लोकतंत्र को स्वार्थ के लिए हथियार बनाकर इस्तेमाल करना बंद करे दुनिया

 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क (कुमार गौरव, कोडरमा)। दुनिया लोकतंत्र को स्वार्थ के लिए हथियार बनाकर इस्तेमाल करना बंद करे। क्योंकि इससे वैसे राष्ट्र अपनी तात्कालिक स्वार्थ को भले ही पूर्ण कर लेते है। लेकिन इसका खामियाजा पूरे विश्व को भुगतना पड़ता है। ‘संप्रभुता’ लोकतंत्र की न्याय की रक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र है। लेकिन ताना शाह हियो ने लोकतंत्र को अपनी जागीर बना, वही ब्रह्मास्त्र से कुकर्म करते चले आ रहे हैं।  
जब भी विश्व में तृष्टीकरण की चाल चली जाती है। लोकतंत्र कमजोर हो जाती है। उस बकरी की बच्चे की तरह जो दो चार बूंद दूध की भूखी है मगर उसका मेमीयाना सुनकर ऐसा लगता है मानो उसकी सांसें अब छूट चली। और जब ऐसा होता है, तो वैसे राष्ट्र जो लोकतंत्र को अपनी आत्मा बना बैठे हंै वहां की शासन व्यवस्था वेंटिलेसन पर चली जाती है। अराजकता इतनी बढ़ जाती है कि वहां की सरकारें भले कुछ न कहे लेकिन गृह युद्ध एैसी स्थितियां बन जाती है। वैसे राष्ट्रों का आवाम जो लोकतंत्र की ईबादत लिखने में सकारात्मक कर्म पथ रहते हैं। उन्हेें लोकतंत्र से घिन्न आने लगती है। लोकतंत्र की धज्जियां कुछ राष्ट्र ही उड़ाते हैं, मगर इसकी कीमत लोकतांत्रिक हर राष्ट्र को चुकानी पड़ती है।  
ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं, द्वितीय विश्वयुद्ध पर गौर कर लीजिए। दुनिया के हुकुमों की हकीकत दूध का दूध, पानी का पानी की तरह साफ हो जायेगी। द्वितीय विश्वयुद्ध में दुनिया दो गुटों मे पूर्ण रुपेण बंट चुकी थी। अमेरिका इसमें तटस्थ थी। क्योंकि अमेरिका की फौज युद्ध में शामिल नही थी। यह एक पक्ष थी अमेरिका की। मगर यह तो सिर्फ तृष्टीकरण के तरीके थे। अगर न्याय की दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह अमेरिका की दादागिरी तथा धौंस थी। जिसे बिहार की एक लोकउक्ति चोरी भी सीना जोरी भी को चरितार्थ करती है। अमेरिकी फौज लड़ाई में उतरी नहीं। मगर अमेरिका की दुलरुआ राष्ट्र विश्व युद्ध मे टिके हुए थे। उसका कारण था अमेरिकी हथियार। अमेरिका शुरुआती युद्ध में न उतरकर भी युद्ध लड़ रही थी क्योंकि अमेरिका अपने राष्ट्रों को हथियार मुहैया करा रही थी, तो क्या ये नहीं हुई कि अमेरिका तो शुरू से ही चाहता था कि विश्व में एक ग्लोबल युद्ध हो, जिस युद्ध मे लोकतंत्र के पावर सेन्टर पूरा पश्चिमी राष्ट्र युद्ध में लिप्त हो जाए। जिससे विश्व में जो सबसे ज्यादा उपनिवेश पश्चिमी राष्ट्रों के अधीन है वहां उनकी साख टूटे।  
अराजकता तथा युद्ध की विभीषीका से ऊब कर उपनिवेश पश्चिमी राष्ट्रों के खिलाफ बगावत कर दे। उनसे अपनी सारी पिंड छुड़ा ले। ताकि पश्चिमी राष्ट्रों के प्रोडक्ट का उपनिवेशों पर एकाधिकार है वह समाप्त हो। ताकि उस बाजार की जरुरत अमेरिका पूरा कर अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनायी जा सके। अमेरिका की कूटनीति जानती थी कि जब तक ये राष्ट्र ग्लोबल युद्ध में फंसेंगे नहीं, तब तक इनका बाजार टूटेगा नहीं। क्योंकि उस समयावधि में पश्चिमी राष्ट्रों के बाजार जहां थे वहां उनका एकल साम्राज्य था। पश्चिमी राष्ट्र उस अवधि में अपने अपने बाजार में विकल्प के रूप में दूसरा कहीं रहने ही नहीं दिया।  
अमेरिका अच्छे से जानती था कि अगर उसे विश्व के सबसे बड़े बाजार पर अपना नियंत्रण करना है तो पश्चिमी राष्ट्रों को युद्ध में धकेल दो। स्वत: पश्चिम की हर राष्ट्र का बाजार उसके पास चला आयेगा। द्वितीय विश्वयुद्ध काल में पष्चिमी राष्ट्रो में भी आपस में फूट थी। वे अपनी ताकत तथा पैसे की घमण्ड में इतने मतवाले हो गए थे कि किसी भी राष्ट्री की सम्प्रभुता उनकी जूतों के नीचे तथा मानवता उनके गुलाम हुआ करती थी। अमेरिका इसका जबरजस्त फायदा उठाया। उन राष्ट्रो को खूब हथियार देकर खूब पैसा कमाया। नौबत यहां तक आ गई कि वह पष्चिम जो दुनिया की भगवान थी, सबसे ज्यादा ताकतवार थी उसे भी बैसाखी की जरुरत होने लगी। अमेरिका अपनी कूटनिति से पष्चिमी राष्ट्रो की सच्च हमदर्द बन उनके बाजारो पर कब्जा करता गया और मानव की नरसंहार करने वाली हथियार भी उन राष्ट्रों को बेचकर धन भी खूब कमाया। और पष्चिम उसे अपना मित्र मानने लगे जो आज भी जारी है मगर किसी वक्त दुनिया पर राज करने वाले पष्चिम अमेरिका की कूटनिति के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया। दुनिया के वे मुल्क जो द्वितीय विश्वयुद्ध में दुसरे खेमे के थे। उन्होने युद्ध शुरू अपने विरुद्ध राष्ट्रो की सैन्य, आर्थिक क्षमता जान कर अपनी रणनिति बनायी थी उसकी वह नीतियां जीत से दूर हो रही थी। उसका खास कारण था अमेरिका के हथियार ,जो उस जमाने में दुनिया के सबसे आधुनिक हथियार थे। अच्छा चूंकि अमेरिका युद्ध से दूर थी इसलिए दूसरे खेमे की राष्ट्र अमेरिका पर सीधा हमला नही कर पा रहे थे। लेकिन इससे उन्हे भारी नुकसान हो रहा था। अमेरिकी हथियारें जापान को ज्यादा नुकसान दे रही थी। इसे जापान पचा नही पाया। हक्कीमत भी थी कि युद्ध मे हथियारों को मुहैया कराने वाला राष्ट्र भी युद्ध का हिस्सेदार होता है। जापान अमेरिका के पर्ल हर्बल मे वायु सेना पर कार्यवाही कर दी। 

जापान की इस हमले में 50-55 हजार फैजी तथा अमेरिका के नागरिक मारे गए। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि अमेरिका इसे युद्ध के अन्दर होने वाली हवाई हमला ना कहकर इसे नरसंहार का नाम देकर विश्व की सहानभूतियाँ बटोरने की कोशिश की जिसमें अमेरिका सफल भी हुआ। अब तो द्वितीय विश्वयुद्ध जंग ना होकर क्रूरता की हर हद पार कर दी। और अमेरिका जापान की हिरोषिमा तथा नागासाकी पर परमानु बम गिराकर लोकतंत्र की तृष्टीकरण की बहुत बड़ी विसात बिछा दी। इससे जापान का ही नुकसान नही हुआ बल्कि समुचे विश्व में परमानेन्ट असुरक्षा, अराजकता की डर बैठ गई। हर राष्ट्रो में हथियरों की होड़ हो गई। और पृथ्वी जो ब्रँम्हाण्ड में एक ही है उसे हजारो बार मिटा देने की हथियारे बना ली गई। काश जितने पैसे मानव नाश पृथ्वी विनाश के लिए बहाई गई। उतने पैसे से तो यही हमारी पृथ्वी स्वर्ग सी सज जाती। मगर एैसा किसी ने नही किया। अमेरिका का परमाणु भले ही तत्कालिक विश्वयुद्ध बन्द करा दी, मगर दुनिया मे परमाणु होड़ बढ़ गई। हर राष्ट्र अपनी आजादी को सुरक्षा कवच परमाणु का देना चाहने लगी। जबकि परमाणु की विविषिका जापान ही बता सकती है। जब पर्ल हर्बल नरसंहार थी तो हीरोसीमा तथा नागासाकी क्या थी। जब हत्या का इंसाफ हत्या है और जब नरसंहार का बदला नरसंहार है तो इण्डिया एैसे इन्साफ करने वाले अमेरिका से अपना इन्साफ दिलाने की मांग करती है। 

अमेरिका जिसके गोद में लोकतंत्र है वह साकारात्मक सोच रख इण्डिया का हिसाब करे। क्योंकि विश्व की सबसे पहले तथा सबसे सबसे बड़ी नरसंहार तैमुरगल ने की तैमुरगल ने 12वी सदी में ही एक लाख आवाम की हत्या कराई थी। अच्छा चलो यह पूरानी बाते है नई बाते आधुनिक विश्व की करते है। आधुनिक विश्व में अंग्रेजो ने इण्डिया के जालियावाला बाग में आधुनिक विश्व की सबसे बड़ी नरसंहार कराई। आप हमारी ये इन्साफ दिला दे। यकीन मानिए इंडिया भगवान की तरह अमेरिका की पूजा करेगी। अगर आप दिला नही सकते तो आप इण्डिया को इंसाफ ले लेने के लिए आजाद छोड़ दे। आप लोकतंत्र के आइडियल है आपकी इन्साफ सर आँखों पर तो क्या मंगोल तथा ब्रिटेन पर इण्डिया को भी परमाणु बम पटक कर अपनी नरसंहार का बदला लेना चाहिए। लेकिन देखिए इण्डिया के संस्कार इण्डिया कभी भी परमाणु उपयोग की बात नही करती तथा उस नरसंहार को माफ कर मानव के लिए मानवता के लिए, आगे बढ़ गई है। और इस नरसंहार को उनकी नीयति तथा अपनी कुबार्नी मानकर अपना वतन सुन्दर वतन, सभ्य वतन, निष्ठावान वतन गढ़ने में लगी है। इण्डिया लोकतंत्र की रास्तो मे बहुत दूर निकल गई है। अगर लोकतंत्र के दिशा की ओर देखी जाए, तो इतना हो जाने के बाद भी इण्डिया ऊगता सूरज की तरह हर अधकार को रौशन दान कर रही है। जय हिन्द... 
 

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