एबीएन एडिटोरियल डेस्क। भारतीय समाज में नारी को सदैव अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा गया है। हमारे धर्मग्रंथों और सांस्कृतिक परंपराओं में नारी को केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि शक्ति, सृजन और करुणा का प्रतीक माना गया है। वैदिक वचन यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: अर्थात जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवताओं का वास होता है। भारतीय संस्कृति की मूल भावना को स्पष्ट करता है। इसी आदर्श के कारण भारतीय समाज में नारी को मातृशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
परंतु आधुनिक सामाजिक विमर्श में एक नया प्रश्न उठ रहा है, क्या महिलाओं को दिए गए अधिकारों और संरक्षण का कहीं-कहीं दुरुपयोग भी हो रहा है? क्या समानता की यात्रा में कभी-कभी असंतुलन की स्थिति भी बन जाती है? यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि न्याय और अधिकार का उद्देश्य किसी एक वर्ग को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि समाज में संतुलन स्थापित करना है।
भारतीय धर्मग्रंथों में नारी के अनेक महान और प्रेरणादायी रूप मिलते हैं। सीता का त्याग और धैर्य, सावित्री का सत्यवान के लिए यमराज से संघर्ष, गर्गी और मैत्रेयी का वैदिक ज्ञान में योगदान, ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय संस्कृति में नारी केवल परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि ज्ञान, शक्ति और नीति की धुरी रही है। साथ ही हमारे ग्रंथ यह भी बताते हैं कि मनुष्य चाहे वह पुरुष हो या स्त्री पूर्णत: त्रुटिहीन नहीं होता।
उदाहरण के लिए: कैकेयी द्वारा वरदान के कारण रामायण में भगवान राम को वनवास जाना पड़ा। मंथरा की कुटिल सलाह ने भी उस घटना को जन्म दिया। शूर्पणखा की घटना ने आगे चलकर युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। महाभारत में गांधारी का पुत्रमोह और कुंती के जीवन के निर्णय कई जटिल परिस्थितियों को जन्म देते हैं।
इन उदाहरणों का उद्देश्य किसी स्त्री को दोषी ठहराना नहीं है, बल्कि यह दिखाना है कि मनुष्य के चरित्र में अच्छाई और दुर्बलता दोनों हो सकती हैं चाहे वह पुरुष हो या स्त्री। इतिहास के लंबे कालखंड में महिलाओं ने अनेक सामाजिक अन्याय झेले हैं शिक्षा से वंचित रहना, संपत्ति अधिकार का अभाव, बाल विवाह, दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा आदि।
इन परिस्थितियों को सुधारने के लिए आधुनिक भारत में कई कानून बनाये गये जैसे घरेलू हिंसा से संरक्षण कानून, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा, दहेज निषेध कानून इत्यादि इन कानूनों का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षा देना और उन्हें समान अवसर प्रदान करना है। वास्तव में इन कानूनों ने लाखों महिलाओं को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सामाजिक यथार्थ यह भी बताता है कि कभी-कभी किसी भी कानून का दुरुपयोग संभव होता है।
यह समस्या केवल महिला कानूनों तक सीमित नहीं है; लगभग हर कानून में ऐसा संभावित खतरा रहता है। कुछ मामलों में यह आरोप लगाया जाता है कि झूठे उत्पीड़न के मामले दर्ज किये जाते हैं, कार्यस्थल पर व्यक्तिगत मतभेद को कानूनी विवाद बना दिया जाता है। इस संदर्भ में न्यायालयों ने भी कई बार कहा है कि कानून का उपयोग न्याय के लिए होना चाहिए, प्रतिशोध के लिए नहीं।
इसलिए आवश्यक है कि हर मामले की निष्पक्ष जांच हो और दोषी चाहे कोई भी हो—उसे दंड मिले। आज स्त्री-पुरुष दोनों ही समाज के हर क्षेत्र में साथ काम कर रहे हैं शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, विज्ञान और उद्योग। यह सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन कभी-कभी संवाद की कमी, पूर्वाग्रह या असुरक्षा की भावना के कारण संबंध तनावपूर्ण हो सकते हैं।
यदि किसी महिला अधिकारी के अधीन पुरुष कर्मचारी काम करते हैं या इसके उलट स्थिति होती है, तो भी परस्पर सम्मान और पेशेवर आचरण अत्यंत आवश्यक है। समाधान का मार्ग यह है कि कार्यस्थलों पर स्पष्ट नियम, पारदर्शिता और संवाद की संस्कृति विकसित हो। समाज में यह चर्चा भी बढ़ रही है कि कुछ मामलों में पुरुष भी मानसिक, सामाजिक या पारिवारिक उत्पीड़न का सामना करते हैं।
इसलिए कई विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं कि पारिवारिक विवादों में लैंगिक-निरपेक्ष कानून पर विचार हो, पुरुषों की मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं पर भी विमर्श हो, सहायता और परामर्श केंद्र सभी के लिए उपलब्ध हों। दुनिया के कई देशों में पुरुषों की समस्याओं पर भी संस्थागत चर्चा शुरू हो चुकी है।
भारत में भी इस विषय पर संतुलित और संवेदनशील संवाद की आवश्यकता है। समाज को यह समझना होगा कि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। भारतीय दर्शन में अर्धनारीश्वर की अवधारणा यही बताती है कि सृष्टि का संतुलन स्त्री-पुरुष के सामंजस्य से ही संभव है। इसलिए समाधान किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने में नहीं, बल्कि संतुलन स्थापित करने में है।
महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा मिलनी चाहिए। पुरुषों के अधिकार और समस्याएं भी सुनी जानी चाहिए। कानून का उद्देश्य न्याय हो, विशेषाधिकार नहीं। समाज में संवाद और पारस्परिक विश्वास का वातावरण बने। नारी शक्ति का सम्मान भारतीय संस्कृति की आत्मा है। परंतु सम्मान और अधिकार तभी सार्थक होते हैं जब वे न्याय और संतुलन के साथ जुड़े हों।
यदि किसी भी स्तर पर अधिकार का दुरुपयोग होता है चाहे वह पुरुष द्वारा हो या स्त्री द्वारा तो समाज को निष्पक्ष दृष्टि से उसका समाधान करना चाहिए। समानता का अर्थ प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग है। स्त्री और पुरुष दोनों जब एक-दूसरे के सम्मान, अधिकार और गरिमा को स्वीकार करेंगे तभी एक स्वस्थ, न्यायपूर्ण और संतुलित समाज का निर्माण संभव होगा। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंगनिर्देशक, असिस्टेंट प्रोफेसर और स्वतंत्र स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)
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