एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड के कोडरमा की 15 साल की सुधा (बदला हुआ नाम) के साहस और संघर्षों को सलाम किया जा सकता है। परिवार बेहद गरीब था और फिर पिता की भी मृत्यु हो गई। घर में पाई-पाई के संकट के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी और पांच लोगों के परिवार का पेट भरने के लिए नन्हीं सी सुधा रोजाना 14 घंटे अभ्रक की खदानों में खटने लगी।
झारखंड में अभ्रक की खदानें पहले नन्हें बच्चों के शोषण और बाल मजदूरों के इस्तेमाल के लिए कुख्यात थीं। लेकिन कमरतोड़ मेहनत के बाद भी सुधा को मुश्किल से 50 रुपए मिल पाते जिससे किसी तरह पांच लोगों के परिवार का पेट भरता था। इसी बीच सुधा के घर वालों ने उसकी शादी तय कर दी। लेकिन सुधा किसी भी तरह पढ़ना चाहती और इस उम्र में शादी के खिलाफ थी।
उसने अपने घर वालों को मनाने की हर चंद कोशिश की लेकिन नाकाम रही। सुधा को अपने गांव में बाल मित्र ग्राम (बीएमजी) के बारे में पता चला। कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेंस फाउंडेशन द्वारा संचालित बीएमजी अपनी अभिनव पहलों के माध्यम से ग्रामीण इलाकों में बच्चों को अगली पांत में रखकर न सिर्फ उन्हें जागरूक कर रहा है बल्कि बाल विवाह एवं बाल श्रम के खिलाफ लड़ाई में नए योद्धा तैयार कर रहा है।
यह लोकतांत्रिक हस्तक्षेपों और कार्रवाइयों के जरिये अपने जीवन और समुदाय में सकारात्मक परिवर्तनों के लिए बच्चों को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हुए बाल श्रम, बाल विवाह और बाल यौन उत्पीड़न से बचाव के लिए उनके इर्द-गिर्द एक सुरक्षा घेरे का निर्माण करता है। सुधा ने अपना बाल विवाह रुकवाने में मदद के लिए बीएमजी के सदस्यों से संपर्क किया। लेकिन उसके परिवार ने मिलने से इनकार कर दिया।
किसी तरह से वे मुलाकात के लिए राजी हुए। इसके बाद कई मुलाकातों और मान मनुहार के बाद उन्होंने अनमने मन से बालिग होने तक सुधा की शादी नहीं करने का वादा किया। बीएमजी ने सुधा का एक स्कूल में उसका दाखिला करा दिया और इस तरह उसकी पढ़ाई एक बार फिर शुरू हो गयी।
सुधा बीएमजी की सक्रिय सदस्य हो गई थी और पिछले साल अपने गांव की बाल पंचायत की उपाध्यक्ष चुनी गई। एक बार स्कूल जाना शुरू करने के बाद सुधा ने अभ्रक की खदानों में काम बंद कर दिया। अब परिवार उसे बोझ समझने लगा था और किसी तरह उसके हाथ पीले कर उसे विदा करने की जुगत में था।
शादी के लिए परिवार वालों के लगातार दबाव से परेशान होकर सुधा ने प्रखंड विकास अधिकारी (बीडीओ) से इसकी शिकायत की। बीडीओ ने तत्काल कार्रवाई करते हुए सुधा के परिजनों से संपर्क किया और उन्हें इस तरह का गैरकानूनी कदम उठाने के खिलाफ चेतावनी दी।
सुधा अब अपने गांव और आस पास की बच्चियों को बाल विवाह के नर्क में जाने से बचाने की लड़ाई लड़ रही है। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी कहते हैं, बच्चों को शिक्षा का अधिकार तो मिल गया है लेकिन अब उन्हें अपने अधिकारों के बारे में शिक्षित करने की जरूरत है।
बीएमजी की मदद से सुधा ने यही किया है। वह कहती है, मैं बाल पंचायत की सक्रिय सदस्य हूं और मुझे बच्चों के अधिकारों के बारे में पता है। मैं कानूनी रूप से बालिग होने से पहले शादी नहीं करूंगी। आज देश की हर लड़की को सुधा जैसे जज्बे और हौसले से लैस होने की जरूरत है। (लेखक जन सेवा परिषद, हजारीबाग के सचिव हैं।)
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