शाम के वक्त बिजली आपूर्ति की चुनौतियां

 

ग्रिड प्रबंधक शाम के वक्त बिजली की बढ़ती मांग की समस्या से जूझ रहे हैं जिसका समाधान बाजार कीमतें तय करना ही है। इस संबंध में बता रहे हैं अजय शाह

अजय शाह 

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। सौर ऊर्जा का दायरा बढ़ रहा है। लेकिन शाम को जब सूरज ढल जाता है तब सौर ऊर्जा के बड़े उपयोगकर्ता फिर से ग्रिड वाली बिजली की सेवाएं लेने लगते हैं। आर्थिक वृद्धि और मानव निर्मित संरचनाओं और बुनियादी ढांचे के समूह वाले निर्मित वातावरण में बदलाव के चलते शाम को वातानुकूलित साधनों की मांग बढ़ रही है। ग्रिड प्रबंधक शाम के वक्त बिजली की बढ़ती मांग की समस्या से जूझ रहे हैं, लेकिन इसके समायोजन के लिए कोई उपाय करना मुश्किल होता जा रहा है। इसका समाधान बाजार कीमतें तय करना ही है। सौर ऊर्जा की कीमत में काफी गिरावट आयी है। 

प्रत्येक कंपनी के पास यह मौका होता है कि वे किसी अनुबंध व्यवस्था के माध्यम से सौर ऊर्जा हासिल कर, दिन में बिजली खर्च कम कर सकें। लेकिन सूरज की रोशनी अस्थिर होती है और हर शाम सौर ऊर्जा कम हो जाती है जबकि बिजली की मांग बढ़ जाती है। आर्थिक विकास और चीन के सस्ते निर्माण की वजह से एयर कंडिशनिंग अपनाने की दर दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। 

इस तरह के निर्मित वातावरण के चलते भारी संरचना बन रही है जिसमें अधिक ताप क्षमता होती है जो शाम को आंतरिक सतहों को गर्म कर देती है, जिससे शाम में एयर कंडिशनर के अधिक उपयोग की जरूरत महसूस होने लगती है। निर्मित वातावरण अब भारी संरचनाओं की ओर बढ़ रहा है, जिनमें अधिक ताप क्षमता होती है और इसके चलते शाम के वक्त तक आंतरिक सतह गर्म हो जाता है और एयर कंडिशनिंग की जरूरत महसूस होने लगती है। 

हर शाम, सौर ऊर्जा के उपयोगकर्ता ग्रिड का इस्तेमाल करने लगते हैं। ऐसे में ग्रिड प्रबंधकों की समस्या बढ़ने लगती है। भारतीय बिजली प्रणाली का एक बड़ा हिस्सा कोयला आधारित बिजली संयंत्र है और शाम के वक्त मांग बढ़ने पर आपूर्ति की कमी पूरा करने के लिए इन्हीं संयंत्रों का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन दिन में, जब सूरज की रोशनी होती है तब इस बिजली के पर्याप्त खरीदार नहीं होते हैं। कोयला संयंत्रों को अपना उत्पादन बढ़ाने या कम करने में घंटों लग जाते हैं। वे थोड़े वक्त में घटती-बढ़ती मांग के आधार पर तुरंत बिजली उत्पादन करने में सक्षम नहीं होते हैं। 

दूसरी दिक्कत यह है कि वैश्विक वित्तीय संस्थान अब कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन जैसे कार्बन उत्सर्जन करने वाले नए बिजली संयंत्रों को वित्तीय सहायता देने से हिचक रहे हैं। इससे भारतीय बिजली कंपनियों को अक्षय ऊर्जा स्रोत जैसे कि सौर और पवन ऊर्जा की ओर रुख करना पड़ा है। नतीजतन, जीवाश्म ईंधन पर आधारित नई बिजली उत्पादन क्षमता की वृद्धि रुक गई है। मौजूदा स्थिति में निजी निवेश को फिर से उभारना है। 

सीएमआईई कैपेक्स डेटा बेस की क्रियान्वयन वाली परियोजनाएं 2020 के 44 लाख करोड़ रुपये के निचले स्तर से बढ़कर वर्तमान में 55.7 लाख करोड़ रुपये (दोनों मूल्य 2024 के रुपये के आधार पर) तक पहुंच गई हैं जो लगभग तीन वर्षों में वास्तविक रूप से 26 प्रतिशत की वृद्धि है। जैसे-जैसे ये परियोजनाएं पूरी होती जाएंगी, बिजली की मांग बढ़ेगी। 

हमें उन ग्रिड प्रबंधकों की सराहना करनी चाहिए जो इस परिस्थिति का सामना बहादुरी से कर रहे हैं। हर शाम जब सूरज ढल जाता है तब ग्रिड की मांग बढ़ जाती है। ग्रिड प्रबंधक मांग पूरा करने के लिए किसी तरह हालात संभालते हैं। ऐसे वक्त में पवन ऊर्जा (इसमें भी अनिश्चितता है) को अहमियत दी जाने लगी है। कुछ छोटे भंडारण संयंत्रों की शुरूआत हो गई है। जलविद्युत संयंत्रों और गैस संयंत्र मददगार होते हैं। केवल कोयला आधारित बिजली क्षमता को उनकी आर्थिक और तकनीकी क्षमता से परे इस्तेमाल किया जा रहा है जिस पर निर्भर रहना लंबे समय में टिकाऊ नहीं है। 

हर शाम बढ़ती मांग के बीच ग्रिड प्रबंधकों को वैकल्पिक समाधानों की आवश्यकता है। उनके लिए पुराने बिजली-खरीद समझौते (जहां उन्हें अनुबंध के तहत कुछ खास चीजें करने के लिए मजबूर किया जाता है) और कोयला आधारित बिजली संयंत्र (जो लचीली तकनीक नहीं है) बाधाएं हैं। ग्रिड प्रबंधकों ने अब तक एक दशक से भी अधिक समय से इन समस्याओं का साहसी तरीके से समाधान किया है। हम अतीत से भविष्य का अनुमान लगाते हैं और हम कुछ इस तरह सोचने लगते हैं कि चीजें उसी तरह चलती रहेंगी जैसी वे होती रही हैं। 

लेकिन यह समस्या अब एक खास मोड़ पर आ चुकी है। ग्रिड प्रबंधकों के लिए लगातार सुधार करने की गुंजाइश कम हो रही है। हाल के वर्षों में गर्मी के मौसम में बढ़ते बिजली संकट का मूल कारण भी यही है। हमें इसके कारकों को समझना चाहिए और यह उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले दिनों में ग्रिड प्रबंधकों के लिए इस संकट का प्रबंधन करना और भी कठिन हो जायेगा। 

हालांकि क्रियान्वयन के स्तर पर छोटे उतार-चढ़ाव देखे जाएंगे लेकिन इस रणनीति में ही खामी है। तीन प्रमुख कारक (दिन में सस्ती सौर ऊर्जा की निजी मांग, जीवाश्म ईंधन से संचालित होने वाले संयंत्रों की वैश्विक फंडिंग न मिलना और वातानुकूलित यंत्रों को चलाने की बढ़ती मांग) नीति निमार्ताओं के नियंत्रण से परे हैं। इस समस्या के समाधान के लिए एक और उपकरण का इस्तेमाल किया जा सकता है जो मूल्य प्रणाली से संबंधित है। आज ग्रिड इंजीनियर कीमतों में स्थिरता चाहते हैं ताकि निश्चित मांग मिल सके। वे हर शाम मांग के आधार पर आपूर्ति करते हैं। ग्रिड प्रबंधकों को मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को हल करना चाहिए। इसमें आर्थिक दृष्टिकोण से मूल्यवर्धन होता है। मूल्य प्रणाली भी आपूर्ति और मांग के बीच के अंतर को कम करती है। 

टमाटर की आपूर्ति और मांग में उतार-चढ़ाव होता रहता है और इसका हल निकालने के लिए कोई बागवानी इंजीनियर नहीं होते हैं। इसमें कीमतों की मुख्य भूमिका होती है। टमाटर की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता रहता है और इससे हर वक्त मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनता है। बिजली के साथ भी ऐसा ही हो सकता है। दोपहर में जब सूरज की रोशनी होती है तब बिजली की कीमत शून्य हो जानी चाहिए (भले ही यह कोयला आधारित ताप बिजली आपूर्तिकर्ता ही क्यों न हो)। शाम को जब इसकी कमी होती है तब बिजली की कीमत तेजी से बढ़ जानी चाहिए। 

बिजली की कीमत के अनुसार सभी इसके इस्तेमाल के तरीके बदल सकते हैं और बिजली खरीदने वाले उपभोक्ता सस्ती बिजली का फायदा उठाने के लिए अपने काम दिन में करने लगेंगे। शाम को एसी चालू करने से पहले लोग बिजली की कीमत का ध्यान रखने लगेंगे। चेन्नई जैसी जगहों पर आॅफिस की पोशाक शॉर्ट्स हो सकती है। बुनियादी ढांचे या भवन निर्माण में इमारतों को ठंडा रखने वाले डिजाइनों को प्राथमिकता दी जाएगी। दो-पाली वाली प्रणाली में काम किया जा सकता है जिसमें दिन की पाली (जब सूरज की रोशनी हो) और रात की पाली (शाम में बिजली की कीमतों में तेजी आने के बाद शुरू होने वाली) में काम होगा। 

बिजली भंडारण भी एक तरह का कारोबार है जिसके तहत दिन में सस्ती बिजली खरीदी जाती है और शाम को महंगी बिजली बेची जाती है। बिजली के दैनिक मूल्य में उतार-चढ़ाव से भंडारण में निजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा। भंडारण संयंत्र बनाने का निर्णय व्यक्तिगत आधार पर किया जाना चाहिए और यह लाभ की संभावना के आधार पर होना चाहिए न कि इसे केंद्रीय योजनाकारों के द्वारा किया जाना चाहिए। पवन ऊर्जा उत्पादकों को हर शाम फायदा होगा जिससे पवन ऊर्जा में अधिक और सौर ऊर्जा में कम निवेश को फिर से बढ़ावा मिलेगा। साथ ही कोयला आधारित बिजली संयंत्र दिन में शून्य या कम कमाई करेंगे और शाम में अधिक मांग के समय मुनाफा कमाएंगे। 

फिलहाल ग्रिड इंजीनियरों से बहुत अधिक उम्मीदें की जा रही हैं। भविष्य की बिजली प्रणाली सौर, पवन और बिजली भंडारण का संयोजन होगा जिसे कीमतों के द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। समस्या का समाधान बड़े पैमाने पर केंद्रीयकृत तरीके से नहीं, बल्कि बिजली खपत कम करने और अक्षय ऊर्जा के स्रोत अपनाने जैसे छोटे कदमों के जरिये व्यक्तिगत स्तर पर किया जा सकता है। इससे ग्रिड प्रबंधकों को हर शाम बिजली आपूर्ति और मांग में संतुलन बनाए रखने के लिए बहुत अधिक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होगी। (लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं)

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