आखिर कबतक दौड़ेगा पुतिन के अश्वमेघ का घोड़ा...

 

एबीएन सेंट्रल डेस्क (प्रकाश)। तीन महीने में दूसरी बार रूस आना हुआ। अगर कहूं कि मस्कवा नदी का पानी बहने के बजाय अब जमने की तैयारी में है तो ज्यादा सटीक होगा। रूस के अधिकांश हिस्सों में ठंड तेजी से अपने पांव पसार रही है और इस दौरान आठ महीने से चल रही खूनी जंग के बाद रूस की विशाल सीमा भी थोड़ी और बढ़ गई है। यूक्रेन के चार राज्यों ने अब व्लादिमीर पुतिन को लगान देने की हामी भर दी है। ऐसा लगता है कि प्रेसिडेंट पुतिन को इतिहास बनाने और दोहराने में मजा आने लगा है। बीते दो दशक के अपने शासनकाल में पुतिन ने दो-दो बार यह कर दिखाया। साल 2014 में रातों-रात सेना भेजकर पुतिन ने यूक्रेन के क्रीमिया को रूस का क्रीमिया बना दिया था। फरवरी 2022 में क्रीमिया की सुरक्षा के नाम पर पुतिन के जंगी ऐलान के बाद यूक्रेन से चार और राज्यों- दोनेत्स्क, लुहांस्क, ज़ेपोराजिया और खेरसोन का रूस में विलय करवाया जा चुका है। पुतिन अपने अश्वमेघ के घोड़े पर कब तक सवार रहेंगे, यह शायद पुतिन को भी नहीं पता है। पुतिन के इस यज्ञ में रूस के कितने लोग साथ हैं और कितने खिलाफ, यह सही-सही बताना बेहद मुश्किल है। यूक्रेन से रूस में शामिल चार राज्यों के जनमत संग्रह की तरह ही रूस में होने वाले विभिन्न जनमत सर्वेक्षणों में भी रूसी लोग क्रेमलिन के साथ खड़े दिखाई देते हैं। यह अलग बात है कि कैमरे पर या बगैर कैमरे के भी, इस मुद्दे पर बात करने के लिए ज़्यादातर लोग कतराते हैं। मास्को की चौड़ी-चौड़ी सड़कें, विशाल इमारतें और खूबसूरत रातों में रूसी लोग पॉलिटिक्स का जिक्र करके अपने मजे को किरकिरा नहीं करना चाहते। आपने एक सवाल किया नहीं कि वो पलटकर पूछेंगे कि आपको मास्को कैसा लगा? न्यूयॉर्क, बीजिंग या लंदन से अपने शहर को बेहतर सुनकर उनकी आंखों में वही चमक आ जाती है जो पुतिन को पश्चिमी दुनिया की धमकियों के बाद भी यूक्रेन के हिस्से को रूस में मिलाने पर आती है। देश में बेहतर अवसर भी खूब मिल रहे हैं : अचानक एक युवा जोड़ी सामने आकर बैठ गई तो मैंने बातों का सिलसिला शुरू करने की कोशिश की। वो इंग्लिश समझ रहे थे और ठीक-ठाक बोल भी लेते थे। अभी-अभी दुबई से छुट्टियां बिता करके लौटे हैं। एक-दूसरे का हाथ थामे वो दुबई और मास्को में क्या महंगा और क्या सस्ता इसकी पूरी लिस्ट गिनाने लगते हैं। एक सांस में गोवा, थाइलैंड और इंडोनेशिया के बाली को लेकर रूसी दीवानगी को खुलकर जताते भी हैं। आख़िर में वो यही समझाना चाहते हैं कि कमाओ, खाओ, घूमो-फिरो, मस्त रहो, बाकि पुतिन संभाल रहे हैं। रूस की मौजूदा पीढ़ी की यही हकीकत है। उनके सामने पश्चिमी दुनिया के प्रतिबंध एक चुनौती तो है लेकिन उनके लिए देश में बेहतर अवसर भी खूब मिल रहे हैं। फैशन के शौक से समझौता करने को तैयार नहीं : भारत में जैसे विभिन्न राज्यों से लोग रोज़ी-रोटी की तलाश में दिल्ली-मुंबई में जमे हैं। वैसे ही रूस के सुदूर प्रांतों के लिए भी मास्को और सेंट पीट्सबर्ग सपने को हकीकत में बदलने वाली जगह है। जमीन से कई सौ मीटर अंदर मेट्रो पर सवार होकर वो अपनी खुद की मंज़िल पाने में जुटे हैं। दुनियादारी और सही-गलत पर बहस करके वो अपना समय बर्बाद करना नहीं चाहते। पश्चिमी देशों के मशहूर ब्रांड्स के चले जाने से थोड़े मायूस हैं लेकिन अपने फैशन के शौक से कोई समझौता करने को तैयार नहीं। कभी सीमा पार बेलारूस जाकर शॉपिंग कर आते हैं तो कभी दुबई और बैंकॉक निकल जाते हैं। (लेखक एक प्रतिष्ठित निजी कंपनी के कर्मी हैं और फिलहाल 10 वर्षों से अमेरिका में कार्यरत हैं।)

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