कुंडली कालसर्प दोष से पुत्र प्राप्ति में बाधा : संदीप शास्त्री

 

टीम एबीएन, टाटीझरिया। प्रखंड के झरपो निवासी संदीप शास्त्री ने ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली मे कालसर्प दोष (सर्पशाप) से होने वाले पुत्र बाधा निवारण के संबंध में कहा कि सिसुते राहौ भौमदृष्टे भौम्भे वा सर्पशापद्विपुत्र।।८५।। यमे सुते चन्द्रदृष्टे सुतेशे राहुयुते सर्पशापद्वि पुत्र:।।८६।। सराहोपुत्र कारक: पुत्रेशे अबले भौमङ्गेशी  यूतौ सर्पशापद्वि पुत्र:।।८७।। सुतकारके सारे राखङ्गे पुत्रेशे त्रिके सर्पशापद्विपुत्र:।।८८।। पुत्रशे ज्ञे सारे कुजाशें राहु मानन्दीयुतेङ्गे च सर्पशापद्वि पुत्र:।।८९।। सुतेशो भौमे सुते राहौ सौम्यदृष्टे सर्पशापद्विपुत्र:।।१०।। सुताङ्गेशौ विबलो सज्ञेज्यौसुते पाप: सर्पशापद्विपुत्र:।।११।। लग्नेशे राहुयुते पुत्रेशे भौमयुते कारके राहुदृष्टे सर्पशापद्विपुत्र:।।१२।। पंचम भाव मे मंगल राहु मंगल से दुष्ट हो अथवा पंचम भाव मे मंगल की राशि का राहु स्थित हो।।८५।। पंचम भावस्थ चन्द्रमा से दृष्टि हो तथा पंचमेश राहु से युक्त हो।।८६।। 

पंचम भाव कारक यदि राहु  युक्त हो, पंचमेश निर्बल हो तथा लग्नेश भौम युक्त हो।।८७।। पंचम भावकारक यदि भौम से युक्त हो लग्न में राहु स्थित हो और पंचमेश त्रिकस्थ हो।।८८।। पंचमेश बुध भौम के नवांश में स्थिर होकर भौम से युत तथा राहु गुलिक से युक्त होकर लग्न में स्थित हो।।८९।। पंचमेश मंगल हो तथा पंचम भाव में राहु शुभ ग्रहों से दृष्ट अथवा युत हो।।९०।। पंचमेश और लग्नेश निर्बल होकर बुध और बृहस्पति से युत हो तथा पंचम भाव में पाप ग्रह स्थित हो।।९१।। लग्नेश राहु से और पंचमेश मंगल से युक्त हो तथा पंचम भावकारक राहु से दृष्ट हो।।९२।। 

उक्त सभी स्थितियों में सर्पशाप वंश में संतान (पुत्र) का अभाव होता है।।८५-१२।। उपर्युक्त विवरण से एक बात स्पस्ट हो जाती है कि यदि पंचम भाव लग्न पंचमेश या पंचम भाव कारक यदि मंगल राहु या केतू से किसी भी प्रकार का सबंध करते हो और निर्बल हो तो सर्पशाप के फलस्वरूप संतान सुख का अभाव होता है। जातक परिजात में भी- राहुकेतुयुते दृष्टे पंचमे बलवर्जिते। तादिशे वा तथा प्राप्ते  सर्पदोषात्सुतक्षय:।। पंचम भाव अथवा पंचमेश निर्बल होकर राहु या केतु से युत अथवा दृष्ट हो तो सर्प के शाप से पुत्र की हानि होती है। 
जानें क्या है इसकी निवारण विधि 
यदि पुत्रोत्पति में ऐसी बाधा हो तो चांदी का नाग-नागिन बनाकर  भगवान शिव के पास रखकर अभिषेक करें एवं नाग नागिन को बहते हुए जल मे प्रवाहित करें। तत्पश्चात अपने गांव के नजदीकी आसपास के दुर्गा माता मंदिर, शीतला माता मंदिर (देवी मंडप) प्रांगण में जाकर श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें। निश्चित ही माता जगत जननी, करुणामयी, ममतामयी एवं भागवत कृपा से पुत्रोत्पत्ति होगी, इसमें संदेह नहीं।

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