एबीएन सेंट्रल डेस्क। हाल के महीनों में कई बार दूध की कीमतों में वृद्धि जहां आम आदमी का बजट बढ़ाने वाली साबित हुई है, वहीं देश के खाद्य पदार्थों के भाव में वृद्धि से सरकार के महंगाई कम करने के प्रयास भी बाधित हुए हैं। यह विडंबना ही है कि दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश भारत अपने नागरिकों की दूध की मांग पूरी करने में मुश्किल महसूस कर रहा है।
कोरोना काल में दूध आपूर्ति बाधित होने से उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ा। वहीं सरकारी आंकड़ों के अनुसार लंपी के चलते दो लाख से अधिक गौधन की क्षति हुई। स्वतंत्र पर्यवेक्षक इसकी संख्या कहीं ज्यादा बताते हैं। बहरहाल, इन आपदाओं से हुई क्षति की वजह से दूध उत्पादन में गिरावट आना स्वाभाविक था। जिसके चलते दूध उत्पादों के आयात के कयास लगाये जा रहे हैं।
हालांकि, यदि बाहर से सस्ता दूध आता है तो कीमत युद्ध से देश के दुग्ध उत्पादकों का संरक्षण करना भी एक चुनौती होगा। उल्लेखनीय है कि दुनिया का चौबीस फीसदी दूध उत्पादन भारत में होता है। बीते साल 22 करोड़ टन से अधिक दूध उत्पादन के आंकड़े हैं। लेकिन उसी अनुपात में दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश में दूध की मांग में भी तेजी से वृद्धि हो रही है।
यह वृद्धि आठ से दस फीसदी बतायी जा रही है। कोरोना काल व बाद में लंपी के चलते दूध उत्पादन में जो गिरावट आयी है, उससे इस साल कुल उत्पादन में गिरावट या स्थिर रहने के आसार हैं। तभी डेयरी उत्पाद मसलन मक्खन व घी के आयात की बात कही जा रही है। वहीं इस परिस्थितिजन्य संकट के अलावा राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये दूध के मुद्दे पर भी अब खूब सियासत होने लगी है।
कर्नाटक चुनाव से पहले दो दुग्ध उत्पादक ब्रांड्स को लेकर जमकर राजनीति हुई। अब यह मुद्दा तमिलनाडु में जा पहुंचा है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने केंद्रीय गृहमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है कि आविन के मिल्क शेड क्षेत्र में अमूल की दूध खरीद पर रोक लगायी जाये।
उल्लेखनीय है कर्नाटक चुनाव में अमूल की एंट्री को लेकर जमकर राजनीति हुई थी। कांग्रेस व जेडीएस ने यहां तक आरोप लगाया था कि गुजरात से आने वाला अमूल लोकल ब्रांड नंदिनी को खत्म करने की साजिश कर रहा है। यहां तक कि एक होटल संगठन ने बाकायदा अमूल उत्पादों के बहिष्कार की घोषणा की।
गुजरात कोआपरेटिव मिल्क फेडरेशन अपने ब्रांड अमूल के व्यवस्थित कारोबार के लिये जाना जाता है। जिसके चलते सहकारी दुग्ध उत्पादकों के जीवन में खासा सकारात्मक बदलाव भी आया है। वहीं ब्रांड चुनने की उपभोक्ता को आजादी है और इसके लिये बेहतर प्रबंधन भी एक शर्त है।
एक पहलू यह भी है कि देश में पशुओं के चारे के दाम में खासी तेजी आयी है और दुग्ध उत्पादकों का मुनाफा कम हुआ है। जिसके चलते हरियाणा समेत कई राज्यों में पशुपालक इस व्यवसाय से अपना हाथ खींच रहे हैं। यही वजह है कि मांग व आपूर्ति में असंतुलन से इसकी कीमतों में उछाल आ रहा है। कोरोना व लंपी के बाद जहां उत्पादन गिरा, वहीं मांग तेजी से बढ़ी है।
हालांकि, विदेशों से दूध का आयात लाभकारी नहीं हो सकता है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें मजबूत बनी हुई हैं। बेहतर होगा कि सरकार भी सहकारी क्षेत्र के दूध उत्पादन के आंकड़ों के साथ ही निजी व असंगठित क्षेत्र के उत्पादन का भी मूल्यांकन करे, ताकि देश की जरूरतों का न्यायसंगत मूल्यांकन हो सके।
वहीं दूसरी ओर सरकार को चारे की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि का भी नियमन करके दूध उत्पादकों को राहत देने प्रयास करना चाहिए। कोशिश हो कि चारे की फसल के रकबे में भी वृद्धि की जाये। साथ ही डेयरी क्षेत्र के सालाना उत्पादन व मांग में संतुलन स्थापित करने के भी गंभीर प्रयास हों।
यदि दुग्ध उत्पादक किसानों की दशा सुधरेगी तो उत्पादन में सुधार निश्चित रूप से महसूस किया जायेगा। सरकार को ध्यान रहे कि देश की एक बड़ी शाकाहारी आबादी के स्वास्थ्य के लिये दूध कैल्शियम, विटामिन और प्रोटीन का एक प्रमुख स्रोत भी है।
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