एबीएन एडिटोरिलय डेस्क (अजयदीप बाधवा)। जीएसटी कंपनसेशन सेस क्या है जब भारत में सरकार ने वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) लाने की बात आरंभ की थी तो कुछ राज्यों और राजनीतिज्ञों द्वारा उसका विरोध किया गया। कुछ राज्यों के विरोध के पीछे उनका अपनी आमदनी कम होने का भय था। ऐसा भारत के विकसित राज्य, जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात आदि ज्यादा सोच रहे थे। इस सोच के पीछे कारण भी गलत न था। वस्तुत: भारत में दो प्रकार के राज्य थे, (या आज भी हैं)। एक वो जिनके यहां बहुत उद्योग धंधे थे और हैं वा विकसित हैं, और दूसरे ओर वैसे राज्य, जहां औद्योगिक विकास काफी कम था, पर जनसंख्या बहुत ज्यादा थी, जैसे बिहार, उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि। पहले प्रकार के राज्यों को भय था कि जीएसटी आने के बाद ना सिर्फ विक्रय कर (सेल्स टैक्स / वैट) और एक्साइज ड्यूटी बंद हो जाएगी जो उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा थी, साथ ही जीएसटी की कमाई भी कम होगी क्योंकि जीएसटी एक डेस्टिनेशन आधारित कर प्रणाली है जिसका इसका मतलब था उत्पादों को बनाने वाले राज्यों के स्थान पर उन राज्यों को अधिक जीएसटी आय मिलेगी जहां ये उत्पाद बिकेंगे।
उनका मानना था कि वैसे राज्य जो स्वयं ज्यादा उत्पादन नहीं करते, बल्कि दूसरे राज्यों के उत्पादों का उपभोग करते है, की आमदनी बढ़ जायेगी क्योंकि उनकी जनसंख्या ज्यादा है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह माना जा रहा था जो राज्य मेहनत कर औद्योगिक विकास बढ़ा रहे है उनकी आमदनी घट जायेगी और निकम्मे राज्यों की बढ़ जायेगी। चूंकि यह बात कुछ हद तक सही भी थी तो भारत सरकार ने इसके लिए जीएसटी कंपनसेशन (क्षतिपूर्ति) सेस का रास्ता निकाला। भारत सरकार ने यह निर्णय लिया कि वह कुछ वैसे उत्पादों और सेवाओं पर सामान्य जीएसटी के अलावा जीएसटी सेस लगाएगी जिनका प्रयोग आम व्यक्ति नहीं करता है और उस से होने वाली आमदनी से वैसे राज्यों को भरपाई करेगी जिनकी आमदनी जीएसटी आने के बाद कम हो जाएगी।
जीएसटी आने के बाद भारत सरकार ने ऐसा ही किया और कई उत्पादों पर जीएसटी कंपनसेशन सेस भी लगा दिया और उस से होने वाली आमदनी राज्यों के बीच उनको होने वाली हानि के हिसाब से वितरित करनी आरंभ कर दी। आरंभ में यह सेस 1 जुलाई 2017 से पांच वर्ष के लिया लगाया गया था पर इस वर्ष 1 जुलाई 2022 से इसे और आगे पांच साल के लिए बढ़ा दिया गया है।
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