टीम एबीएन, लोहरदगा। प्रभु श्रीराम का अवतार पहले हुआ था, इसलिए अयोध्या जी पहले सज गयी है। अब मथुरा सजाने का वक्त आ रहा है। श्रीमद्भागवत हमारा है। मतलब सभी सनातनियों का है। इसलिए मथुरा सजाने का दायित्व सभी सनातनियों का ही है। सभी तन, मन, धन से मथुरा जी को सजाने का संकल्प लें। यही भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा को भव्य बनाने का समय है। उक्त बातें महादेव आश्रम लोहरदगा स्थित बुढ़वा महादेव मंदिर परिसर के मंजुरमती हाई स्कूल के प्रेक्षागृह से चल रहे, सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन कथा व्यास पंडित अमरनाथ चौबे ने श्रीकृष्ण लीला, गोवर्धन पूजा और छप्पन भोग लगाने की कथा और उसके महात्म्य के बारे में भागवत प्रेमियों को विस्तार से बताने के दौरान कही।
श्रद्धालुजन भक्तिभाव में विभोर होकर श्रीकृष्ण के बाद लीला के अथाह गहराइयों में अपने को डुबोकर भक्त और श्रद्धालुओं ने जमकर जयकारे लगाते हुए झूमे रहे। यहां चल रहे श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन रविवार को भगवान श्रीकृष्ण की बाललीला का वर्णन किया गया। वाराणसी के कथा व्यास पंडित अमरनाथ चौबे के मुखारविंद से प्रभु श्री कृष्ण की बाल लीला का वर्णन सुनकर श्रद्धालु आत्मविभोर हो उठे।
बाल श्रीकृष्ण लीला की व्याख्या के क्रम में व्यास पीठ से पंडित अमरनाथ चौबे ने कहा कि इंद्र को अपनी सत्ता और शक्ति पर घमंड हो गया था। उसका गर्व मर्दन करने के लिए भगवान ने व्रज मंडल में इंद्र की पूजा बंद करा दी। बालक श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू करा दी। इससे गुस्साये इंद्र ने ब्रजमंडल पर भारी बरसात करायी। प्रलय से लोगों को बचाने के लिए भगवान ने कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। सात दिनों के बाद इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ।
कथा वाचक अमरनाथ चौबे ने कहा कि गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के सम्मान में आयोजित एक उत्सव है। यह दीपावली के एक दिन बाद पड़ता है। गोवर्धन पूजा के रूप में जाना जाने वाला उत्सव अन्नकूट उत्सव के रूप में भी जाना जाता है। यह त्योहार भक्तों द्वारा भगवान कृष्ण को अर्पित करने के लिए गेहूं, चावल, बेसन की सब्जी और बिना लहसुन और प्याज की सब्जी बनाकर मनाया जाता है।
गो-शब्द गाय को संदर्भित करता है, और वर्धन, पोषण को दर्शाता है। यह शब्द मिलकर गोवर्धन शब्द बनाते हैं। गोवर्धन की एक और व्याख्या यह है, कि यह भगवान कृष्ण की भक्ति के माध्यम से अपनी इंद्रियों को ऊपर उठाने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है। गो का अर्थ इंद्रियों से है। वर्धन का अर्थ है उन्नयन। इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा इस विश्वास के साथ की जाती है, कि ऐसा करने से व्यक्ति की आध्यात्मिकता और भगवान कृष्ण की भक्ति मजबूत होगी।
मौके पर भागवत कथा के क्रम में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की झांकी सजाई गई। इस क्रम में भगवान श्री कृष्ण के कालिया मर्दन के रूपांतरण नृत्य नाटिका की प्रस्तुति से श्रद्धालुगण आनंदित हो उठे। कथा पंडाल में उपस्थित महिलाएं अपने आपको थिरकने से रोक नहीं पायीं। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में कलाकारों के साथ भाव भंगिमाओं पर झूमती महिलाओं ने खूब आनंद उठाया।
श्रीमद् भागवत कथा के दौरान मुख्य यजमान मदन मोहन पांडेय-रीता पाण्डेय ने छप्पन प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया और महाप्रसाद का वितरण किया। भागवत कथा को सफल बनाने में अन्य लोगों के अलावा वाराणसी से कथा व्यास अमरनाथ चौबे के साथ आए विद्यानंद तिवारी, मदन मोहन पांडेय, राजीव उपाध्याय, कौस्तुभ चतुवेर्दी, दिवाकर पांडेय के अलावा मनोज्ञ पांडेय, अनुपम पांडेय- निधि, वत्सा पांडेय, सुमन राय, राजेंद्र प्रताप देव, राजेंद्र प्रसाद खत्री, धनंजय अग्रवाल, रूपा पांडेय, सुरेश पांडेय, रामदेव भारती, नंदकुमार पांडेय, शिव कुमार राजगढ़िया, रामस्वरूप प्रसाद, सुदीप्ता मुखर्जी, अशोक अग्रवाल, रेणुका गुप्ता, कृपा प्रसाद सिंह, शिवशंकर सिंह, अनिल ठाकुर, विवेक सिद्धार्थ, सुनीता कुमारी, अनुराधा कुमारी, शांति कुमारी, विनीता कुमारी आदि महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं।
श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ के दौरान हर दिन प्रात: आठ से एक बजे तक वैदिक मंत्रोच्चार से पूजा अर्चना, मध्याह्न एक से ढाई बजे तक रुद्र अभिषेक और संध्या चार से रात आठ बजे तक भागवत कथा का वचन हो रहा है।
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