टीम एबीएन, रांची। झारखंड में आए दिन ग्रामीण के घरों में हाथी का उत्पात मचाने और इंसान पर हाथी द्वारा जानलेवा हमला करने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। इसी बीच अब एक और मामला सामने आया है, जिसमें हाथी की जान को भी खतरा हो रहा है। अगर राज्य के कई जिलों में जंगली हाथियों का आतंक है, तो दूसरी तरफ हाथियों का भी शिकार हो रहा है। राज्य के हजारीबाग, सिमडेगा, गिरिडीह, खूंटी सहित 15 से अधिक जिले हैं, जहां जंगली हाथियों का आतंक है। यहां हाथियों का झुंड कभी तो किसानों की फसल बर्बाद करने में लगे हुए हैं तो कभी ग्रामीण के घर तोड़ देते हैं। अब तक हाथियों के हमले में 55 लोगों की जान गई है। हजारीबाग जिले से सबसे ज्यादा हाथियों के गांव में घर तोड़ने या फसल बर्बाद करने की खबरें आती है। इस साल अब तक इन इलाकों में 15 लोगों की जान जा चुकी है अगर दूसरे जिलों के आंकड़ों पर नजर डालें तो गिरिडीह में 9, लातेहार में 8, खूंटी में 6, चतरा, बोकारो और जामताड़ा में 3-3 लोग हाथियों के हमले का शिकार हुए हैं। वहीं, दूसरी तरफ हाथियों की भी मौत हो रही है। हाथियों के लिए खेतों की सुरक्षा के लिए लगे इलेक्ट्रिक तार मौत की वजह बन रहे हैं। रामगढ़ जिला में डूमरडीह जंगल में 15 सितंबर को एक हाथी के मारे जाने की खबर सामने आई थी। यहां हाथी को मारकर उसके दांत काटकर तस्कर ले गये थे। 3 दिनों के बाद तस्करों को गिरफ्तार कर लिया था। जानकारी के मुताबिक एक जंगल से दूसरे जंगल आने-जाने के लिए हाथियों के सुरक्षित में झारखंड में 14 कॉरिडोर है, लेकिन एक भी अधिसूचित नहीं है। हालांकि राज्य के कई सड़कों पर आप हाथी कॉरिडोर का बोर्ड देखेंगे लेकिन वो पारंपरिक रास्ते हैं। झारखंड से किसी दूसरे राज्य के जंगलों में हाथियों के प्रवेश का कोई आधिकारिक कॉरिडोर नहीं है। जुलाई से सितंबर के दौरान हाथी प्रजनन करते हैं। इस समय हाथियों के हार्मोन में भी बदलाव आता है जिससे वो आक्रामक हो जाते है। डीएफओ श्रीकांत ने बताया कि झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में मुख्य रूप से खनन होता है। खनन की वजह से हाथियों के कई पारंपरिक रास्ते बंद हो गये हैं, कहीं खनन की वजह से बड़ा गड्ढा है जिसे हाथी पार नहीं कर पाते तो कहीं उनके लिए रास्ता पूरी तरह बंद है। उन्होंने बताया कि ऐसे में हाथी किसी दूसरे रास्ते की तलाश करते हैं, कई गांवों में लोग हैरान हो जाते हैं कि हाथी आजतक इस गांव तक नहीं पहुंचे और आज पहुंच गए। अगर उनके रास्ते रोके गये हैं तो वह भटक कर दूसरे गांवों तक पहुंचेंगे ही। श्रीकांत वर्मा ने बताया अब तक आधिकारिक तौर पर या लिखित हाथियों का कॉरिडोर नहीं है, लेकिन हाथी सालों से पारंपरिक रास्ते पर चलते हैं। उन्हें सब कुछ पता होता है कि उन्हें खाना कहां मिलेगा, पानी कहां मिलेगा, कहां विश्राम कर सकते हैं। हाथियों की याददाश्त बहुत अच्छी होती है और पीढ़ी गत रूप से वे अपने आवाजाही को याद रखते हैं।
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