टीम एबीएन, रांची। शान्तिकुञ्ज तत्वावधान व मार्गदर्शन में अखिल विश्व गायत्री परिवार की प्रत्येक इकाई संस्थान, शक्तिपीठ, प्रज्ञापीठ, महिला मंडल, प्रज्ञा मंडल गृहे गृहे आवासीय तपोवन में तथा आनलाइन स्वाध्याय मंडल व जप-अनुष्ठान समूह प्रतिनिधित्व में स्वाध्यायी पाठक सह साधक- शिष्य, भाई-बहन श्रोतागणों में वेदमाता, देवमाता, विश्व माता आद्य शक्ति गायत्री तथा सर्वश्रेष्ठ महामंत्र, महाविज्ञान स्वरूप संजीवनी महाविद्या स्वरूप महामंत्र की नौदिवसीय जप-अनुष्ठान में शामिल हुए हैं।
इस नौदिवसीय नौरात्रि गायत्री महामंत्र जप-अनुष्ठान अभियान व स्वाध्याय में पूज्यवर श्रीगुरुदेव वेदमूर्ति-तपोनिष्ठ पण्डित श्रीरामशर्मा आचार्य जी की वांग्मय युग साहित्य गायत्री महाविद्या का तत्वदर्शन पर पाठ-संवाद प्रारंभ हुआ है। पाठ-संवाद में बताया गया कि गायत्री कोई स्वतंत्र देवी देवता नहीं है, वह परब्रह्म परमात्मा का क्रिया भाग है।
ब्रह्म निर्विकार है, बुद्धि से परे है, साक्षी रूप है, अपनी क्रियाशील चेतना शक्ति रूप होने के कारण उपासनीय है और उस उपासना का अभीष्ट परिणाम भी प्राप्त होता है। ईश्वर-भक्ति, ईश्वर- उपासना, ब्रह्म साधना, आत्म साक्षात्कार, ब्रह्म- दर्शन, प्रभु- परायणता आदि पर्यायवाची शब्दों का जो तात्पर्य और उद्देश्य है, वही गायत्री है, उपासना आदि है।
बताया गया कि गायत्री उपासना वस्तुत: ईश्वर उपासना का एक अत्युत्तम सरल और शीघ्र सफल होने वाला मार्ग है। इस मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति एक सुरम्य उद्यान से होते हुए जीवन के चरम लक्ष्य ईश्वर- प्राप्ति तक पहुंचते हैं।
ब्रह्म और गायत्री में केवल शब्दों का अन्तर है, वैसे दोनों ही एक हैं। चर्चा हुई कि श्रीकृष्ण भगवान का कथन है कि गायत्री छंद सामहम छंदों में में गायत्री छंद मैं ही हूं। उक्त जानकारी गायत्री परिवार के वरिष्ठ साधक जय नारायण प्रसाद ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी।
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