गोड्डा के इस गांव में नहीं मनती होली, जानें क्यों...

 

  • न रंग न ही गुलाल झारखंड के इस गांव में पानी से खेली जाती है होली, रंग लगाना है अशुभ

एबीएन न्यूज नेटवर्क, गोड्डा। होली रंगों का तथा हंसी-खुशी का त्योहार है। यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। 

वैसे तो होली रंगों से खेली जाती है, लेकिन झारखंड के गोड्डा जिले में रंगों से नहीं बल्कि पानी से होली खेली जाती है। मामला जिले के गोविंदपुर गांव का है। बताया जा रहा है कि यहां आदिवासी परंपरा के मुताबिक, पानी की होली खेली जाती है। 

पानी की होली खेलने से पहले रंग या गुलाल लगाना अशुभ माना जाता है। आदिवासी की इस परंपरा को बाहा पर्व कहा जाता है। आदिवासियों में यह पर्व होली के फागुन मास के पूर्णिया से एक दिन पहले तक ही मनाया जाता है।

ग्रामीण आदिवासी रसिकलाल ने बताया कि आदिवासी मूल रूप से प्रकृति की पूजा करते हैं। इसलिए होली से पूर्व फाल्गुन मास की अंतिम सप्ताह से ही बाहा पर्व की शुरुआत हो जाती है और पानी से यह होली खेली जाती है। 

ग्रामीण श्यामलाल हेंब्रम ने बताया कि बाहा पर्व में गांव के जाहिरस्थान या माझी स्थान से पर्व के दिन गुरु बाबा द्वारा एक बांस के बने सूप में सुखवा का फूल और पत्ता लिया जाता है और हर एक घर में उस फूल को दिया जाता है। 

उन्होंने बताया कि गुरु बाबा हर एक घर गांव के लोगों के साथ ढोल नगाड़े और मंदिर के साथ पहुंचते हैं जहां लकड़ी के स्टूल पर पैर रखकर गुरु बाबा के पैर को घर की महिला और कुंवारी कन्याएं सरसों के तेल से और पानी से पैर धोती है। इसके बाद गुरु बाबा द्वारा उस फूल को दिया जाता है।

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