बढ़ती महंगाई और राजनीतिक प्रहसन

 

एबीएन डेस्क। आज जब मैंने उन्हें सुना तो स्वयं की बुद्धि और शिक्षा पर बड़ा गुस्सा आया, यूं तो हर दिन ही नेता बिरादरी के लोग कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं, लेकिन इनका बोलना बाकियों के बोलने से भिन्न था। इनकी माने तो हमें आजादी 99 बरस की लीज पर मिली है। यह कितनी नई बात बताई गई, जिससे इतिहासकार भी अनजान थे। हमने कभी ऐसा नहीं सुना, पढ़ने का तो सवाल ही नहीं उठता। हम यहां आजादी का अमृत महोत्सव मनाने में लगे हुए हैं और अब जाकर पता चल रहा है कि 25 बरस बाद आजादी की वैलिडिटी उनके कहें अनुसार खत्म होने वाली है! उन्हें सुन यह सिद्ध हो गया कि इतिहास से जुड़े झूठ को इतने आत्मविश्वास के साथ बोला जाए तो वह सच लगने लगता है। अब इस देश में स्टैण्डप कॉमेडियन क्यों अप्रासंगिक हो रहे हैं, इस बात का जवाब भी मिल गया है। उनके इस बयान के बाद हास्य कलाकार ने अपना बोरिया-बिस्तर यह कहते हुए समेट लिया कि अब भला मेरा यहां काम ही क्या रह गया है? लोगों को हंसाने का सारा दारोमदार राजनीति ने अपने ऊपर ले लिया है। नतीजतन कॉमेडियन को स्टार्टअप की तलाश में भटकना पड़ रहा है। अब तो बच्चे भी टीवी पर नेताओं को देख हसने लगे हैं। शायद उन्हें उनमें टॉम एंड जैरी, मोटू-पतलू या डोरेमॉन का कोई किरदार नजर आ जाता हो। पिछले छह-सात बरस में पार्टी प्रवक्ताओं ने जो मुकाम हासिल किया है वह अतुलनीय है। उन्हें सुनने पर उनके तर्क और तथ्य के आगे वाह किए बिना नहीं रहा जा सकता, यह बात अलग है कि आह निकल रही होती है। क्या सच, क्या झूठ, इसका अंतर ही समाप्त करके रख दिया है। बेचारी अभागी जनता एक दफे तो न्यूज एंकर और पार्टी प्रवक्ता में कन्फ्यूज हो रही होती है कि दोनों में असली प्रवक्ता कौन है। इस दौर में जब इतिहास के किसी ऐसे सच से पर्दा उठता है तो महंगाई के उत्सव में हंसी के फव्वारे छूट पड़ते हैं। महंगाई का तनाव कम करने के लिए ऐसे बयान बहुत जरूरी हैं। वैसे उन्होंने यह तो बताया कि आजादी 99 साल की लीज पर मिली है, लेकिन यह बताना तो भूल ही गई कि इसे आगे बढ़वाने के लिए हमें क्या करना होगा? इधर पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल भरवाते समय हर दिन मशीन में जीरो के बजाय मूल्य को पहले देखने वाला आम आदमी इस दुविधा में है कि महंगाई से लड़ने में ही उसके प्राण निकले जा रहे हैं, ऐसे में 25 बरस बाद आजादी की लड़ाई के लिए भी तैयार होना होगा, यह उसे अभी से चिंता में डाले देता है। अब तक तो सिर्फ यही कहा जाता था कि गलत इतिहास पढ़ाया गया है, किसे पढ़ाया गया है, अब यह भी समझ आ रहा है। यदि एनसीबी वाकई अपना काम ठीक से करती तो कम से कम इस तरह के बयान तो नहीं आते। महंगाई को आप वैसे क्रांति से जोड़ सकते हैं जिसमें शासकों ने कहा था देश तुम्हें देता है सबकुछ तुम भी तो कुछ देना सीखों। हम ठहरे गुलाम ले-ले कर इतने आदी हो गये कि हम समझ ही नहीं पाते कि देना हमारे स्वभाव में है नहीं। कई दर्जन लोग कहते हैं यह महंगाई विकास के लिये है अगर आप इसके शिकंजे से जिंदा बच गये तो आपके लिये एक शानदार भारत होगा, सभी सुविधा से युक्त धनपतियों से भरा खुश होने के लिये। जय हो इन राजनेताओं की।

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