उमराह सुन्नत है और हज फर्ज है : मौलाना मुमताज अहमद

 

उमराह खुदा से गुनाहों की माफी का तलब

लोहरदगा के बताहा एकाडमी परिसर में एक रोजा उमराह तरबियत कैंप का आयोजन

बड़ी संख्या में उलेमा- ए-अकरम और एकाडमी की बच्चियां हुई शामिल

टीम एबीएन, लोहरदगा। उमराह से हर मुसलमान के ईमान को ताज होता है। यही नहीं खुदा से गुनाहों की माफी तलब का यह मौका भी है। उक्त बातें मौलाना मुमताज अहमद ने कहीं। वह मंगलवार को लोहरदगा में आयोजित उमराह तरबियत कैंप को संबोधित कर रहे थे।

मौलाना मुमताज ने कहा कि उमराह करने वाले मुसलमान को लाभ शुरू से अंत तक मिलता है। उमराह की यात्रा अल्लाह और इस्लाम में व्यक्ति के विश्वास को पुनर्जीवित करती है। उमराह की सुन्नत को मामूली पाक यात्रा के रूप में भी जाना जाता है, यह बेहद फायदेमंद है, क्योंकि यह इस्लाम के सभी अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक शुद्धता का स्तर लाता है।

लोहरदगा कुटुम रोड स्थित बताहा एकादमी परिसर में मंगलवार को उमराह तरबियत कैंप का आयोजन किया गया। इसमें उमराह के लिए मक्का शरीफ जाने वाले मौलाना मुमताज अहमद, रुखसाना खातून, रफीक अंसारी, इमराना देवी, मो सिद्दीक, संजीदा खातून, फैजान अहमद रजा, नुमान अहमद रजा, नूरी बाजला विशेष तौर पर मौजूद थी।

मौके पर मौलाना मो गुलजार, मौलाना अब्दुल वाहिद, इम्तियाज अहमद, शाहनवाज अहमद सुमित बता है एक आदमी के तमाम छात्राएं और शिक्षिकाएं शहर के प्रबुद्धजन, उलेमा ए एकराम खास तौर पर मौजूद थे।

मौलाना गुलजार ने कहा कि सऊदी अरब ने चार अक्टूबर से उमराह की इजाजत का ऐलान किया है। उमराह सालाना हज का संक्षिप्त रूप होता है। मक्का की यात्रा को उमराह कहा जाता है। यह यात्रा काफी पाक होता है। मक्का और मदीना से ही हमें अपने इस्लामी जीवन जीने की पद्धति को संचालन करने का निर्देश मिलता है। यूं कहे की यह हमारे लिए गाइडलाइन है।

इसलिए प्रत्येक मुसलमान को अपने जीवन में कम से कम एक बार उमराह (पवित्र काबा की यात्रा करना) करने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि उनके लिए क्षमा मांगी जा सके। पापों और सर्वशक्तिमान से आशीर्वाद उमराह स्वैच्छिक और सुन्नत है।

मौलाना वहीद ने कहा कि उमराह करने वाला गुनाहों से पाक हो जाता है। सऊदी अरब से बाहर के यात्रियों को स्पेशल उमराह वीजा की जरूरत होती है। यह वीजा एक महीने तक मान्य रहता है। सऊदी अरब और आसपास रहने वाले लोग बिना किसी खास दस्तावेज के उमराह करते हैं। उन्होंने उमराह के दौरान अपने जाने वाले तौर-तरीकों के बारे में विस्तार से बताया।

उमराह स्वैच्छिक और सुन्नत है, जबकि हज शारीरिक और आर्थिक रूप से मजबूत मुसलमानों पर फर्ज है। हज इस्लाम के पांच सतूनों में से एक है। जिंदगी में एक बार उन्हें मक्का-मदीना जाकर हज करना जरूरी होता है। हज इस्लामी कैलेंडर के आखिरी महीने की 8-13 तारीख के बीच किया जाता है जबकि उमराह के लिए समय की बाध्यता नहीं है। कभी भी मक्का में जाकर किया जा सकता है। 

मौके पर तरबियती कैंप आयोजित करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता इम्तियाज अहमद ने कहा कि दुनिया का कोई भी मुसलमान कभी भी उमराह कर सकता है। उमराह दो घंटे के अंदर तेजी से किया जाने वाला आध्यात्मिक अमल है। जबकि हज कई दिनों तक चलनेवाली लंबी प्रक्रिया का नाम है। 

दुनिया में हज के मौके पर सबसे ज्यादा भीड़ इकट्ठा होती है। हज और उमराह करनेवाले तीर्थ यात्रियों को काबा के इर्द गिर्द चक्कर लगाना होता है। काबा के महत्व का अंदाजा इसी लगाया जा सकता है, कि दुनिया के मुसलमान इसकी दिशा में पांच वक्त की नमाज पढ़ते हैं।

एहराम बांधने के साथ नियम हो जाते हैं लागू

उमराह करने वाले यात्रियों को एहराम की हालत में होना चाहिए एहराम हज और उमराह का एक खास लिबास होता है। एहराम बांधने के साथ ही लड़ाई-झगड़ा, गाली और अपशब्दों का इस्तेमाल हराम हो जाता है। यहां तक कि किसी जानवर को भी नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। 

तीर्थ यात्रियों को नाखून, दाढ़ी, बाल कटाने की इजाजत भी नहीं होती है। कैंप में आये उलेमाओं का इस्तेमाल शाहनवाज अहमद, अफरोज, मौलाना रियाज और एकादमी के बच्चियों ने की। मौके पर एकादमी के बच्चियों ने नात और कैरत प्रस्तुत किया।

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