जगद्गुरु रामभद्राचार्य और गीतकार गुलजार ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित

 

एबीएन सेन्ट्रल डेस्क। राष्ट्रपति द्रौपदी मुुर्मु ने शुक्रवार को यहां एक समारोह में संस्कृत के विद्वान जगद्गुरु रामभद्राचार्य को 58वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया।
श्रीमती मुर्मु ने इस अवसर पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी के साथ-साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार वाले गीतकार गुलज़ार को भी बधाई दी जो अस्वस्थ होने के कारण पुरस्कार समारोह में शामिल नहीं हो सके। 

उन्होंने उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना की जिससे कि वह कला, साहित्य, समाज और देश के लिए अपना योगदान देते रहें।
राष्ट्रपति ने कहा कि साहित्य समाज को जोड़ता और जागृत करता है। उन्होंने कहा कि 19वीं सदी के सामाजिक जागरण से लेकर 20वीं सदी के स्वतंत्रता संग्राम तक, कवियों और लेखकों ने लोगों को जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है। 

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम गीत लगभग 150 वर्षों से भारतीयों को जागृत कर रहा है और हमेशा करता रहेगा। उन्होंने कहा कि वाल्मीकि, व्यास और कालिदास से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर जैसे शाश्वत कवियों की रचनाओं में हम जीवंत भारत की धड़कन महसूस करते हैं जो भारतीयता की आवाज है।

श्रीमती मुर्मु ने 1965 से विभिन्न भारतीय भाषाओं के उत्कृष्ट साहित्यकारों को पुरस्कृत करने के लिए भारतीय ज्ञानपीठ ट्रस्ट की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्यकारों को पुरस्कृत करने की प्रक्रिया में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार के चयनकर्ताओं ने सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों का चयन किया है और इस पुरस्कार की गरिमा को बनाए रखा है। 

राष्ट्रपति ने कहा कि आशापूर्णा देवी, अमृता प्रीतम, महादेवी वर्मा, कुर्रतुल-ऐन-हैदर, महाश्वेता देवी, इंदिरा गोस्वामी, कृष्णा सोबती और प्रतिभा रे जैसी ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता महिला लेखकों ने भारतीय परंपरा और समाज को विशेष संवेदनशीलता के साथ देखा और अनुभव किया है और हमारे साहित्य को समृद्ध किया है। 

उन्होंने कहा कि हमारी बहनों और बेटियों को इन महान महिला लेखकों से प्रेरणा लेकर साहित्य सृजन में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए और सामाजिक सोच को और अधिक संवेदनशील बनाना चाहिए। 

राष्ट्रपति ने श्री रामभद्राचार्य के बारे में कहा कि उन्होंने उत्कृष्टता का एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने उनके बहुमुखी योगदान की प्रशंसा की और कहा कि शारीरिक रूप से विकलांग होने के बावजूद उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से साहित्य और समाज की असाधारण सेवा की है। 

उन्होंने कहा कि श्री रामभद्राचार्य ने साहित्य और समाज सेवा दोनों ही क्षेत्रों में व्यापक योगदान दिया है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उनके गौरवशाली जीवन से प्रेरणा लेकर आने वाली पीढ़ियाँ साहित्य सृजन, समाज निर्माण और राष्ट्र निर्माण के सही मार्ग पर आगे बढ़ती रहेंगी।

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