एबीएन डेस्क। कॉप 26 के समाप्त हो गया है। ग्लासगो सौदे पर हस्ताक्षर भी हो चुके हैं। लेकिन इसके साथ निश्चित रूप से विकसित देशों द्वारा वित्तीय प्रतिबद्धताओं की अनिश्चितता और सौदे में कोयले के चरणबद्ध कमी पर अंतिम मिनट में बदलाव को लेकर अनिश्चितता का माहौल है। ब्रिटेन के ग्लासगो शहर में आयोजित कॉप 26 में जाने से पहले इस बात पर व्यापक सहमति थी कि यह विकसित देशों के बीच नेट जीरो के संशोधित लक्ष्यों और जलवायु वित्त पर बढ़ती प्रतिबद्धताओं की होड़ होगी। भारत ने शुरूआती दिन ही 2070 तक अपनी नेट जीरो प्रतिबद्धताओं की घोषणा कर दी। साथ ही 2030 तक अपनी अक्षय ऊर्जा हिस्सेदारी को 50 प्रतिशत तक बढ़ाने की प्रतिबद्धता भी जताई। यह बहुत आशाजनक है। हालांकि, आगे एक लंबा रास्ता तय करना है। वैश्विक स्तर पर दक्षिण के देशों और अन्य विकासशील देशों के बीच भविष्य के लिए ऊर्जा संक्रमण प्रतिबद्धताओं के अभी भी दूर की कौड़ी बने रहने की संभावना है। दुनिया भर में अभी भी 759 मिलियन लोग ऐसे हैं जिनके पास बिजली नहीं है। महामारी के वित्तीय प्रभाव ने बुनियादी बिजली सेवाओं को 30 मिलियन से अधिक लोगों के लिए अप्रभावी बना दिया है, जिनमें से अधिकांश अफ्रीका में स्थित हैं। बिजली की सबसे बड़ी कमी नाइजीरिया, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और इथियोपिया में थी, इस मामले में भारत का स्थान इन देशों के बाद है। सौभाग्य योजना के तहत बिजली की 98 प्रतिशत पहुंच के साथ, भारत ने पिछले दशक में तेजी से ग्रिड विस्तार करके सभी के लिए बिजली की पहुंच सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। आपूर्ति की गुणवत्ता अभी भी एक उभरता हुआ मुद्दा है, जिसे कर्ज में डूबी वितरण कंपनियों के विवेक पर छोड़ दिया गया है। रुक-रुक कर हो रही बिजली की आपूर्ति व्यवसायों को पंगु बना रही है। गांवों में उद्यमियों को उनके कामकाज को बढ़ाने में अवरोध पैदा कर रही है। ये व्यवसाई अपने व्यवसाय के विस्तार और स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान के लिए उत्पादन क्षमता को और उसके उपयोग को बढ़ाना चाहते हैं। आॅफ-ग्रिड सौर उपकरण जैसे विकेंद्रीकृत समाधान छोटे व्यवसायों के लिए केवल बिजली की रौशनी भर मुहैया नहीं करा रहे, बल्कि उनके व्यवसाय को भी बढ़ाने में काफी योगदान दे रहे हैं। उदाहरण के लिए, झारखंड के पेरका गांव में एक 5 वॉट सौर प्रणाली एक बाजरा प्रोसेसिंग प्लांट यूनिट को बिजली प्रदान करती है, जहां 35 से अधिक महिलाएं कार्यरत हैं। उनमें से प्रत्येक अब प्रति माह 7000 रुपए की अतिरिक्त आय अर्जित कर रही हैं। ये वर्तमान ग्रिड सिस्टम द्वारा मुहैया कराना बहुत हद तक संभव नहीं है। वितरित अक्षय ऊर्जा (डिस्ट्रीब्यूटेड रिन्यूएबल एनर्जी, डीआरई) से संचालित आजीविका के उपायों को भी गति प्रदान करती है। जैसे सौर ऊर्जा संचालित कृषि प्रसंस्करण इकाइयों, कोल्ड स्टोरेज आदि में डीजल पर निर्भरता को कम करने और अंतत: पूरी तरह से समाप्त करने और ग्रिड आपूर्ति को पूरक करने की क्षमता इसमें है। कृषि, कृषि-प्रसंस्करण, डेयरी, कुक्कुट पालन, मत्स्य पालन, सिलाई आदि में डीआरई आजीविका अनुप्रयोगों के सफल पायलट और व्यवसायिक मॉडल हैं। इसको आगे बढ़ाने की पृष्ठभूमि में निम्नलिखित उपायों की तत्काल आवश्यकता है: पहला- वर्तमान में उपलब्ध डीआरई आजीविका अनुप्रयोगों का विस्तार करें। दूसरा- वित्त तंत्र के माध्यम से नए डीआरई आजीविका प्रयोगों के विकास में सहायता करना। स्टेट आॅफ द सेक्टर रिपोर्ट के चौथे संस्करण में स्वच्छ ऊर्जा एक्सेस नेटवर्क 2019-20 में समग्र डीआरई क्षेत्र का सकारात्मक दृष्टिकोण देता है। हालांकि यह क्षेत्र व्यापक जागरूकता की कमी, बाजार से सीमित संबंधों से जूझने के अलावा, पर्याप्त वित्त जुटाने, नीतिगत ढांचे को तय करने के लिए लगातार संघर्ष कर रहा है। एक ऐसे देश के लिए, जिसने अपने ग्रिड में अक्षय ऊर्जा के 100 गीगावाट को जोड़ा है, डीआरई समाधानों की बात करते समय अपने स्थायित्व को खोजने की चुनौतियां इसकी अन्य सफलताओं के विपरीत हैं। इस क्षेत्र में निवेश किए गए हितधारक अभी भी राज्य स्तर पर अपने व्यावसायिक हितों का विस्तार करने के लिए एक ठोस नीतिगत ढांचे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। शायद यही वजह है कि देरी और नीतिगत विफलताओं को इसके लिए दोष दिया जा सकता है। खासकर तब, जब हम मानते हैं कि नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) 2020 के अक्टूबर में ग्रामीण आजीविका में डीआरई अनुप्रयोगों के पहले मसौदे के साथ आया था, जिसे मार्च 2021 में संशोधित किया गया था। ऐसा ही एक और उदाहरण झारखंड राज्य में मिनी ग्रिड नीति है, जहां 2018 में तैयार किया गया पहला मसौदा 2020 के अंत में अपडेट किया गया था और फरवरी 2021 में संशोधित किया गया था. इसे अभी भी सरकार द्वारा अंतिम रूप दिए जाने का इंतजार है। पेरिस सीओपी में भारत की 2022 तक 100 गीगावॉट की प्रतिबद्धता के बाद सरकार का ध्यान अब तक जोड़ा गया गीगावाट बनाम बिजली की कमी से दूर कर लाखों लोगों के उत्थान पर है। और यह स्थिति ग्लासगो सौदे के बाद भी जारी रहने की संभावना है। आंतरिक समस्या ये है कि, देशभर में मौजूद बिजली के असमान वितरण जैसी समस्याओं को स्वीकार नहीं करना। इससे बिजली से संबंधित प्राथमिकताओं, उसके कार्यान्वयन पर फोकस करने में भी परेशानी पैदा होती है। डीआरई क्षेत्र को सही मात्रा में वित्त पोषण, नीति कार्यान्वयन और समर्थन सुनिश्चित करने के लिए देश के भीतर भी ऊर्जा इक्विटी को समझने करने की आवश्यकता है। यह बदले में भारत को बिजली की कमी से हमेशा के लिए दूर कर सकता है। डीआरई क्षेत्र में 2023 तक देश में 1,90,000 प्रत्यक्ष नौकरियां और 2,10,000 अप्रत्यक्ष नौकरियां होने का भी अनुमान है। यह ग्रीन जॉब्स भारत के हरित ऊर्जा संक्रमण के लिए महत्वपूर्ण है. इन आकांक्षाओं ने बिजली की कमी को समाप्त करने की जोरदार पहल तो की ही है, साथ ही वैश्विक स्तर पर दक्षिणी देशों के लिए लाइटहाउस बनने के लिए भारत की क्षमता को 100% विद्युतीकरण से आगे बढ़ने की क्षमता प्रदान की है।
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