गायत्री युग साहित्य पुस्तक 21वीं सदी का संविधान का स्वाध्याय प्रारंभ

 

ईश्वरीय संकल्प शक्ति, एकोऽहंबहुस्याम,मनुष्य ईश्वर का अंश है,कई विषय पर संवाद हुआ

एबीएन सोशल डेस्क। शांतिकुञ्ज के तत्वावधान में गायत्री परिवार शिष्य-साधकों, परिजनों का भारतीय नववर्ष  विक्रम संवत 2081 चैत्र शुक्ल पक्ष नौदिवसीय गायत्री महामंत्र का लोकप्रिय जप-अनुष्ठान हर एक शक्तिपीठ, मंडल इकाई, शाखा व आवासीय तपोवन गृहे गृहे प्रारंभ है। इसमें नवयुग सृजन अभियान के अंतर्गत बाल-संस्कार पाठशाला के भी छोटे बालक वृंद भी परिवार जनों के साथ सीधे शांतिकुञ्ज गतिविधि के मार्गदर्शन में जुड़े हुए हैं।

साथ ही साधक-शिष्यों का आनलाइन स्वाध्याय मंडलप्रतिनिधित्व में स्वाध्याय पाठ व संवाद जारी हैं। इसमें पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्यजी की एक लिखित पुस्तक इक्कीसवीं सदी का संविधान पर भी आज-कल स्वाध्याय हो रहा है। इस के अंतर्गत ईश्वरीय संकल्प शक्ति, एकोऽहंबहुस्याम, मनुष्य ईश्वर का अंश है, हम बदलेंगे-युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा, संकल्प की शक्ति अपार है, जैसे विषय बिंदुओं पर पाठक व श्रोतागणों का संवाद चल रहा है। बताया कि इस पुस्तिका में अट्ठारह संकल्प सूत्र हैं, जिसे 21 वीं सदी उज्ज्वल भविष्य के लिए आध्यात्मिक स्तर पर बहुत ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 

इसमें चार सूत्रों पर पठन-पाठन व विचार विमर्श हुए : 

  1. हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकर उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेंगे 
  2. शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्म- संयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे 
  3. मन को कुविचारों और दुर्भावनाओं से बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे 
  4. इंद्रीय- संयम, अर्थ- संयम, समय- संयम और विचार- संयम का सतत अभ्यास करेंगे 

इसके साथ साथ ईश्वर का उपहार व दंड दोनों असाधारण है, इसपर चर्चाएं हुर्इं। इस पुस्तक का नाम 21वीं सदी का संविधान नाम दिया गया है। नवयुग निर्माण अभियान का घोषणा पत्र कहा गया है। बताया गया कि यह नव युग निर्माण अभियान व संकल्प सूत्र हम में से प्रत्येक को दैनिक धार्मिक कृत्य की तरह इसे नित्य प्रात:काल पढ़ना चाहिए। पूज्यवर ने बताया है कि संकल्प की शक्ति अपार है। यह विशाल ब्रह्मांड परमात्मा के एक छोटे संकल्प का ही प्रतिफल है। 

परमात्मा में इच्छा उठी एकोऽहं बहुस्याम मैं अकेला हूं- बहुत हो जाऊं, उस संकल्प के फलस्वरूप सारा संसार बनकर तैयार हो गया। मनुष्य के संकल्प द्वारा ही इस ऊबड़- खाबड़ दुनिया को ऐसा सुव्यवस्थित रूप मिला है। यह उसकी  ऐसी इच्छा, आकांक्षा व संकल्प बल का परिणाम है। पाठ-संवाद में बताया हम गया कि मानव को ईश्वर का अंश कहा गया है। यह उपलब्धि स्वर्णिम सौभाग्य की है। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक जय नारायण प्रसाद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।

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