिसक्रियता (हाइपरथाइरॉयडिज्म) और अवटु ग्रंथि की निम्नसक्रियता (हाइपोथाइरॉयडिज्म) हैं। जब अवटु ग्रंथि बहुत अधिक मात्रा में हार्मोन बनाने लगती है तो शरीर, ऊर्जा का उपयोग मात्रा से अधिक करने लगता है। इसे हाइपर थाइराडिज्म कहते हैं। जब अवटु ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में हार्मोन नहीं बना पाती तो शरीर, ऊर्जा का उपयोग मात्रा से कम करने लगता है। इस अवस्था को हाइपोथायराडिज्म कहते हैं। 

ये असमान्य अवस्थाएं किसी भी आयु वाले व्यक्ति में हो सकती है क्योंकि हाइपरथायरायडिज्म आपके चयापचय को तेज कर देता है जिससे हमारे शरीर पर कई प्रभाव पड़ते हैं, जिसमें,घबराहट या बेचैनी महसूस होना, चिड़चिड़ापन, सामान्य से अधिक या कम ऊर्जा होना, निगलने में परेशानी सूजी हुई थायरॉयड, जिसे गलगंड कहा जाता है, वजन कम होना, वजन बढ़ना, घेंघा रोग, तेज या असमान दिल की धड़कन, सामान्य से अधिक  मल त्याग, भूख का बढ़ना, पसीना आना, मांसपेशियों में कमजोरी, हाथों और उंगलियों में कंपन, अनिद्रा, त्वचा का पतला होना, बालों का टूटना या झड़ना, माहवारी में परिवर्तन, बांझपन, इन सभी समस्याओं से हम ग्रसित होते चले जाते हैं इन समस्याओं को नियंत्रित करने में उज्जायी प्राणायाम काफी लाभकारी माना जाता है।

उज्जाई प्राणायाम करने के लिए सुखासन में बैठ जाएं कमर गर्दन सीधी रखें और दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा में रखें उसके पश्चात हमारी गर्दन को हल्का सा नीचे की ओर झुकाये फिर गले को संकुचित कर गले से आवाज व कंपन करते हुए धीरे-धीरे श्वास को खींचे फिर कुछ देर रोक कर जालंधर बंध लगाए  और फिर धीरे-धीरे बायीं नाशिका से सांस को छोड़ दें इस प्रकार 10 चक्र करे, इस प्राणायाम के अभ्यास से कई लाभ   मिलते है जिसमें, थायराइड, उच्च रक्तचाप और दिल से संबंधित रोगों को नियंत्रित करता है, श्वास की गति को धीमा करके दीघार्यु में सुधार करता है।

आवाज को मधुर बनाता है, गले (कंठ) कफ, खाशी गले की सूजन आदि रोगों को दूर करता है प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ाता है,तंत्रिका तंत्र को शांत और पुनर्जीवित करता है, अच्छी नींद को बढ़ावा देता है,खरार्टों को नियंत्रित करता, उज्जायी प्राणायाम करने से पहले कुछ सावधानियां रखे जिसमें, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगी, अचानक चक्कर आने पर इस  प्राणायाम को जारी न रखें प्रतीक्षा करें जब तक आप वापस सामान्य स्थिति में न पहुंच जाएं और सामान्य रूप से सांस न लें। 

सांस लेने की प्रक्रिया करते समय अनावश्यक बल न लगाएं। जिनको सर्वाइकल है वह अभ्यास करते समय गर्दन को आगे ना झुकाएं। उज्जयी प्राणायाम ध्वनि में शामिल बड़बड़ाहट विधि ब्रांकाई को धीरे से कंपन करने में मदद करती है जो सिलिअट एपिथेलियल ऊतक को सक्रिय करने में मदद करती है। श्वसन गतिविधियों के पारंपरिक तरीकों में, सांस छोड़ने के दौरान ब्रांकाई पर दबाव हल्का होता है। उज्जायी प्राणायाम सांस लेने और छोड़ने दोनों के दौरान ब्रांकाई पर एक स्थिर स्तर का दबाव बनाए रखने में मदद करता है। 

यह छोटी ब्रांकाई के ढहने का प्रतिकार करने में मदद करता है, जिससे साँस छोड़ने की विधि में सूजन आ जाती है। फेफड़ों के अंदर अवशिष्ट वायु की मात्रा को भी इस तरह से कम किया जा सकता है। उज्जयी प्राणायाम ब्रोन्कियल अस्थमा या पुरानी श्वसन स्थितियों से पीड़ित लोगों के लिए काफी मददगार है इसलिए थायराइड जैसे गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए हमें इस प्राणायाम को हमारी दैनिक दिनचर्या में शामिल करना चाहिए।

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