एबीएन सोशल डेस्क। परिस्थितियों का आकलन कर जो राष्ट्र और समाज के प्रति अपनी कर्मठता को उजागर करता है, वह कृष्ण हैं। राष्ट्र और समाज की दुर्दशा को देखकर कृष्ण ने समाज में नव चेतना, संरक्षण और संवर्धन के लिए जो काम किया वह धर्म है। उक्त बातें पंडित रामदेव पाण्डेय ने कही। वे राजधानी रांची के बरियातू स्थित श्री राम-जानकी मन्दिर में पांचवें दिन भागवत कथा का रसपान भक्तों को करा रहे थे। बताते चलें कि यह कथा 12 अगस्त तक चलेगी।
उन्होंने कहा कि राम ने राष्ट्र को जननी यानि जन्म देने वाली मां कहा, तो कृष्ण ने राष्ट्र रक्षा को धर्म कहा है। दोनों राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं। द्वापर में आज की जैसी विषम परिस्थिति भारत की थी, राजगीर में जरासंध सोलह हजार राजाओं को, कामरुप में भोंमासुर सोलह हजार बेटियों को और मथुरा में कंस अपने पिता, जीजा तथा बहन को कैद कर रखा था।
पशुओं का काम मनुष्य से लिया जा रहा था। झारखंड का राजा अपने को बासुदेव ईश्वर घोषित कर दिया था। गोवंश और नारियों का अपरहण हो रहा था, पर कोई राजा इस अधर्मी के लिए आवाज नहीं उठा सकता था। इन्हीं परिस्थितियों ने भगवान श्री कृष्ण को कारागार में जन्म लेने पर मजबूर कर दिया। जहां बच्चा रोये तो मारा जाये और न रोये तो विकलांग हो जाये।
कृष्ण सामाजिक, राजनीतिक अराजकता का अनुभव किया कि राजनीति धर्मविहीन हो गयी है। इसलिए राजा, सगे सम्बन्धी और बेटियां बंदी बनायी गयी हैं। कृष्ण ने धर्म की स्थापना राजसत्ता से करने की ठानी और स्वयं युद्ध न कर पाण्डवों से कंधार से म्यांमार तक के राज्यों को जीत लिया। हारे हुए राजा के धर्मज्ञ पुत्रों को ही राज सत्ता सौंप दिया, इसलिए आज भी राजनीति में धर्म की आवश्यकता है, राजनीति का प्राण धर्म है।
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