भस्त्रिका प्राणायाम की मानव जीवन में उपयोगिता : योगाचार्य महेश पाल

 

योगाचार्य महेश पाल

एबीएन सोशल डेस्क। प्राणायाम जीवन का रहस्य है सांसों के आवागमन पर ही हमारा जीवन निर्भर है और आॅक्सीजन की अपर्याप्त मात्रा से रोग और शोक उत्पन्न होते हैं। प्रदूषण भरे माहौल और चिंता से हमारी सांसों की गति अपना स्वाभाविक रूप खो ही देती है, जिसके कारण प्राण वायु संकट काल में हमारा साथ नहीं दे पाती। 

ऐसे में प्राणायाम को सीखकर अपने जीवन का अंग बनायें। योगाचार्य महेश पाल भस्त्रिका प्राणायाम के बारे में विस्तार पूर्वक बताते हैं कि प्राणायाम के मुख्य प्रकारों में से एक भस्त्रिका प्राणायाम है। संस्कृत में भस्त्रिका का अर्थ होता है धोकनी। आज हम भस्त्रिका प्राणायाम का मानव जीवन में किस प्रकार से महत्व एवं वो किस प्रकार से हमारे दैनिक दिनचर्या में हमारे उत्तम स्वास्थ्य के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। 

इसके विषय में जानेंगे भस्त्रिका का शाब्दिक अर्थ है धोकनी अर्थात एक ऐसा प्राणायाम जिसमें लोहार की धोकनी की तरह आवाज करते हुए वेग पूर्वक शुद्ध प्राणवायु को अंदर ले जाते हैं और अशुद्ध वायु को बाहर निष्कासित करते हैं। भस्त्रिका प्राणायाम की चर्चा योग ग्रंथ हठयोग प्रदीपिका में स्वामी स्वात्माराम जी ने विस्तार पूर्वक की है। 

भस्त्रिका प्राणायाम करने के लिए सिद्धासन या सुखासन में बैठकर कमर गर्दन और रीड की हड्डी को सीधा रखते हुए शरीर और मन को स्थिर रखें। ज्ञान या ध्यान मुद्रा का चयन कर आंखें बंद कर लें। फिर तेज गति से दोनों नाशिकाओं से सांस लें और तेज गति से ही सांस बाहर निकाले श्वास लेते समय पेट फूलना चाहिए और सांस छोड़ते समय पेट अंदर की और जाना चाहिए। इससे नाभि स्थल पर दबाव पड़ता है। 

इस प्राणायाम को करते समय श्वास की गति को पहले थोड़ा धीर रखें फिर श्वास भरना और सांस छोड़ना धीरे-धीरे गति को बढ़ायें। भस्त्रिका प्राणायाम के अभ्यास से हमारे शरीर पर कई प्रकार के प्रभाव देखने को मिलते हैं। विषाक्त तत्व खत्म हो जाते हैं। वात पित्त कफ संतुलित हो जाते हैं। भस्त्रिका प्राणायाम फेफड़ों के साथ आंख, कान और नाक के स्वास्थ्य और   इम्यूनिटी को बनाये रखने के लिए भी लाभदायक है। 

इस प्राणायाम से पाचन संस्थान, लीवर और किडनी की भी एक्सरसाइज हो जाती है। साथ ही मोटापा, दमा, टीबी और सांसों से जुड़े रोग दूर हो जाते हैं। मासपेशी से जुड़े किसी भी रोग में भी भस्त्रिका प्राणायाम को लाभकारी माना गया है। फेफड़ों में हवा की तेजी से अंदर बाहर होने की वजह से डाइफ्राम से आक्सीजन और कार्बन डाइआॅक्साइड की अदला बदली ज्यादा जल्दी होती है। इस वजह से चयापचय क्रिया की दर बढ़ जाती है। 

शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है और विषैले तत्व शरीर से बाहर निकल जाते हैं। डायाफ्राम के तेजी से और लयबद्ध तरीके से काम करने से आंतरिक अंगों की मालिश होती है और वह पूर्ण रूप से स्वस्थ व ऊर्जान्वित हो जाते हैं। जिससे उनकी कार्य क्षमता बढ़ती है और हमारा पूरा शरीर आंतरिक रूप से स्वस्थ और सुदृढ़ हो जाता है।  

ये बरतें सावधानी 

इस प्राणायाम को करते समय हमें कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए भस्त्रिका प्राणायाम उच्च रक्तचाप वाले व्यक्ति को नहीं करनी चाहिए। हृदय रोग, सिर चकराना, मस्तिष्क ट्यूमर, मोतियाबिंद, आंत या पेट के अल्सर या पेचिश के मरीजों को ये प्राणायाम नहीं करना चाहिए। 

गर्मियों में इसके बाद शीतली या शीतकारी प्राणायाम करना चाहिए, ताकि शरीर ज्यादा गर्म ना हो जाये। योग हमारे शरीर और मन को  स्वस्थ बनाकर हमें जागरूक करता है और साथ ही हमें सही मार्ग पर चलने के लिए उचित विचार और हमारी भावनाओं को शुद्ध करता है जिससे हम आध्यात्मिक की और आगे बढ़ते हुए जीवन के मुख्य उद्देश्य को समझ कर राष्ट्र निर्माण  में अपना योगदान देते हुए अपने जीवन की यात्रा को सुखद समृद्ध और प्रभावशाली बनाते हुए समाधि को प्राप्त हो जाते हैं इसलिए हम सभी को हमारी दैनिक दिनचर्या में योग जरूर करना चाहिए। (लेखक गुना मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध योगाचार्य हैं।)

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