प्रकृति के संरक्षक 80 के संत फ्रांसिस का पर्व आज

 

टीम एबीएन, रांची। संत फ्रांसिस आफ असीसी द्वारा स्थापित धर्म समाज फ्रांसिस्कन टीओआर तथा असीसी के संत फ्रांसिस अनुयायी प्रतिवर्ष  चार अक्टूबर को प्रीति के महान संरक्षक संत फ्रांसिस आॅफ असीसी का त्योहार मनाते हुए उनके आदर्शों को जीने का संकल्प लेते हैं।

फ्रांसिस का जन्म इटली के आशीष शहर में हुआ था उनके पिता कपड़ों के व्यवसाय थे। पिता का नाम पेट्रो डी वर्नाडोर्नी और माता का नाम पाइका द वूर्लमान्ट था। सर के बचपन का नाम जोवान्नी डी वर्नाडोर्नी था। संपन्न घराने के होने के कारण फ्रांसिस युवावस्था से ही बहुत शौकीन थे। 

लेकिन बहुत धन दौलत के प्रति उनमें विशेष रुचि नहीं थे। उनके पिता चाहते थे कि फ्रांसिस व्यापार में दिलचस्पी ले और उसे आगे बढ़ाये। फ्रांसिस बचपन से ही बहुत-बहुत प्रवृत्ति के थे और गरीबों और जल संबंधों की मदद किया करते थे। युवावस्था में उन्होंने आईसीसी की सेवा में भर्ती होकर पड़ोसी देश के साथ युद्ध में शामिल हुए। 

युद्ध के दौरान ही उन्होंने ईश्वरीय वाणी सनी की किसी की जान लेना, जहां ने पाप है और यह भी सुना कि तुम मनुष्यों की नहीं मालिक की सेवा करो। इस वाणी से प्रभावित होकर फ्रांसिस ने संपन्निता और खुशहाली का जीवन त्याग कर निर्धनता आज्ञाकारिता और ब्रह्मचारिता का जीवन जीते हुए स्वयं को प्रभु की सेवा में समर्पित करने का संकल्प लिया। 

इसके लिए उन्होंने अपने पिता की सारी संपत्ति का त्याग कर पूरे का वस्त्र धारण किया और प्रभु की सेवा में उड़ गये फ्रांसिस का जीवन दया व करुणा के भाव से उत्प्रोत था। वह मन वचन और कम से अपने आराध्य प्रभु यीशु के अनुयायी थे। एक बार वह सेंड डेमियानो के गिरजाघर में प्रार्थना में लेने थे, तो उन्हें ईश्वरीय आदेश की अनुभूति हुई कि फ्रांसिस तुम इस जर्जर और जिन गिरजा घर का निर्माण करो। 

इस आदेश से प्रभावित होकर संत फ्रांसिस दूसरों से सहयोग लेकर और भीख मांग कर चर्च के निर्माण के लिए धन राशि इकट्ठा की और चर्च का निर्माण किया। फ्रांसिस ईश्वर के प्रेम पश्चाताप और क्षमता पर प्रवचन सुनाते और लोगों को ईश्वर की ओर आने का आमंत्रण देते थे। 

उनसे प्रभावित होकर कई लोग फ्रांसिस के अनुयायी बन गये। अनुयायियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए फ्रांसिस ने 12 शिष्यों के साथ मिलकर वर्ष 1206 में धर्म समाज की स्थापना की, जिसे तत्कालीन पॉप इनोसेंट ने अपनी पूरी सहमति प्रदान की। 

फ्रांसिस सूरज को अपना भाई चंद्रमा को अपनी बहन फूल पौधे पशु पक्षी पहाड़ नदी झरना सभी को अपना मित्र और भाई-बहन समझते थे। शुरू से ही उन्होंने प्रकृति के साथ मित्रवत होकर जीने का और उनके संरक्षण का संदेश दिया। 

3 अक्टूबर 1226 को 45 वर्ष की आयु में फ्रांसिस ने अपना देश त्याग दिया और हमेशा के लिए प्रभु में सो गये। 16 जुलाई 1228 को उन्हें संत घोषित किया गया और तब से प्रत्येक वर्ष 4 अक्टूबर को आईसीसी के संत फ्रांसिस के अनुयायी उनके त्यौहार मनाते हुए उनके आदर्शों को याद करते हैं और लोगों को प्रकृति के साथ मित्रवत जी ने तथा उनके संरक्षण का संदेश देते हैं। 

इस अवसर पर हरमू स्थित सेंट फ्रांसिस चर्च में बुधवार कर अक्टूबर को प्रात: ही समझ ही पवित्र मिश्रा चढ़ायी जायेगी और शाम को डॉक्टर कामिल बुल्के पथ स्थित फ्रांसिस टीओ आर मोनेस्ट्री में सभी फ्रांसिस कर अनुयायी अन्य धर्म समाज के अनुयायियों के साथ मिलकर पर्व की खुशियां साझा करेंगे।

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