निवेशकों के लिए सबक है मंदी का माहौल

 

एबीएन बिजनेस डेस्क। तमाम नकारात्मक खबरों के बावजूद शेयर बाजारों में बदलाव आएगा। बस दो परिदृश्यों से बचने की आवश्यकता है। बाजार में मंदी का माहौल है और जिंस को छोड़कर हर परिसंपत्ति वर्ग नुकसान में है। ऐसे में बिकवालों की ओर से और अधिक मंदी की बातें होना स्वाभाविक है। दुनिया भर में यही हो रहा है। पिछले तेजी के चक्र में जो गलतियां की गई थीं वे अब सामने आ रही हैं। बात चाहे मूल्यांकन की हो, वृद्धि अनुमानों की या वृद्धि के स्थायित्व की तो कई निवेशक फिलहाल नासमझ नजर आ रहे हैं। आप आखिर अमुक कंपनी को 40 के मूल्य/बिक्री अनुपात पर कैसे कर सकते हैं? आपने कैसे मान लिया कि महामारी के बाद भी एबीसी क्षेत्र में डिजिटल पहुंच 35-40 फीसदी की दर से बढ़ती रहेगी? ये कुछ नमूने हैं जिनसे पता चलता है कि कैसे विशेष शेयरों को लेकर सूक्ष्म स्तर पर बातचीत की जा रही है। वृहद स्तर पर देखें तो ब्याज दर के हमेशा शून्य रहने की अपेक्षा कैसे की गई? मुद्रास्फीति के बढ़ने का अनुमान क्यों नहीं लगाया गया जबकि 2020 में वैश्विक वित्तीय और मौद्रिक नीति संबंधी हालत खराब थी। तमाम तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं। शायद उस वक्त आकलन नहीं कर पाने के प्रायश्चित में अनेक टीकाकार अत्यधिक सतर्कता बरत रहे हैं। इस बात पर भारी भरकम शोध लिखे जा रहे हैं कि क्यों दुनिया का अंत होने वाला है और बाजारों में आगे और गिरावट आनी है। इन आशंकाओं को समझा जा सकता है और ये वास्तविक भी हैं। यूरोप में पहले ही मंदी का माहौल है और 2023 में अमेरिका में भी गिरावट आनी तय है। मुद्रास्फीति अभी ?भी नियंत्रण में नहीं है और वास्तविक दरें ऋणात्मक बनी हुई हैं। आय संबंधी अनुमानों में 15-20 फीसदी की गिरावट आनी तय है। बेरोजगारी दर अमेरिका में रिकॉर्ड निचले स्तर पर है। जब भी मंदी आती है रोजगार में गिरावट आती ही है। केंद्रीय बैंक की नीतियों के सामान्यीकरण को लेकर भय का माहौल है। क्वांटिटेटिव टाइटनिंग यानी मौद्रिक सख्ती का क्या असर होगा? हमें नहीं पता क्योंकि हमने पहले कभी ऐसा देखा नहीं। वित्तीय तंत्र बढ़ती ब्याज दरों से कैसे निपटेगा? इन हालात को समझा जा सकता है और यह तार्किक भी है तथा हम क्वांटिटेटिव टाइटनिंग जैसे पहलुओं को समझ पा रहे हैं लेकिन इनके बावजूद वित्तीय बाजारों में एक ठोस हकीकत हमारे सामने है। अगर हम अतीत में मंदी की तमाम घटनाओं पर नजर डालें तो हमें पता चलेगा कि तमाम वास्तविक आर्थिक और वित्तीय बाजार मानकों पर शेयर बाजार एकदम निचले स्तर पर रहते हैं। वे अन्य संकेतकों से कई माह पहले निचले स्तर पर आ जाते हैं। यही कारण है कि अमेरिका में उन्हें प्रमुख आर्थिक संकेतकों में गिना जाता है। सामान्य रुझान यही है कि शेयर बाजार सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के छह माह पहले निचले स्तर पर आ जाता है। जीडीपी के बाद वेतन भत्तों और आय में गिरावट आती है। बाजार इन संकेतकों को देखते हैं और सुधार की तैयारी में लगते हैं। ऐसे में केवल इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि शेयर बाजार निचले स्तर पर जायेंगे क्योंकि जीडीपी, वेतन-भत्तों और आय में गिरावट की खबर देर से आती है। शेयर बाजार ने केवल एक बार देर से संकेत दिया था और वह था 2000 का समय जब शेयर बाजार तब नीचे गए थे जब वेतन गिरकर दोबारा बढ़ने लगा था। उस समय आय भी शेयर बाजार की तुलना में 12 महीना पहले न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई थी। उस समय भी मंदी की स्थिति शायद ही बनी थी। तकनीकी क्षेत्र की बात करें तो नैसडैक में तेज गिरावट आई जबकि व्यापक सूचकांक बात में नीचे आये। एक आर्थिक संकेतक जिसके शेयर बाजारों के साथ ही नीचे आने की संभावना होती है वह है आपूर्ति प्रबंधन संस्थान यानी आईएसएम का क्रय प्रबंधक सूचकांक जो शेयर बाजारों की गिरावट के एक दो माह के भीतर निचले स्तर पर आ गया। हर निवेशक को इस संकेतक पर भी नजर रखनी चाहिए। मेरा यह भी मानना है कि बाजारों में गिरावट के ज्यादातर मामलों में अधिकतर नुकसान गिरावट के शुरुआती 12-15 महीनों में होता है। शुरूआती गिरावट के बाद या तो बाजार में दोबारा तेजी आने लगती है या फिर एक विस्तारित अवधि के लिए बाजार किसी खास दिशा का रुख कर लेता है। हम वर्ष के अंत की ओर बढ़ रहे हैं और इस दौरान दोनों दिशाओं में तेज हलचल के साथ जहां बाजार अस्थिर बना रहेगा वहीं वैश्विक बाजारों में शेयरों का वजन बढ़ाने का अवसर भी होगा। यह याद रखना जरूरी है कि जिस समय यह होगा उस वक्त भी खबरें नकारात्मक रहेंगी। यह भी संभव है कि जिन टीकाकारों ने बाजार के रुझान में बदलाव को दर्ज किया और जो मंदी का रुख रखे हुए थे, वे बहुत तेजी का रुख नहीं अपनायेंगे। वर्षों तक शून्य ब्याज दर और प्रचुर मात्रा में नकदी वाले दौर से निकलते हुए एक मुखर विचार ऐसा भी है जिसे पूरा यकीन है कि बिना वित्तीय तंत्र में किसी दुर्घटनापूर्ण स्थिति के निर्माण के हम मौद्रिक नीति को सामान्य नहीं कर सकते हैं। ऐसी किसी दुर्घटना का अर्थ यही होगा कि सभी दांव नाकाम हो जाएं और यह आकलन करना असंभव हो जाए कि बाजार किस प्रकार की भूमिका निभायेंगे? एक अन्य परिदृश्य यह भी है कि मुद्रास्फीति के पूरी तरह ध्वस्त हो जाने के बाद लक्ष्य पर वापसी करने में कई वर्षों का समय लगेगा। इस मामले में भी तयशुदा तौर तरीके शायद काम न आयें। वैश्विक और खासतौर पर अमेरिकी बाजारों का अपने निचले स्तर को छूना भारतीय शेयर बाजारों के नजरिये से बहुत आवश्यक है। भारतीय बाजारों के लिए सबसे बड़ा जो?खिम वै?श्विक कारक हैं। अधिकांश आवंटकों को यकीन है कि भारत बहुत महंगा है। बीते कुछ वर्षों में बाजार का प्रदर्शन बेहतर रहा है और 2022 में भी उसने मजबूती दिखाई है। भारत कई निवेशकों के लिए ऐसा बाजार रहेगा जहां वे अभी भी पैसा कमा सकते हैं। जब तक वैश्विक और उभरते बाजार के पोर्टफोलियो दबाव में रहेंगे तब तक भारत से बिकवाली का दबाव रहेगा। बीते बारह महीनों में द्वितीयक बाजारों से 40 अरब डॉलर की बिकवाली हुई है। यह सिलसिला तब तक जारी रहेगा जब तक वैश्विक बाजार दबाव में रहेंगे। घरेलू आवक को बचाव मुहैया है और वह पूंजी के इस बहिर्गमन की भरपाई कर देगी लेकिन बेहतर होगा अगर यह मुश्किल पूंजी की आवक की दृष्टि से अनुकूल हालात में बदल सके तो बेहतर होगा। हालांकि वैश्विक माहौल के मद्देनजर सतर्कता बरतना उचित होगा लेकिन हमें इस बात को लेकर भी सावधान रहना होगा कि मंदी की बातों के दोहराव में न फंस जायें। मंदी से जुड़ी तमाम बातों के बीच भी शेयर बाजार की हालत बदलेगी जरूर।

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