टीम एबीएन, लोहरदगा। सागर से भी गहरा है, नर्सेज का सेवा भाव उक्त बातें किस्को एमओआईसी डॉ अशोक ओड़ेया ने कही। वह शुक्रवार को किस्को सीएचसी में विश्व नर्सिंग दिवस और दुनिया की पहली नर्स नाइटिंगेल की जयंती समारोह को संबोधित करते हुए कही।
डॉ ओडेया ने कहा कि डॉक्टर सलाह और सर्जरी के बाद मरीज को नर्स के भरोसे पर छोड़ देते हैं। मरीज के स्वस्थ्य होने तक नर्स ही उपचार को अंजाम तक पहुंचाती है। बावजूद इसके हमारे इस भरोसेमंद कड़ी को कोई सामाजिक सम्मान नहीं है। न पर्याप्त सुविधाएं और सेवा के अनुरूप प्रतिफल की व्यवस्था है।
भारत में सिविल अस्पतालों में 80 फीसदी स्टाफ नर्स बगैर पदोन्नति के अल्प वेतन पर जीवन गुजारने को विवश हैं। नर्सिंग का अध्ययन डिप्लोमा के आगे बीएससी, एमएससी, पीएचडी तक जाता है। स्नातक चिकित्सा पाठ्यक्रम(एमबीबीएस) का 60 फीसदी तक नर्सिंग में पढ़ाया जाता है। स्वास्थ्य क्षेत्र के इस मेरुदंड पर सरकार का कभी ध्यान नहीं गया।
किस्को सीएचसी की बीएएनएम सीता कुमारी ने कहा कि नर्सिंग को विश्व के सबसे बड़े स्वास्थ्य पेशे के रूप में माना जाता है। नर्सिस को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्तर जैसे सभी पहलुओं के माध्यम से रोगी की देखभाल करने के लिए अच्छी तरह से प्रशिक्षित, शिक्षित और अनुभवी होना चाहिए।
जब पेशेवर चिकित्सक दूसरे रोगियों को देखने में व्यस्त होते है, तब रोगियों की चौबीस घंटे देखभाल करने के लिए नर्सेज की सुलभता और उपलब्धता होती हैं। नर्सिंग से रोगियों के मनोबल को बढ़ाने वाली और उनकी बीमारी को नियंत्रित करने में मित्रवत, सहायक और स्नेहशील होने की उम्मीद पर वह सदैव खरा उतरती है। इसी का नाम नर्सिंग सेवा है।
डॉ ओडेया ने बताया कि डब्ल्यूएमओ के मुताबिक चिकित्सा सेवा में 47% हिस्सा नर्सेज का है। 23% डॉक्टर का,5% से अधिक डेंटिस्ट का, 24% पारा मेडिकल कर्मियों का है। अगर इसे वैश्विक दृष्टिकोण से देखें, तो नर्सों की भागीदारी 60% है, पर भारत में यह भी काफी कम है। महज उनकी सहभागिता 13% ही है। कार्यक्रम को डॉ साजिद, नीलिमा तिर्की, मंजुला एक्का, तारामणि आदि ने संबोधित किया।
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