कपालभाति योगिक क्रिया से फेफड़ो (लंग्स) की कार्य क्षमता बढ़ती है और लंग्स इंफेक्शन होता है कंट्रोल : योगाचार्य महेशपाल

 

एबीएन हेल्थ डेस्क। योग की उत्पति जब से सभ्यता प्रारंभ  हुई थी और तब से योग किया जा रहा है यह हमारी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। योगाचार्य महेशपाल बताते है कि  यह शारीरिक, आध्यात्मिक और मानसिक व्यायामों का एक समूह है जिसका अभ्यास हमारे स्वास्थ्य के लिए किया जाता है। यह अब पश्चिम में भी शारीरिक व्यायाम के रूप में लोकप्रिय हो गया है। योग तनाव को कम करता है और अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। कपालभाति योगिक क्रिया एकलोकप्रिय योग अभ्यास है। 

कपालभाति योग में षट्कर्म (हठ योग) की एक विधि (क्रिया) है। संस्कृत में कपाल का अर्थ होता है माथा या ललाट और भाति का अर्थ है तेज। इसके नियमित अभ्यास करने से मुख पर आंतरिक प्रभा (चमक) से उत्पन्न तेज रहता है। कपाल भाति बहुत ऊजार्वान उच्च उदर श्वास व्यायाम है। कपालभाति के तीन अलग-अलग प्रकार हैं। वातक्रम कपालभाति के में सांस को बाहर निकाला जाता है जबकि सांस को अंदर लेना स्वाभाविक और निष्क्रिय होता है। व्युत्क्रम कपालभाति में नाक से पानी अंदर प्रवेश कराया जाता है और फिर मुंह से बाहर निकाला जाता है। 

अंत में, शीतक्रम कपालभाति वह है जिसमें पानी को मुँह में पिया जाता है और फिर नाक से बाहर निकाला जाता है। यह अभ्यास नाक के मार्ग और श्वसन प्रणाली को शुद्ध करने के लिए किया जाता है, कपालभाति योगिक क्रिया के अभ्यास करने के लिए रीढ़ को सीधा रखते हुए किसी भी ध्यानात्मक आसन, सुखासन या फिर कुर्सी पर बैठें। इसके बाद तेजी से नाक के दोनों छिद्रों से साँस को यथासंभव बाहर फेंकें। साथ ही पेट को भी यथासंभव अंदर की ओर संकुचित करें। तत्पश्चात तुरन्त नाक के दोनों छिद्रों से सांस को अंदर खींचते हैं और पेट को यथासम्भव बाहर आने देते हैं। 

इस क्रिया को शक्ति व आवश्यकतानुसार 50 बार से धीरे-धीरे बढ़ाते हुए 500 बार तक कर सकते हैे, किन्तु एक क्रम में 50 बार से अधिक न करें। क्रम धीरे-धीरे बढ़ायें। फेफड़े श्वसन तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो आपको सांस लेने में मदद करते हैं। फेफड़ों के अलावा, श्वसन तंत्र में वायुमार्ग शामिल होते हैं जो आपके फेफड़ों में हवा को अंदर और बाहर ले जाते हैं, फेफड़ों के आसपास की रक्त वाहिकाएं और मांसपेशियां जो आपको सांस लेने में मदद करती हैं। अगर इनमें इंफेक्शन हो जाए तो काफी गंभीर समस्या हमारे सामने नजर आती हैं जिससे हम लंग्स इन्फेक्शन के नाम से जानते हैं,  फेफड़ों का संक्रमण वायरस, बैक्टीरिया और कभी-कभी फंगस के कारण भी हो जाता है। 

जब आपके फेफड़ों से हवा को लाने-ले जाने वाली बड़ी ब्रोन्कियल नलियां संक्रमित हो जाती हैं, तो इसे ब्रोंकाइटिस कहा जाता है। ब्रोंकाइटिस बैक्टीरिया की तुलना में वायरस के कारण होने की अधिक संभावना होती है। जिसके कारण कई गंभीर समस्या हमारे समक्ष  आ जाती है जिसमें, खांसी के साथ बलगम और ब्लड आना, सांस लेने में समस्या होना, सीने में दर्द होना मांसपेशियों में दर्द होना,गले में दर्द होना, घरघराहट की समस्या, थोड़े काम या सामान्य क्रिया से जल्दी थकान होना, उल्टी-दस्त के साथ जी मिचलाना लंग्स इन्फेक्शन की समस्या से बचाव के लिए एवं वायरस बैक्टीरिया और फंगस के प्रकोप से बचाव के लिए कपालभाति योग क्रिया एवं भस्त्रिका  प्राणायाम के द्वारा हम इन गंभीर रोगों से बचाव कर सकते हैं।

यह अभ्यास  फेफड़ों के इंफेक्शन एवं फेफड़ों से हवा को लाने ले जाने वाली ब्रोंकाइल नालियों को संक्रमित होने से बचाते हैं और फेफड़ों की कार्य क्षमता बढ़ाने में मदद करता है जिससे हम विभिन्न प्रकार के रोगों से बच सकते हैं और हमारी इम्यूनिटी स्ट्रांग बनती है, कपाल भाती के अभ्यास से हमे कई लाभ प्राप्त होते हैं जिसमें यह कपाल को शुद्ध करता है कफ विकारों को समाप्त करता है। यह जुकाम, साइनोसाइटिस, अस्थमा एवं श्वास नली संबंधी संक्रमणों में लाभदायक है। यह पूरे शरीर का कायाकल्प करता है और चेहरे को सुकोमल और दीप्तिमान बनाये रखता है। 

यह तंत्रिका तंत्र को संतुलित कर शक्तिशाली बनाता है साथ ही साथ पाचन तंत्र को शक्तिशाली बनाता है। कपालभाती क्रिया के अभ्यास करने से पहले कुछ सावधा सावधानिया रखनी चाहिए यह अभ्यास प्रारंभ मैं योगाचार्य  के मार्गदर्शन मैं ही किया जाना चाहिए हृदय संबंधी व्याधियों में, चक्कर आने, उच्च रक्तचाप, नासिका से रक्त प्रवाह, मिरगी, माइग्रेनस्ट्रोक, हर्निया एवं गैस्ट्रिक अल्सर होने की स्थिति में इस अभ्यास को नहीं करना चाहिए। 

कपालभाती क्रिया के अभ्यास करने से पहले कुछ  सावधानिया रखनी चाहिए यह अभ्यास प्रारंभ मैं योगाचार्य  के मार्गदर्शन मैं ही किया जाना चाहिए हृदय संबंधी व्याधियों में, चक्कर आने, उच्च रक्तचाप, नासिका से रक्त प्रवाह, मिरगी, माइग्रेनस्ट्रोक, हर्निया एवं गैस्ट्रिक अल्सर होने की स्थिति में इस अभ्यास को नहीं करना चाहिए।

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