एबीएन सेंट्रल डेस्क। लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा आलाकमान ने कई सीटों पर अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। हालांकि अभी विपक्षी महागठबंधन ने अपने उम्मीदवार के नामों की घोषणा नहीं की है। लेकिन इतना तो तय माना जा रहा है कि इन सभी सीटों पर भाजपा की राह कतई आसान नहीं होनेवाली है। क्योंकि झारखंड में पूर्व सीएम हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद झामुमो लगातार सक्रिय है। ऐसे में उसके साथ सहानुभूति वोट भी प्लस प्वाइंट की भूमिका में होगा। बहरहाल, आइये जानते हैं विभिन्न सीटों की चुनौतियों का आकलन :
वहां के समाजिक समीकरण और अल्पसंख्यकों की आबादी को देखते हुए भाजपा को बहुत पसीना बहाना होगा। आजसू के एम टी राजा और अकील अख़्तर मन से मेहनत करें, तब ताला मरांडी जी का चांस बनता है। लॉबिन हेंब्रम के रुख पर भी चुनाव परिणाम निर्भर करेगा। बाबूलाल मरांडी ने एक बात अच्छी की है कि महेशपुर के देवीधन टुडू को भाजपा में शामिल करा दिया। वे ताला मरांडी की मदद कर सकते हैं। ताला मरांडी की खुद की पकड़ आदिवासी मतदाताओं में है। झामुमो के मौजूदा सांसद विजय हांसदा को लेकर एंटी इनकंबेंसी फैक्टर है, आदिवासी मतदाताओं में विजय हांसदा को लेकर नाराजगी भी है। मुकाबला दिलचस्प होगा।
अगर सुनील सोरेन के सामने कल्पना सोरेन को उम्मीदवार बनाया जाता है, तब इसका असर बगल के राजमहल सीट पर भी पड़ेगा। वैसी स्थिति में ताला मरांडी और दुमका से भाजपा उम्मीदवार सुनील सोरेन, दोनों को मुश्किल होगी। एक ही उम्मीद है कि लोकसभा चुनाव है, मोदी के नाम पर ही बेड़ा पार लग जाये।
जैसी उम्मीद है, अन्नपूर्णा देवी के खिलाफ लेफ्ट के राजकुमार यादव उम्मीदवार होंगे। अब राजकुमार यादव हों या झामुमो के जयप्रकाश वर्मा, अन्नपूर्णा देवी की जीत पक्की है। इसलिए मैं इसे मुश्किल सीट नहीं मानता।
अगर भाजपा के विद्युत वरण महतो के खिलाफ कांग्रेस के अजॉय कुमार उम्मीदवार हुए, तब कांटे की टक्कर होगी। शहरी इलाकों में अजय कुमार लोकप्रिय हैं। विद्युत वरण महतो को ग्रामीण इलाकों के अपने स्वजातीय वोटरों से उम्मीद होगी, लेकिन इस बार चुनौती बड़ी है। बहरागोड़ा से कुणाल षड़ंगी टिकट की रेस में थे, टिकट नहीं मिलने से वो आहत हैं। सरयू राय मदद कर सकते थे, लेकिन जब पार्टी ने सरयू राय को नहीं पूछा तो वे क्यों विद्युत वरण महतो की मदद करें।
गीता कोड़ा के खिलाफ शायद झामुमो का उम्मीदवार होगा। अब वो सुखराम होंगे या दीपक बिरुआ, ये तो वक्त बताएगा। लेकिन इस बार गीता कोड़ा को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ेगी। उम्मीद है कि भाजपा के लोग गीता कोड़ा का अंदर ही अंदर विरोध न कर दें, खासकर जेबी तुबिद या बड़कुंवर गहराई। इन दोनों को समय रहते मैनेज करना होगा।
पिछली बार अर्जुन मुंडा बड़ी मुश्किल से जीते थे। इस बार शायद स्थितियां ज्यादा अनुकूल है। पिछली बार रघुवर दास ने अर्जुन मुंडा को हराने के लिए क्या नहीं किया। नीलकंठ मुंडा ने क्या किया, सब जानते हैं। लेकिन इस बार नीलकंठ सिंह मुंडा शायद अर्जुन मुंडा का विरोध न करें । बगल में गीता कोड़ा के आने से आदिवासी वोटर पर भी प्रभाव पड़ेगा।
समीर उरांव को भाजपा ने अपना प्रत्याशी बनाया है। उनके खिलाफ कौन? इससे ही जवाब मिलेगा कि वो जीत रहे हैं या हारेंगे। अगर कांग्रेस ने सुखदेव भगत को उम्मीदवार बनाया तब तो समीर उरांव को मुश्किल होगी। मोदीजी के कारण वैतरणी पार लग जाए तो वो अलग बात है।
घूरन राम भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इसका पार्टी को फायदा मिलेगा। लेकिन बीडी राम दो बार से लगातार सांसद बनते रहे हैं, लिहाजा एंटी इनकंबेंसी भी है। विपक्ष के पास पलामू से कोई मजबूत उम्मीदवार नजर नहीं आ रहा।
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