टीम एबीएन, रांची। साहित्यकार, कवि और जनजातीय विभाग के पूर्व निदेशक रणेन्द्र कुमार ने इतिहास विभाग रांची विवि के पीजी के छात्रों को संबोधित किया। शुक्रवार को आयोजित यह कार्यक्रम दो घंटे तक चला।
विभागाध्यक्ष डॉक्टर सुजाता सिंह ने कहा कि छात्रों की जानकारी बढ़ें इसके लिये ऐसे कार्यक्रम नियमित तौर पर कराया जाता है। रणेन्द्र कुमार का यह आठवां कार्यक्रम है। विभाग में उपस्थिति और अनुशासन दोनों पर पूरा जोर है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान और परंपरा के निर्माण विषय पर बोलते हुए रणेंद्र कुमार ने बताया कि इतिहासकार विजयनाथ अपने आलेख फ्रॉम ब्रह्मीनिज्म तो हिंदुइज्म नेगोशिएटिंग द मैथ का द ग्रेट ट्रेडीशन माया स्पष्ट करती है कि गुप्त और उत्तर गुप्त काल में वैदिक ब्राह्मण धर्म से पौराणिक धर्म में रूपांतरण पर संस्कृत ग्रहण की एक अपूर्व घटना है, जो भारतीय धार्मिक ऐतिहासिक परंपरा में घटित होती है और इस देश की एक वृहद सांस्कृतिक पृष्ठभूमि करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
वैदिक ब्राह्मण धर्म मुख्य रूप से त्रियी (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) पर आधारित था, जिसका सामाजिक आधार अभिजात सा था। किंतु विभिन्न कर्म कृषि आर्थिक संस्कृति के गंगा यमुना दोआब क्षेत्र के बाहर भी प्रसार ने वैदिक धर्म के अभिव्यक्ति और अकाल स्वरूप में आमूल चूल परिवर्तन ला दिया। पौराणिक धार्मिक धारा अनेक पंथ्यों सामुदायिक धार्मिक परंपराओं के जुड़ने से निर्मित हुई जिम कर वैदिक जाना चाहती है और लोक धार्मिक परंपराएं पेंट प्रमुख थे। पर संस्कृत ग्रहण के प्रवृत्ति इस काल में की सबसे बड़ी विशेषता थी।
मुख्य रूप से देवियां या मात्र शक्तियों महादेव मुरूगन नर्सिंग कृष्णा संकरण जैसे जनजाति कृषक पशुपालक समाज के देवी देवताओं ने पौराणिक धार्मिक धारा में सम्मिलित होकर वैदिक देवकूल यथा इंद्र अग्नि वरुण भूषण आदि देवताओं को धीरे-धीरे किनारे कर दिया। प्रारंभिक काल में कई प्रतिस्पर्धी किताब पंत की गतिशीलता के कारण वैदिक ब्राह्मण धर्म में भी परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हुई मध्य भारत और दक्कन आदि अपरिचित जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक परिवर्तन की आहट सुनाई पड़ रही थी।
दरअसल इन नवीन क्षेत्र में बौद्ध और जैन संन्यासियों ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान की शुरूआत करते थे इन क्षेत्रों में महायान का विस्तार ब्राह्मण धर्म के लिए खतरे के रूप में देखा जा रहा था। जिसके कारण ब्राह्मण धर्म में भी नामित आई और वह समाज की परिधि के समुदायों की भी चिंता करने लगा इस सदी में हो रहे हैं सामाजिक आर्थिक परिवर्तनों ने यह आप बिहारी हरिया कर दिया था कि ब्राह्मण सिद्धांत कर परिवर्तित परिस्थितियों में समंजन हेतु बदलाव लाएं रोमन साम्राज्य के पता नहीं।
भारतीय प्रादेशिक व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव डाला था वस्तुओं की खपत का घटी थी उनका उत्पादन घटाना पड़ा। परिणामता जनसंख्या का दबाव कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर आप पड़ा इस दबाव के कारण कैसे सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ हुई कृषि तकनीक में परिवर्तन लाए गए कृषि प्रसार जैसे ग्रंथ प्रकाश में आए दूसरी ओर बंजारा एवं अव्यवस्थित भूमि का सुधार कर फोन में कृषि कार्य शुरू करने की प्रक्रिया भी प्रारंभ हुई किंतु भूमि सुधार और नए इलाके में कृषि सुधार के लिए आकर्षण और प्रयासों की कमी थी।
केंद्रित मौर्य साम्राज्य के बाद इस काल में छोटे-छोटे राज्य थे जिनकी आती विकेंद्रित प्रशासनिक व्यवस्था के पास कृषि प्रसार और भूमि सुधार के लिए संसाधन नहीं थे सम्राटों और छोटे राजाओं के पास कृषि प्रसार का सबसे आसान उपाय व्यक्ति या समुदाय को भूमि दान देना था भूमि दान को आकर्षक बनाने के लिए दान प्राप्तकर्ता के लिए कई तरह के छठ के भी प्रावधान किए गए।
यह भूमि दान पूर्व से कृषि दबाव वाले गंगा जमुना दबाव क्षेत्र में नहीं बल्कि उसके बाहर के क्षेत्र रहता मध्य प्रदेश गुजरात महाराष्ट्र आंध्र प्रदेश उड़ीसा आदि में प्रदान किए गए वैदिक संहिता से संचालित होने वाले ब्राह्मणों के लिए भी भूमि दान प्राप्त करना आकर्षण का केंद्र बन गया भूमिका उपहार या दान एक मूल्यवान संपत्ति की प्राप्ति थी एक निजी संपत्ति जो परिवार को स्थाई रूप से प्राप्त हो रहे थे।
उसके उत्तराधिकार और बंटवारे का अधिकार भी उन्हें प्राप्त हो रहा था परिवर्तित जो इन नए लोगों के प्रति सत्रता पूर्ण रवैया रखते थे और इन नए भूमि प्राप्तकर्ताओं को दूसरी ओर ब्राह्मण वर्ण अपने वर्णवादी रूढी परंपरा के अनुरूप उन्हें मलिक मानते थे। कार्यक्रम में प्रो संजीव लोचन भी उपस्थित थे। कई छात्रों ने सवाल भी पूछे।
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