झारखंड की आध्यात्मिक विरासत टांगीनाथ

 

डॉ दीपक प्रसाद  

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। झारखंड की धरती केवल खनिज, वन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह भूमि भारत की प्राचीन सनातन साधना, तपस्या और आध्यात्मिक चेतना की भी जीवंत साक्षी रही है। इसी पवित्र धरती पर अवस्थित टांगीनाथ धाम न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा, सनातनी परंपरा और आध्यात्मिक इतिहास का एक मौन किंतु सशक्त घोषणापत्र है। टांगीनाथ शब्द अपने आप में गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ समेटे हुए है।

लोकमान्यता के अनुसार, यहां स्थापित शिवलिंग और उससे जुड़ी टांगी (फरसा) शक्ति, तप और त्याग की प्रतीक है। यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन साधकों की कठोर तपस्या, वैराग्य और ब्रह्मानुभूति का साक्ष्य है। यह धाम गुमला जिले के चैनपुर डुमरी प्रखंड के घने वनों और पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है, जहां प्रकृति स्वयं ध्यान और साधना की सहचरी बन जाती है। यही कारण है कि टांगीनाथ को आदिकाल से ही तपस्थली के रूप में मान्यता प्राप्त रही है। 

टांगीनाथ धाम को लेकर झारखंड सहित आसपास के क्षेत्रों में एक अत्यंत प्राचीन और सुदृढ़ मान्यता प्रचलित है कि यह स्थल भगवान परशुराम की तप:स्थली रहा है। यह मान्यता केवल लोककथा नहीं, बल्कि भारत की सनातन तपस्वी परंपरा, शैव-वैष्णव समन्वय और भौगोलिक साक्ष्यों से भी जुड़ती दिखाई देती है। भगवान परशुराम को भारतीय परंपरा में विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। जिनको त्रेता युग के प्रारंभिक काल का महापुरुष चिरंजीवी (अमर) तपस्वी योद्धा माना गया है। 

अधिकांश विद्वान परशुराम को ईसा से लगभग 3000-4000 वर्ष पूर्व के कालखंड में स्थापित करते हैं। वे केवल योद्धा नहीं, बल्कि शैव साधक, कठोर तपस्वी और ब्रह्मचारी योगी थे। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या टांगीनाथ परशुराम की तप:स्थली थी? तो ग्रंथों में टांगीनाथ नाम से सीधा उल्लेख नहीं मिलता, किंतु स्कंद पुराण, वायु पुराण, शिव पुराण में ऐसे वनांचल, पर्वतीय तपोवनों का उल्लेख है जहां परशुराम ने शिव-साधना की। 

झारखंड का यह क्षेत्र उस समय दंडकारण्य और उत्तर कोसल क्षेत्र की सीमाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। अत: भौगोलिक संगति पूरी तरह बनती है। टांगीनाथ में अवस्थित त्रिशूल/टांगी को लेकर स्थानीय जनमान्यता है कि यह स्वयं भगवान परशुराम द्वारा स्थापित है। यह उनकी तपस्या का प्रतीक है। इसी टांगी स्थानीय भाषा में (त्रिशूल) के कारण स्थान का नाम टांगीनाथ पड़ा होगा। ऐतिहासिक दृष्टि से यह त्रिशूल धातु-विशेष (लोहे/मिश्र धातु) का बना है। इसका रूप आधुनिक नहीं, बल्कि प्राचीन लौह युगीन शस्त्र शैली से मेल खाता है। 

अनुमानत: यह 2000 वर्ष से अधिक पुराना हो सकता है, हालाँकि इसकी कार्बन डेटिंग या वैज्ञानिक जांच आज तक नहीं कराई गई, यह प्रशासनिक उपेक्षा का बड़ा उदाहरण है। भगवान परशुराम को शास्त्रों में परम शिवभक्त कहा गया है। उनके जीवन का एक बड़ा भाग शिव आराधना, तप, क्षत्रिय दमन के पश्चात प्रायश्चित में व्यतीत हुआ। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार परशुराम ने एक निश्चित संकल्प संख्या के अंतर्गत शिवलिंग स्थापित किये, ये शिवलिंग प्राकृतिक शिलाओं से निर्मित हैं। पूरे टांगीनाथ पर्वत परिसर में सैकड़ों शिवलिंग बिखरे हुए हैं। 

यह संख्या संयोग नहीं, बल्कि तपस्या की गणना आधारित साधना पद्धति का संकेत देती है। स्थानीय पुजारियों और शोधकर्ताओं के अनुसार 300 से 500 के बीच शिवलिंग होने की संभावना व्यक्त की जाती है। कई अब वनस्पति और मिट्टी में दब चुके हैं, स्थानीय लोग तो यह भी बताते हैं कि कई आसामाजिक तत्वों ने शिवलिंग को यहां से उठाकर कहीं-कहीं और भी ले गये हैं जिसका पता नहीं। परिसर में जो शिवलिंग हैं वह कुछ खंडित अवस्था में हैं। यह संख्या दशार्ती है कि यह स्थल एक सामान्य तपोभूमि नहीं रहा होगा। बल्कि एक दीर्घकालीन तपोवन परिसर रहा है। 

ग्रंथीय संकेत और लोकपरंपरा दोनों के आधार पर परशुराम ने कई चरणों में तपस्या की। प्रत्येक तपस्या 12 वर्षों की मानी जाती है। कुल अवधि 36 से 60 वर्षों तक की मानी जाती है। यह तपस्या शिव-अनुग्रह, आत्मशुद्धि और लोककल्याण के लिए थी। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्तमान मंदिर संरचना परशुराम काल की नहीं है। परंतु यहां पर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़े हुए मंदिर के अवशेषों से यह अनुभव होता है कि यहां संभवत: 9वीं-12वीं शताब्दी के बीच नागवंशी या किसी स्थानीय शैव शासकों द्वारा मंदिर का निर्माण कराया गया होगा जिसके अवशेष अभी भी परिसर में मौजूद है। 

परंतु मूल तप:स्थली उससे हजारों वर्ष पुरानी रही होगी। स्थानीय मान्यताओं में यह कथा प्रचलित है कि किसी छत्तीसगढ़ क्षेत्र के शासक ने सत्ता संघर्ष या धार्मिक अहंकार में टांगीनाथ मंदिर को आंशिक रूप से खंडित करवाया। ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसका स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है, लेकिन खंडित शिलाएं, टूटी मूर्तियां, पुनर्निर्माण के संकेत इस कथा को पूर्णत: असत्य भी नहीं ठहराया जा सकता। यह संभवत: मध्यकालीन सत्ता संघर्ष, धार्मिक टकराव या संसाधन लूट का परिणाम रहा हो। धर्मग्रंथों में टांगीनाथ का नाम से उल्लेख नहीं मिलता है, किंतु यह स्थल शिव तपोवन श्रेणी में आता है। 

परशुराम से जुड़ी वनस्थली साधना परंपरा का सशक्त प्रमाण है। सनातन परंपरा में कई स्थलों के नाम कालांतर में परिवर्तित हो गए, पर उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा स्थिर रही। देश के इतिहास के पन्नों में टांगीनाथ को वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी है। जबकि यह सर्वविदित है कि झारखंड क्षेत्र प्राचीन काल से ही शैव, वैष्णव और शक्ति उपासना की त्रिवेणी रहा है। टांगीनाथ इसी परंपरा की एक मजबूत कड़ी है। जनश्रुतियों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यहां सिद्ध महात्माओं और योगियों ने वर्षों तक कठोर साधना की। 

यह स्थल वैदिक और उत्तरवैदिक सनातन परंपरा से जुड़ा हुआ रहा है, जहां ब्रह्म, आत्मा और प्रकृति के सामंजस्य को जीवन-दर्शन के रूप में स्वीकार किया गया। यदि सनातन को केवल कर्मकांड तक सीमित न रखकर उसके दार्शनिक और आध्यात्मिक मर्म को समझा जाये, तो टांगीनाथ का संबंध सीधे श्रीकृष्ण तत्व से जुड़ता है। श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं योगस्थ: कुरु कर्माणि (अध्याय 2, श्लोक 48) अर्थात योग में स्थित होकर, आसक्ति को त्यागकर कर्म करो। टांगीनाथ की परंपरा भी कर्म, तप और ध्यान के समन्वय पर आधारित है। 

यहाँ की साधना पद्धति में निष्काम कर्म, आत्मसंयम और ईश्वर से तादात्म्य का भाव स्पष्ट दिखाई देता है, जो श्रीकृष्ण के योग-दर्शन का ही विस्तार है। झारखंड की आदिवासी सनातन चेतना भी श्रीकृष्ण के प्रकृतिझ्रकेन्द्रित दर्शन से मेल खाती है, जहां वन, पर्वत, नदी और जीव-जंतु सभी ईश्वरीय सत्ता के प्रतीक माने जाते हैं। टांगीनाथ केवल मंदिर नहीं, बल्कि झारखंड की लोक-संस्कृति, आस्था और सामूहिक चेतना का केंद्र है। यहां लगने वाले मेले, धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक आयोजन झारखंड की सांस्कृतिक निरंतरता को जीवित रखते हैं। 

यह स्थल बताता है कि झारखंड की संस्कृति किसी बाहरी प्रभाव की देन नहीं, बल्कि सनातन भारतीय संस्कृति की मूलधारा का अभिन्न अंग है। यदि टांगीनाथ का समुचित विकास किया जाए, तो यह स्थल आध्यात्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन, प्रकृति एवं वन पर्यटन, शोध एवं अध्ययन पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। यहां की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा इसे झारखंड का केदारनाथ बनने की क्षमता प्रदान करती है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी समृद्ध विरासत होने के बावजूद टांगीनाथ आज भी आधारभूत सुविधाओं की कमी समुचित सड़क और परिवहन व्यवस्थाओं के अभाव से जूझ रहा है। प्रचार-प्रसार की उपेक्षा, संरक्षण और शोध की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। यह प्रशासनिक अनदेखी केवल एक स्थल की नहीं, बल्कि झारखंड की आत्मा की उपेक्षा है। 

यदि टांगीनाथ को केंद्र में रखकर सनातन सांस्कृतिक सर्किट, धार्मिक पर्यटन नीति, स्थानीय युवाओं को रोजगार, शोध एवं दस्तावेजीकरण जैसे प्रयास किए जायें, तो यह झारखंड की आर्थिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का मजबूत आधार बन सकता है। टांगीनाथ झारखंड की केवल एक धरोहर नहीं, बल्कि सनातन चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह स्थल हमें याद दिलाता है कि झारखंड की पहचान केवल खनिज से नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक आत्मबोध और सनातनी परंपरा से है। 

आज आवश्यकता है कि हम टांगीनाथ को केवल अतीत की स्मृति न बनाकर, उसे झारखंड के सांस्कृतिक पुनर्जागरण और विकास का केंद्र बनायें। ठीक उसी प्रकार जैसे श्रीकृष्ण ने कर्म और चेतना के संतुलन से समाज को दिशा दी थी। (लेखक सांस्कृतिक शोधकर्ता, रंग निर्देश सह असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

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