एबीएन सोशल डेस्क। गायत्री परिवार युगतीर्थ के परम पूज्य गुरुदेव वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ पंडित श्रीराम आचार्य जी की लिखित पुस्तक इक्कीसवीं सदी का संविधान नामक युग साहित्य पुस्तक स्वाध्याय पाठ-संवाद के अंतर्गत आज रविवार को आध्यात्मिक जीवन संपदा के चार सूत्रों पर आनलाइन स्वाध्याय पाठ व संवाद हुआ।
स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन एवं मनन इन चारों आधारों पर मानसिक दुर्बलता को हटाना और आत्मबल बढ़ाना चाहिए। साथ ही चार संयम में इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम, चार शक्तिसूत्र में इंद्रिय शक्ति, समय शक्ति, विचार शक्ति, अर्थ (धन) शक्ति तथा चार सूत्र साधना, स्वाध्याय, संयम सेवा, तथा साथ ही समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के सूत्रों पर प्रकाश डाला गया।
बताया गया कि जीवन एक युद्ध स्थली है, जीवनसंग्राम में संयमी पुरुष कभी दु:खी नहीं होता तथा विश्रृंखलित व अस्त-व्यस्त विचार उसे प्रभावित नहीं कर पाते। संयम एवं संघर्ष पर चचार्एं हुई। ये एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। असंयम की परिणति ही दीन- हीन, दरिद्रता, रोग-शोक के रूप में होती है। जीवन देवता की उपासना तब ही भली प्रकार संभव है, जब अपने जीवन रसों को व्यर्थ बहाना छोड़कर मनुष्य उन्हें सृजनात्मक चिंतन व कर्त्तव्य में नियोजित करे।
यदि व्यक्ति असंयम के दुष्परिणामों को भलीभाँति समझ जाये, तो आदर्श जीवन के भूतल पर स्वर्ग आ जाए तथा दु:ख दारिर्द्य सर्वथा समाप्त हो जाये। पूज्यवर श्रीगुरुदेव के उन विचारों पर प्रकाश डालकर बताया गया कि जीवन में खुशहाली व सद्ज्ञान के लिए स्वाध्याय का समय निकालना ही चाहिए। इसके लिए छोटा-सा आध्यात्मिक पुस्तकालय अपने-अपने घरों में शिक्षित लोग बना सकते हैं। पुस्तकें तो मांगकर भी पढ़ी जा सकती हैं। ज्ञान लेना और देना दोनों ही पुण्य कार्य समझकर किये जा सकते हैं। अपने परिवार में साप्ताहिक सत्संग किया जा सकता है।
इसके लिए कोई सदग्रंथ, अखंड ज्योति, युग निर्माण योजना अथवा अपनी प्रज्ञा पुराण के प्रेरणाप्रद अंश पढ़कर सुनाए जा सकते हैं। सदग्रंथ जीते-जागते देवता होते हैं। उनका स्वाध्याय करना, उनकी उपासना करने के समान ही है। पाठ आरंभ गुरु-ईश नमन वंदन, गायत्री महामंत्र का सस्वर पाठ व समापन शान्ति-पाठ से हुआ। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक जय नारायण प्रसाद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
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