राष्ट्र के प्रकाश स्तंभ होते हैं शिक्षक

 

रमेश सर्राफ धमोरा

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। शिक्षक हर व्यक्ति के जीवन की रीढ़ होते हैं। शिक्षक ही है जो विद्यार्थियों को जीवन का नया अर्थ सिखाता है। सही रास्ता दिखाता है। गलत करने से रोकता है। वे बाहर से देख सकते हैं। वे प्रत्येक छात्र की देखभाल करते हैं और उनके विकास की कामना करते हैं। शिक्षकों का सम्मान नहीं करने वाले जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ सकते। 

शिक्षक बच्चों के व्यक्तित्व को ढालते हैं। वे एकमात्र नि:स्वार्थ व्यक्ति हैं जो खुशी-खुशी बच्चों को अपना सारा ज्ञान देते हैं। शिक्षक बच्चों के जीवन के वास्तविक निमार्ता होते हैं, जो न सिर्फ हमारे जीवन को आकार देते हैं, बल्कि इस काबिल बनाते हैं कि वह पूरी दुनिया में अंधकार होने के बाद भी प्रकाश बिखेरते रहें। शिक्षक समाज में प्रकाश स्तंभ की तरह होता है, जो अपने शिष्यों को सही राह दिखाकर अंधेरे से प्रकाश की और ले जाता है। 

शिक्षकों के ज्ञान से फैलने वाली रोशनी दूर से ही नजर आने लगती है। इस वजह से हमारा राष्ट्र ढेर सारे प्रकाश स्तंभों से रोशन हो रहा है। इसलिए देश में शिक्षकों को सम्मान दिया जाता है। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच के रिश्तों को सुदृढ़ करने को शिक्षक दिवस एक बड़ा अवसर होता है।

दुनिया के एक सौ से अधिक देशों में अलग-अलग समय पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। भारत में पूर्व राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन पांच सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह क्रम 1962 से चल रहा है। उन्होंने अपने छात्रों से अपने जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की इच्छा जतायी थी। कहा जाता है कि गुरु के बिना ज्ञान अधूरा रहता है। यह बात बिल्कुल सत्य है। 

हमारे जीवन में सबसे पहली गुरु तो मां होती है जो हमें जन्म लेते ही हर बातों का ज्ञान कराती है। मगर विद्यार्थी काल में बालक के जीवन में शिक्षक एक ऐसा गुरु होता है जो उसे शिक्षित तो करता ही है साथ ही उसे अच्छे बुरे का ज्ञान भी कराता है। पहले के समय में तो छात्र गुरुकुल में शिक्षक के पास रहकर वर्षों विद्या अध्ययन करते थे। 

उस दौरान गुरु अपने शिष्यों को विद्या अध्ययन करवाने के साथ ही स्वावलंबी बनने का पाठ भी पढ़ाते थे। इसीलिए कहा गया है कि गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताये। गुरु का स्थान ईश्वर से भी बड़ा माना गया है, क्योंकि गुरु के माध्यम से ही व्यक्ति ईश्वर को भी प्राप्त करता है।

हमारे जीवन को संवारने में शिक्षक एक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सफलता प्राप्ति के लिए वो हमें कई प्रकार से मदद करते है। जैसे हमारे ज्ञान, कौशल के स्तर, विश्वास आदि को बढ़ाते है तथा हमारे जीवन को सही आकार में ढालते है। कबीर दास ने शिक्षक के कार्य को इन पंक्तियो में समझाया है:- गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़ै खोट, अंतर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट।

कबीर दास कहते हैं कि शिक्षक एक कुम्हार की तरह है और छात्र पानी के घड़े की तरह। जो उनके द्वारा बनाया जाता है और इसके निर्माण के दौरान वह बाहर से घड़े पर चोट करता है। इसके साथ ही सहारा देने के लिए अपना एक हाथ अंदर भी रखता है। डॉ राधाकृष्णन का जन्म पांच सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुमनी गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे बचपन से ही किताबें पढ़ने के शौकीन थे और स्वामी विवेकानंद से काफी प्रभावित थे। 

उन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष अध्यापन में गुजारे।उनका निधन 17 अप्रैल 1975 को चेन्नई में हुआ था। राधाकृष्णन ने 1909 में चेन्नई के प्रेसिडेंसी कॉलेज में अध्यापन में प्रवेश करने के साथ ही दर्शनशास्त्र शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरूआत की थी। उन्होंने बनारस, चेन्नई, कोलकाता, मैसूर जैसे कई प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों और लंदन के आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र पढ़ाया था। अध्यापन पेशे के प्रति समर्पण की वजह से उन्हें 1949 में विश्वविद्यालय छात्रवृत्ति कमीशन का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

पुराने समय में शिक्षकों को चरण स्पर्श कर सम्मान दिया जाता था। परन्तु आज के समय में शिक्षक और छात्र दोनों ही बदल गये हैं।  पहले शिक्षण एक पेशा न होकर एक उत्साह और एक शौक का कार्य था। पर अब यह मात्र एक आजीविका चलाने का साधन बनकर रह गया है। शिक्षक मार्गदर्शक, गुरु, मित्र होने के साथ ही और कई भूमिकाएं निभाते हैं। यह विद्यार्थी के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने शिक्षक को कैसे परिभाषित करता है। संत तुलसी दास ने इसे अच्छे तरीके से समझाया है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। 

अर्थात भगवान, गुरु एक व्यक्ति को वैसे ही नजर आएंगे जैसा कि वह सोचेगा। उदाहरण के लिए अर्जुन, भगवान श्रीकृष्ण को अपना मित्र मानते थे। वहीं मीरा बाई भगवान श्रीकृष्ण को अपना प्रेमी। यही बात शिक्षक के ऊपर लागू होती है। इसीलिए कहते हैं कि शिक्षक समाज का पथ प्रदर्शक होता है।

हर देश में इस दिवस को मनाने की तारीख अलग-अलग है। चीन में 10 सितंबर तो अमेरिका में छह मई, आॅस्ट्रेलिया में अक्टूबर का अंतिम शुक्रवार, ब्राजील में 15 अक्टूबर और पाकिस्तान में पांच अक्टूबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। ओमान, सीरिया, मिस्र, लीबिया, संयुक्त अरब अमीरात, यमन, सऊदी अरब, अल्जीरिया, मोरक्को और कई इस्लामी देशों में 28 फरवरी को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

वर्तमान समय में शिक्षकों का समाज में सम्मान कम होने लगा है। बहुत से शिक्षकों की घटिया हरकतों ने उनको समाज की नजरों से गिरा दिया है। मौजूदा दौर में शिष्य भी कुछ कम नहीं हैं। छात्रों की अनुशासनहीना के चलते स्कूल, कालेजों में शिक्षा का वातावरण समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में गुरु-शिष्य को एक-दूसरे की भावनाओं को समझ कर मिल-जुल कर ज्ञान की ज्योति जलानी होगी। शिक्षक दिवस मनाने के साथ हमें शिक्षण कार्य की पवित्रता को फिर से बहाल करने की प्रतिज्ञा भी लेनी होगी। तभी हमारा शिक्षक दिवस मनाना सार्थक हो पायेगा। (लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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