प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है महापर्व शिवरात्रि

 

  • आठ मार्च को मनाया जायेगा शिव उपासना का पर्व
  • श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र में मनेगा शिवरात्रि : अनिल मिश्रा

टीम एबीएन, कोडरमा। शिव उपासना का पर्व महाशिवरात्रि प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है। भगवान शिव के परिवार का प्रकृति से विशेष लगाव और संबंध माना जाता है। उक्त बातें मां तारा ज्योतिष संस्थान के आचार्य अनिल मिश्रा ने कही। उन्होंने कहा कि भगवान शिव का वास पर्वत और जंगलों में माना गया है, जो हमें प्रकृति के साथ जुड़ने का संदेश देता है।

भगवान शिव का जंगलों और पहाड़ों से संबंध बताता है की प्रकृति हमारे लिए ही नहीं बल्कि देवताओं के लिए भी महत्वपूर्ण था। ऐसे में शिवरात्रि का पर्व हमें प्रकृति से जुड़कर उसकी रक्षा और संरक्षण का संदेश देता है। इससे भगवान शिव के परिवार का प्रकृति से विशेष प्रेम समझा जा सकता है। 

आचार्य अनिल मिश्रा ने कहा कि भगवान शिव के गले में सांप होता है जो किसानों का मित्र समझा जाता है। यह फसलों में लगने वाले कीड़े-मकोड़े को नष्ट कर उसकी रक्षा करता है। जबकि भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा और जटा में गंगा समाहित है। यानी समस्त संसार को भगवान शिव से जल की प्राप्ति होती है। 

शिव द्वारा अपनी जटाओं में गंगा को बांधे रखना प्रकृति में जल संरक्षण के महत्व को दर्शाता है। दूसरी ओर भगवान शिव की सवारी बल है जो खेती-बारी के कामों में किसानों की मदद करते हैं। चूहा भगवान शिव के परिवार का हिस्सा है। यह सिद्धिदाता गणेश की सवारी है। भगवान कार्तिकेय की सवारी मोर है। मोर, चूहा और सांप प्रकृति के अभिन्न अंग हैं। 

अनिल मिश्रा ने कहा कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनायी जाने वाली महाशिवरात्रि का पावन पर्व इस वर्ष 8 मार्च को मनाया जायेगा। शास्त्रों के अनुसार इस दिन शिव-पार्वती की व्रत, पूजा विशेष फलदायी होती है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष शिवरात्रि पर श्रवण एवं धनिष्ठा नक्षत्र के साथ शिव योग का निर्माण होने से इस दिन को और विशिष्ट बना रहा है।

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