नयी शिक्षा नीति और सीखने-सिखाने की संस्कृति का विकास

 

गिरीश्वर मिश्र एबीएन एडिटोरियल डेस्क। कहा जाता है धरती पर ज्ञान जैसी कोई दूसरी पवित्र वस्तु नहीं है। भारत में प्राचीनकाल से ही न केवल ज्ञान की महिमा गाई जाती रही है बल्कि उसकी साधना भी होती आ रही है। इस बात का असंदिग्ध प्रमाण देती है काल के क्रूर थपेड़ों के बावजूद अभी भी शेष बची विशाल ज्ञान राशि। अनेकानेक ग्रंथों तथा पांडुलिपियों में उपस्थित यह विपुल सामग्री भारत की वाचिक परम्परा की अनूठी उपलब्धि के रूप में वैश्विक स्तर पर अतुलनीय और आश्चर्यकारी है। यह हमारे लिए सचमुच गौरव का विषय है कि आज जैसी उन्नत संचार तकनीकी के अभाव में भी मानव स्मृति में भाषा के कोड में संरक्षित होकर यह सब जीवित रह सका। इस परंपरा में मनुष्य के जीवन में होने वाले आरम्भ में विकास और उत्तर काल में ह्रास की अकाट्य सच्चाई को स्वीकार करते हुए मनुष्य को जीने के लिए तैयार करने की व्यवस्था की गई थी। ज्ञान केंद्रित भारतीय संस्कृति के अंतर्गत अभ्यास और गुरु के संरक्षण में मिलने वाली शिक्षा का परिणाम व्यास, पाणिनि, पतंजलि, वाल्मीकि, कणाद, गौतम, जैमिनि, भरत, कालिदास, भर्तृहरि, बाणभट्ट, भवभूति, चाणक्य, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, चरक, सुश्रुत, शंकराचार्य आदि जैसी महान विभूतियों और उनकी अमूल्य कृतियों के रूप में प्रतिफलित हुआ। गुणवत्ता और शिक्षा की उत्कृष्टता की दृष्टि से नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विद्या केंद्रों की वास्तविकता विश्व विदित है। बर्तानवी उपनिवेश के दौर में भारत की अपनी शिक्षा व्यवस्था को समूल उखाड़ कर अंग्रेजी शिक्षा का जो बिरवा रोपा गया था वह स्वतंत्र भारत में विशाल वृक्ष बन कर किस प्रकार छाता गया और हम किस स्थिति में पहुंचे हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार की शिक्षा की प्रक्रिया और उसके सामाजिक स्तर पर होने वाले परिणाम सबके सामने हैं। देश की आवश्यकता और वर्तमान वैश्विक संदर्भ में शिक्षा का ढांचा और प्रक्रिया में बदलाव लाने की दृष्टि से पांच वर्ष लम्बे विचार विमर्श के बाद 2020 में नई शिक्षा नीति का मसौदा लाया गया। दुर्भाग्यवश कोरोना की लंबी महामारी के दौरान लड़खड़ाती पुरानी व्यवस्था भी बेपटरी हो गयी और नयी नीति भी शिक्षा का स्वभाव बदलने के लिए आगे बढ़ी। इन सबके बीच अस्त-व्यस्त शिक्षा व्यवस्था नई चुनौतियों से जूझ रही है। इस बीच जनसंख्या की दृष्टि से अब जब भारत विश्व में प्रथम स्थान पर पहुंच चुका है इसकी युवा पीढ़ी संख्या की दृष्टि से अब अधिक अपेक्षा करती है। वर्ष 2020 में आयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भारत की औपचारिक शिक्षा की चुनौतियों और संभावनाओं को पहचान कर उसका आकलन करते हुए समर्थ भारत के निर्माण के लिए शिक्षा के आयोजन के लिए एक खाका प्रस्तुत किया था। इस नीति के आने के साथ ही औपचारिक शिक्षा से जुड़े हितधारकों में चर्चाएं शुरू हो गयीं। नीति की संस्तुतियों को शिक्षा में सुधार की सकारात्मक पहल मानते हुए सबके द्वारा इसका स्वागत किया गया। जुलाई 2020 में प्रस्तुत की गयी इस नीति से जुड़ी कार्य योजनाएं दिसंबर 2020 तक आने लगीं। पिछले तीन वर्षों में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा एवं शोध के लिए सरकार ने जो कुछ भी कहा, सुना और किया, उसे नीति के क्रियान्वयन का हिस्सा बनाया गया। समग्र शिक्षा अभियान की अवधि को 2025-26 तक बढ़ा दिया गया। इसे नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन का माध्यम बनाया गया। 8 अपै्रल 2021 को सार्थक (स्टूडेंट्स एंड टीचर्स होलिस्टिक एडवांसमेंट थ्रो क्वालिटी एजुकेशन) नाम से एक वृहद् कार्ययोजना प्रस्तुत की गयी। यह कार्ययोजना वर्तमान में एक मार्गदर्शिका की भूमिका में कार्य कर रही है। किसी भी राज्य की विद्यालयी शिक्षा से जुड़ी आधिकारिक वेबसाइट पर इसके आलोक में बनायी जा रही योजनाओं का ब्योरा देखा जा सकता है। इसका उपयोग नीति के अंतर्गत किये जा रहे कार्यों की उपलब्धि को मापने के लिए भी किया जा रहा है। ध्यातव्य है कि नीति की एक प्रमुख संस्तुति आधारभूत साक्षरता और गणितीय योग्यता का संवर्धन करना था। इस दिशा में पहल करते हुए 5 जुलाई 2021 को निुपण भारत अभियान शुरू किया गया। इस अभियान का लक्ष्य रखा गया कि वर्ष 2026-27 में कक्षा तीन तक के बच्चे पढ़ने और गिनने की आधारभूत क्षमता से युक्त हो जाये। नीति के क्रियान्वयन की एक मुख्य एजेंसी एनसीईआरटी है। इसने इस दिशा में पहल करते हुए 29 जुलाई 2021 को विद्या प्रवेश नाम के खेल आधारित माड्यूल प्रस्तुत किया। इस संस्था के द्वारा आधारभूत स्तर (फाउंडेशनल स्तर) के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा प्रस्तुत की जा चुकी है। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की विद्यालयी शिक्षा के लिए भी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा का एक मसौदा चर्चा और फीडबैक के लिए आ चुका है। एनसीईआरटी ने सेवारत अध्यापकों के पेशेवर विकास के लिए संचालित निष्ठा कार्यक्रम को भी नीति के अनुसार सुधार कर संयोजित किया है। यह भी गौरतलब है कि लगभग हर तीन महीने पर किसी न किसी योजना का शुभारम्भ किया जा रहा है। इसके अंतर्गत विद्याजंलि और पीएम श्री योजना प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है। भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय 2020 के बाद जिस किसी भी कार्यक्रम और योजना को आरंभ कर रहा है कि उसे शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की शक्ल में प्रस्तुत कर रहा है। यह राहत की बात है कि केंद्र सरकार ने विगत वर्षों की तुलना में अपने शिक्षा बजट में लगभग 11.86 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है। उच्च शिक्षा के स्तर पर किसी केंद्रीकृत सुधार की जगह विश्वविद्यालय और राज्य सरकारों के स्तर पर सुधार के कुछ प्रयास हो रहे हैं। अधिकांश विश्वविद्यालयों की वेबसाइटों पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की कार्ययोजना का ब्योरा देखा जा सकता है। ये कार्य योजनाएं शिक्षा नीति से सूत्र को पहचानती हैं और इसके क्रियान्वयन का चरणबद्ध प्रस्ताव प्रस्तुत करती हैं। इनमें पाठ्यचर्या और शिक्षण प्रक्रिया में सुधार और आकलन की लचीली पद्धति का उल्लेख किया जाता है। एकेडमिक बैंक आफ क्रेडिट के विकास को जरूर बड़े पैमाने पर लागू किया गया है। हर विश्वविद्यालय राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के नाम पर नए तरह के अध्ययन कार्यक्रमों को आरंभ करने की योजना बनाने में अग्रसर हो रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा उत्साह पोर्टल आरंभ कर नीति क्रियान्वयन की निगरानी की कोशिश भी की जा रही है। इसके लिए बहुअनुशासनात्मकता, डिजिटल संसाधनों का अधिकाधिक प्रयोग, कौशल विकास, शोध, नवाचार, उद्यमिता और भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के अवसरों को को लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों की कार्ययोजना की निगरानी और उन्हें सहयोग देने का प्रयास जारी है। इस नीति के क्रियान्वयन का सकारात्मक परिणाम यह भी है कि उच्च शिक्षा के परिसरों में भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय भाषाएं अब एक महत्वपूर्ण घटक की तरह पहचानी जा रही हैं किंतु अभी यह रस्मी तौर पर हड़बड़ी में ही हो रहा है और शिक्षा की मुख्य धारा से इसका कोई आर्गेनिक रिश्ता नहीं बन पा रहा है। नेशनल रिसर्च फाउंडेशन खड़ा कर शोध में सुधार हेतु 2023-28 के लिए पचास हजार करोड़ रुपये आवंटित करने की खबर आयी है। विद्यालय स्तर पर नीति के प्रभाव में आवंटित वित का प्रस्तुतीकरण और समायोजन नए वर्गों में हो रहा है लेकिन आधारभूत समस्याएं पूर्ववत ही ज्यों की त्यों बनी हुई हैं। विद्यालयों में सीखने के कुछ संसाधन जरूर उपलब्ध हो रहे हैं परंतु सीखने-सिखाने की संस्कृति में कोई बदलाव नहीं हो रहा है। आज भी मास्टर साहब प्रशिक्षण लेने और देने में व्यस्त हैं। सरकार की अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन का हिसाब-किताब का बोझ उनके ही कंधों पर अभी भी जारी है। केंद्रीकृत योजनाओं का विभिन्न माध्यमों से प्रचार का काम विधिवत किया जा रहा है लेकिन विद्यालय स्तर पर इन्हें लेकर उदासीनता ही छायी हुई है। नई पाठ्यपुस्तकों के आने की सुगबुगाहट के बीच उनकी सामग्री की गलत सही आलोचना के दौर शुरू हो चुके हैं। यदि सरकारी तंत्र को छोड़ दिया जाए तो यह नीति सरकारी विद्यालयों पर जनता में भरोसा विकसित करने की दिशा में कोई खास प्रभाव छोड़ती नजर नहीं आ रही है। उच्च शिक्षा के स्तर पर कोविड के बाद से सत्र की नियमितता की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के आधार पर स्नातक और परास्नातक में प्रवेश विलंब से हो रहा है। उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं के परीक्षा परिणामों की घोषणा और स्नातक में प्रवेश की अवधि में लगभग तीन माह का अंतराल हो रहा है। उच्च शिक्षा के स्तर पर बहुअनुशासनात्मकता और सुनम्य व्यवस्था के बीच शिक्षण-अधिगम सुदृढ़ होने के बजाय शॉर्टकट अपनाता नजर आ रहा है। आम तौर पर देखें तो आज की सोच में शिक्षा के तीन मुख्य उद्देश्य ध्यान आकृष्ट करते हैं। वह अच्छी तरह से जीने के लिए जरूरी क्षमताओं को विकसित करती है जैसे पढ़ना, लिखना, डिजिटल साक्षरता, अपनी और समाज की देख-रेख करना, तथा लोगों के साथ मिल कर समूह में काम करना इत्यादि। इस आधारभूत जरूरत के साथ जुड़ी दूसरी आवश्यकता है मूल्यों और चरित्र या स्वभाव का निर्माण। सामाजिक दायित्व और नैतिकता पर मंडराते खतरों और लोभ लाभ के तीव्र आकर्षण के बीच सहानुभूति, आदर, सच्चाई, ईमानदारी, सहयोग और सदाचार के महत्व को कम नहीं आंका जा सकता। तीसरी बात है ज्ञान विशेष का निर्माण जो विभिन्न अध्ययन-अनुशासनों से जुड़ा होता है, उसका विकास। हालाँकि ये तीनों जुड़े हैं और साथ-साथ ही जीवन में चलते हैं। गौर तलब है कि इनके लिए वास्तविक सामाजिक परिस्थिति में सीखना अनिवार्य है। आन लाइन की तकनीकी इनके लिए किसी भी तरह से मुनासिब नहीं है और उससे बात नहीं बन सकती। इनके लिए सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों ही स्तरों पर सहज सहभागिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। शिक्षा केंद्रों की बदहाली के अनेक आयाम हैं जिन पर गौर करना जरूरी है। आज विद्यार्थियों के लिए वे विकर्षण का केंद्र बन रहे हैं और साधन जुटा कर वे विदेश की ओर रुख कर रहे हैं। बहुत सी सामान्य या उससे नीचे की संस्थाएं भी नैक से उच्च और उच्चतर ग्रेड का प्रमाणपत्र पा कर आगे बढ़ रही हैं। आम आदमी निरुपाय और भ्रमित हो रहा है। उच्च शिक्षा के अध्यापक नई शब्दावली और प्रस्तुति के बीच ऐसे उलझे हैं कि वे क्या और कैसे पढ़ाये में नवाचार करने के बजाय पुरानी पाठ्यचर्या पर नये कवर चढ़ाकर आगे बढ़ ले रहे हैं। उद्यमिता विकास के नाम पर उच्च शिक्षा संस्थानों और उद्यम आधारित अधिगम स्थलों के बीच न के बराबर तालमेल है। विद्या के परिसर में ज्ञान की संस्कृति की जगह जोड़ तोड़ की राजनीति और गैर अकादमिक आकांक्षाओं को साकार करने पर अधिक जोर दिया जाने लगा है। कुछ खास शैक्षिक संस्थाओं को छोड़ दें जिन्हें स्वायत्तता मिली है और जहां गुणवत्ता की स्वीकृति है अन्य संस्थाएं उदासीनता, दखलंदाजी और अव्यवस्था से ग्रस्त हो कर हर तरह के समझौतों के साथ बीमार हो रही हैं। सरकारी व्यवस्था जहां अनेक कमियों से जकड़ कर अनुत्पादक बनी हुई है वहीं निजी शिक्षा व्यवस्थाएं अनियंत्रित हो कर बेहद मंहगी हुई जा रही हैं। गुणवत्ता और मानक के स्तर की चिंता आकड़ों में फंस रही है। नयी शिक्षा नीति को जमीन पर उतारने के लिए शैक्षिक व्यवस्था में बदलाव लाने पर ही उसकी साख बचेगी। (लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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