एबीएन सोशल डेस्क। बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृपक्ष क्या होता हैं? पितृदोष है क्या? पितृदोष शांति के उपाय क्या हैं, पितृ या पितृगण कौन हैं? आपकी जिज्ञासा को शांत करती abnnews24.com की विस्तृत प्रस्तुति...
16 दिन की वह अवधि (पक्ष/पख) है जिसमें सनातनी लोग अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं और उनके लिये पिण्डदान करते हैं। इसे सोलह श्राद्ध, महालय पक्ष, अपर पक्ष आदि नामों से भी जाना जाता है।
पितृगण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है, क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है, पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।
आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है, वहां हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढ़ती है।
वहाँ से आगे, यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेद कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एकआध आत्मा ही ऐसी होती है, जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश, मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।
हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं, ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं, जिसे पितृ- दोष कहा जाता है।
पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।
इसके अलावा जिनके घर में प्रेत बाधा हो, घर में सदैव अशांति का रहना, परिवार के लोगों में आपसी मतभेद का होना, बार- बार दुर्घटना का घटित होना, किसी भी सदस्य का हमेशा बीमार रहना, बनते कार्यों में रुकावटें आना, संतान न होना अथवा विकलांग होना, अकाल मृत्यु का होना, मतिभ्रम होना, परिवार में दुख हो, कष्ट हो, आर्थिक परेशानी हो, ऋण का भार हो, विवाह-बाधा व असफलता जैसी अनेक नकारात्मक स्थितियां बन रही हो जीवन भर तो समझ लो 95 पितृदोष का कारण हैं। यदि आपके घर-परिवार में भी इस तरह की परेशानियां है तो समझ लो ये पितृदोष के वजह से हैं।
पितृपक्ष चलने वाले पंचबलि कार्यक्रम आप भी आयोजित करवा सकते हैं। ये पंचबलि कार्यक्रम पितरों की आत्मा के शांति, पितृदोष निवारण के लिए ही किया जाता है।
अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय। परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।
उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते, परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह भी पितृदोष उत्पन्न करते हैं।
इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ, उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है?
जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।
इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है। इसी कारण देखने में आया है कि ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं बस पाता है, वंश हीनता, संतानों का गलत संगति में पड़ जाना, परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना, परिवार कि सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं।
इन समस्त दोषों के निवारण हेतु शास्त्रों ने त्रिपिण्डीश्राद्ध का अचूक विधान निर्देशित किया है, जिससे सरलता से पितृदोष से निवृत्ति प्राप्त हो, पितरों की अक्षय कृपा प्राप्त होती है...
अपनी वंशपरम्परा में होने वाले अनेक प्रकार के दैहिक- दैविक भौतिक तापों के उपशमन के लिये त्रिपिण्डी श्राद्ध करने की शास्त्र समर्थित लोकमान्य परम्परा है। वंश में मृत और असद्गतिप्राप्त प्राणियों के द्वारा अनेक प्रकार की शारीरिक मानसिक पीड़ा के साथ ही सन्तान-परम्परा की वृद्धि का न होना इत्यादि अनेक ऐसे उपद्रव हैं, जिन उपद्रयों का कारण कुछ विदित नहीं होता और आश्चर्यजनकरूप से घटित होने वाले उन उपद्रवों की व्यथा और कष्ट को विवश होकर सहना पड़ता है।
ये उपर्युक्त प्रेत या पितृ बाधाएँ अपने कुल में अथवा अन्य कुल में उत्पन्न असद्गतिप्राप्त प्रेतों द्वारा की गयी होती हैं। यहाँ यह समझना चाहिये कि न केवल अपने कुल के असद्गतिप्राप्त प्राणी भूत-प्रेत-पिशाचादि योनियों में प्रविष्ट होकर ऐसी बाधा करते हैं, प्रत्युत अन्य जातीय वंशपरम्परा में उत्पन्न हुए जीव भी, जिनसे द्वेष-प्रीति तथा धन-धान्यादि का सम्बन्ध होता है, भूत-प्रेत-पिशाचादि योनियों को प्राप्त करके उपर्युक्त उपद्रवों को करते हैं तथा पीड़ाकारी होते हैं। उपर्युक्त पीड़ा पहुंचाने वाले भूत-प्रेतादि वायु रूप में होकर सात्त्विक, राजस तथा तामस-भेद से प्रेत के रूप में होकर द्युलोक, अन्तरिक्ष तथा पृथ्वीलोक में अतृप्त होकर भ्रमण करते रहते हैं। उनमें सत्वगुणप्रधान प्रेतादि विष्णुमय, रजोगुण प्रधान प्रेतादि ब्रह्ममय और तमोगुण प्रधान प्रेतादि रुद्रमय संज्ञा वाले कहलाते हैं।
त्रिपिण्डीश्राद्ध इन्हें उत्तम लोक प्राप्त कराने की विधि है। इस श्राद्ध में सात्विक, राजस तथा तामस प्रेतों के निमित्त विभिन्न द्रव्यों से तीन पिण्ड बनाकर विशेष विधि से श्राद्ध किया जाता है, इसलिये यह श्राद्ध त्रिपिण्डीश्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से उत्तम लोक को प्राप्त हो जाने के पश्चात्पू र्वोक्त भूत-प्रेतादि इष्टप्रतिबन्धक, अर्थात मनोनुकूल इच्छा प्राप्ति में बाधक न होकर कर्ता को सर्वाभीष्ट प्राप्त कराने में सहायक होते हैं। ऐसे प्राणी भी, जो आत्महत्या आदि दुर्मरण से शरीर का त्याग करते हैं अथवा जिनका शास्त्रोक्त विधि से और्ध्वदैहिक संस्कार नहीं किया जाता, वे सब भूत-प्रेतादि योनियों को प्राप्त होते हैं।
जिन जीवों का दुर्मरण हो जाता है या जो पितर किसी भी कारणवश असंतुष्ट होते हैं, उनके और्ध्वदैहिकश्राद्ध की सफलता के लिये प्रायश्चित्तरूप से शास्त्रों में नारायणबलि करने का विधान है। अपने कुल में अथवा अपने से सम्बद्ध किसी अन्य कुल में उत्पन्न किसी जीव के प्रेत योनि प्राप्त होने पर उसके द्वारा अपने वंश में सन्तान प्राप्ति में बाधा अथवा अन्य प्रकार के होने वाले अनिष्टों की निवृत्ति के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध त्रिपिण्डी श्राद्ध कहलाता है।
नारायण बलि में अपने कुल गोत्र के दुर्मरणग्रस्त जीव का उद्धार हो जाये-यह उद्देश्य होता है, जबकि त्रिपिण्डी श्राद्ध में अपनी वंश-परम्परा में होने वाले अनिष्टों की निवृत्ति के उद्देश्य से श्राद्ध किया जाता है। नारायण बलि मुख्यरूप से देवताओं की प्रसन्नता के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध होता है, जिसमें केवल एक प्रेत का ही श्राद्ध किया जाता है, जबकि त्रिपिण्डीश्राद्ध में सात्विक -राजस-तामस प्रेतों के उदेश्य से भी श्राद्ध होता है।
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