एबीएन सेंट्रल डेस्क। भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को अतिरिक्त मुआवजे के रूप में 7400 करोड़ रुपये नहीं मिलेंगे। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजय किशन कौल के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने आज यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) की उत्तराधिकारी फर्मों को बड़ी राहत देते हुए केंद्र सरकार की क्यूरेटिव याचिका को खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र को इस मामले में पहले आना चाहिए था न कि तीन दशक के बाद। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पीड़ितों को और ज्यादा मुआवजा देने के लिए फर्मों से अतिरिक्त 7 हजार 400 करोड़ रुपए की देने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अबडाऊ कैमिकल्स के साथ समझौता फिर से नहीं खुलेगा।
जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेके महेश्वर की पीठ ने भी 12 जनवरी को केंद्र की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हम याचिका को स्वीकार करते हैं, तो पेंडोरा बॉक्स खुल जायेगा।
कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार भारतीय रिज़र्व बैंक के पास मौजूद 50 करोड़ रुपये का इस्तेमाल लंबित दावों को मुआवजा देने के लिए करे। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समझौते को सिर्फ फ्रॉड के आधार पर रद्द किया जा सकता है। केंद्र सरकार की तरफ से समझौते में फ्रॉड को लेकर कोई दलील नहीं दी गयी।
फर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने मामले से जुड़े कई षडयंत्र सिद्धांतों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सिद्धांत में यह दावा किया गया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने समझौते से पहले पेरिस के एक होटल में यूसीसी अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन से मुलाकात की थी और कहा था कि एंडरसन तब तक अपने पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे।
केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी से कोर्ट ने सवाल किया था कि सरकार समीक्षा दायर किये बिना क्यूरेटिव पिटीशन कैसे दायर कर सकती है। केंद्र सरकार ने यह याचिका इसलिए दायर की थी, क्योंकि जहरीली गैस रिसाव के कारण होने वाली बीमारियों के लिए लंबे समय से पर्याप्त मुआवजे और सही इलाज के लिए संघर्ष कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने यह याचिका दिसंबर 2010 में दायर की थी। 7 जून 2010 को भोपाल की एक अदालत ने यूसीआईएल के 7 अधिकारियों को 2 साल की सजा सुनायी थी।
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