एबीएन सोशल डेस्क। रांची जिला संतमत सत्संग समिति के तत्वावधान में महर्षि मेंही आश्रम, चुटिया में चल रहे पक्ष ध्यान साधना शिविर में आजचल रहे पक्ष ध्यान साधना शिविर के दसवें दिन सद्ग्रंथों के पास से यह विदित हुआ कि आज के सत्संग का पतिपाद्द माया है।
माया क्या है और आध्यात्म क्षेत्र में इसका क्या प्रभाव है? ईश्वर भक्ति में यह क्या क्या असर डालती है? इन्ही सब बातों का खुलासा सत्संग में उपस्थित साधु महात्माओं ने किया। देवभूमि ऋषिकेश से आए पुज्यस्वामी श्री गंगाधर महाराज जी ने कहा कि मैं - मेरा, तैं- तेरा सब माया है। श्री रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी लिखा है:-
आगे उन्होंने इस विषय की शुद्धता को स्पष्ट करते हुए कहा कि स्थल, सूक्ष्म कारण और महाकारण- ये चारों जड़ शरीर है। इसके अंदर रहने पर सभी इंद्रियां नहीं छूटती हैं। इंद्रियों के साथ रहकर जो देखा या सुना जाता है झ्र वह परमात्मा की माया है। माया में रह कर जीव न अपनी पहचान कर पाता है और ना ही परमात्मा का साक्षात्कार कर पाता है।
इन चारों शरीरों से परे एक पांचवा शरीर कैवल्य शरीर है। यही शरीर परमात्मा का अत्यंत निकटवर्ती शरीर है। नादानुसंधान के द्वारा सूरत सब इंद्रियों से छूटकर अकेले कैवल्य शरीर में पहुंचकर अपना और परमात्मा का भी साक्षात्कार करती है। कैवल्य मंडल में परमात्मा का दर्शन होता है लेकिन इनमें मिलना नहीं।
अत: यहां पर द्वैतता बनी रहती है। इसके आगे एक सार शब्द में लीन होने पर द्वैतता मिट जाती है और जीव-जीव एक हो जाता है झ्र जो साधना की पराकाष्ठा है।
ज्ञातव्य है कि इस साधना शिविर में विभिन्न प्रांतों से आए सैंकड़ों साधक भक्ति में लीन हैं और सत्संग का भी लाभ ले रहें है। नगर के सभी धर्मप्रेमियों से हमारी समिति आग्रह करती है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में पहुंचकर प्रवचन से लाभ उठाए और पुण्य के भागी बनें।
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