एबीएन एडिटोरियल डेस्क। साहित्य मनुष्य की आंतरिक अनुभूतियों और संवेदनाओं का अभिव्यक्त रूप होता है। यह माना जाता है कि मानव की आंतरिक भावनाएं समान होती हैं। उसकी महसूस करने तथा भाव प्रकट करने की शक्ति भी सार्वभौमिक है। शोक, हर्ष, घृणा क्रोध, प्रेम और वात्सल्य जैसे अनेक भाव विश्व-मानव में समान पाये जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप साहित्य का मूलभूत ढांचा सभी भाषाओं में एक-सा दिखाई देता है।
हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल को स्वर्णयुग कहा गया है। इस युग को कबीर, जायसी, सूर, तुलसी जैसे कवियों ने अपनी काव्य-प्रतिभा से विभूूषित किया है। रामाश्री शाखा के कवियों में गोस्वामी तुलसीदास का सर्वोच्य स्थान है। रामचरितमानस उनकी सर्वाधिक उत्कृष्ट व पठनीय कृति है। उन्होंने लोकमंगल की भावना से प्ररित होकर राम के मंगलमय चरित्र का गान प्राय: सभी रचनाओं में किया है। रामचरितमानस लोक-व्यवहार का संचित कोश है। जिसमें गृहस्थ जीवन, संयुक्त परिवार, पति-पत्नी धर्म, भातृत्व प्रेम, सदाचार की नीति के साथ-ही-साथ आदर्श राजधर्म के श्रुति सम्मत सिद्धांत हैं।
तुलसीदास को अपने युग की परिस्थितियों का गहरा अनुभव था। युगीन विशमताओं और विसंगतियों को ठीक से पहचाना था। इन सबको देखकर, परखकर ही उन्होंने रामचरितमानस जैसे काव्य का प्रणयन किया। जिसके माध्यम से हताश भारतीय जनता के मन में नवोन्मेष का संचार किया। आपसी भेद-भाव और वैमनस्य को भुलाकर बिखरी हुई जन-शक्तियों को संगठित किया।
उनकी इस असाधारण जीवनदृष्टि एवं लोकचेतना को देखते हुए डॉ आनंद नारायण शर्मा लिखते हैं- तुलसी पर हिंदी भाषा ही नहीं, समूचे भारतवर्ष को गर्व है, उसी प्रकार जिस प्रकार शेक्सपियर पर इंगलैंड को गर्व है। हां, यह और बात है कि दूसरे प्रबुद्ध राष्ट्रों की तरह अपनी चीजों पर गर्व करना भी हम अभी नहीं सीख पाये हैं।
रामचरितमानस में तुलसीदास राम के मनुज रूप लेने कारणों का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि जब-जब धर्म का ह्रास होने लगता है, अभिमानियों का वर्चस्व बढ़ने लगता है, विप्र (विवेक प्रधान व्यक्ति), गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाने लगती है, तब-तब वे मनुष्य रूप धारण करते हैं। यथा-
जब जब होइ धरम कै हानी।
बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी।
सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा।
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।
भारत की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में हर पांच साल में नई सरकार बनती है, परंतु गौ, पुथ्वी और विप्र का कल्याण नहीं होेता वरन् अभिमानियों का वर्चस्व बढ़ता है। सामाजिक वैमनस्य घटने के बजाय बढ़ने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में रामचरितमानस के सान्निध्य में जाना समुन्नत भारत के निर्माण में निश्चय ही सहायक होगा।
तुलसी के दशरथ और राम यद्यपि पुरानी शासन-व्यवस्था के राजा हैं, ताथपि वे आधुनिक लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप लगते हैं। राजा दशरथ राम का राज्याभिषेक अपने अधिकार से कर सकते थे, किंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। जनता-जनार्दन की भावनाओं पर छोड़ दिया और कहा आप सबको जैसा उचित लगे कीजिए। यथा
जौं पांचहि मत लागै नीका।
करहु हरषि हियं रामहि टीका।।
इतना ही नहीं जब राम चैदह वर्ष का वनवास बिताकर अयोध्या को आये और राज्य के सिंहासन पर बैठे, तब उन्होंने किसी पूर्ण अधिकार प्राप्त शासक (अधिनायक) की भाँति मनमाना आचरण, (निरंकुशता) स्वेच्छाचारिता, तानाशाही को नहीं अपनाया, बल्कि उन्होंने जनमानस को पूरी छूट दे दी। साथ-ही कहा कि यदि मैं राजधर्म के विरूद्ध राज करूं तो आप सभी निर्भय होकर अपनी बात कहिए। यथा-
जौं अनीति कहु भाषौं भाई।
तौ मोहि बरजहु भय बिसराई।।
आज जन भावनाओं को दबाया जाता है, उन पर जबर्दस्ती कानून थोपे जाते हैं, ताकि वह सुगबुगाहट करने के लायक भी नहीं बचे। ऐसे समय में समुन्नत भारत का निर्माण कैसे संभव है? यह तभी संभव है जब भारतीय जतमानस पुन: राम के दिखाये, सुझाये आदर्शों पर चलने लगेंगे।
भौतिक साधनों की अधिकता, वैज्ञानिक उपक्रमों की प्रचुरता से ही मानवता का कल्याण नहीं हो सकता है। रामचरितमानस में लंका वैज्ञानिक उपलब्धि और समृद्धि का प्रतीक है। किंतु वैज्ञानिक उपलब्धियों के ऊपर रावण जैसे अधर्मी शासक की शासन-व्यवस्था हो तो वहां पर शोषण, स्त्री पर अत्याचार, धर्मचारण करने वाले प्रताड़ित होगें ही। हमें समुन्नत भारत के निर्माण में रावण नहीं राम के आदर्श चाहिए।
समुन्नत भारत के निर्माण में एक और सबसे बड़ी बाधा है- जातिवाद की, छुआछूत की। उन्हें समाप्त किये बिना भारत समुन्नत नहीं हो सकता है। राम के वनवास के उपरांत ब्राह्मण श्रेष्ठ वशिष्ठ निषादराज चांडाल से गले मिलते हैं, उन्हें हृदय से लगाते हैं तो दूसरी ओर क्षत्रिय कुलभूषण राम शबरी के जूठे बेर खाते हैं। यह क्या है? यह है परम्परागत जाति व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) पर बड़ा प्रहार। राम शबरी के आश्रम में शबरी का बेर खाते हुए स्पष्ट शब्दों में घोषणा करते हैं कि मैं जात-पात नहीं देखता, वरन् व्यक्ति का आचरण को देखता हूं। यथा-
कह रघुपति सुनु भामिनी बाता।
मानउं एक भगति कर नाता।।
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई।
धन बल परिजन गुन चतुराई।।
भगति हीन नर सोहइ कैसा।
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।
जातिवाद, छुआछूत का विरोध तुलसी के मानसेत्तर काव्य में भी मिलता है। यथा-
धूत कहौ, अवधूत कहौ, राजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगार न सोऊ।।
मेरे जाति-पांति न चहौं काहू की जाति-पांति।
मेरे कोऊ कामको न हौं काहूके कामको।
भारत को समुन्नत बनाने के लिए प्राकृतिक संपदाओं का संरक्षण जरूरी है। परन्तु स्थिति उल्टी है। आज मनुष्य का लालच हावी है। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन जारी है। महात्मा गांधी कहा करते थे कि पृथ्वी मनृष्य की हर जरूरत को पूरा कर सकती है, लेकिन वह मनुष्य की लालच को कभी पूरा नहीं कर सकती। प्रकृति के दोहन का दुष्परिणाम हमारे सामने है। मनुष्य काल के गाल में समा रहा है। सम्पूर्ण मानवता के इतिहास पर संकट मंडरा रहा है। रामराज की स्थिति दूसरी थी। उस समय प्रकृति संरक्षित थी। जैसा तुलसी ने स्पष्ट किया है। यथा-
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन।
रहहिं एक संग गज पंचानन।।
खग मृग सहज बयरु बिसराई।
सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा।
अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।
आज वन-जंगल भी सुरक्षित नहीं है। इसलिए वन्य जीव-जन्तु गाँवों तक आ जाते हैं। किसानों के धान, फल, सब्जी को नष्ट करते हैं। झारखंड के गांवों में अब तो हाथियों का आना, फसलों को नष्ट करना आम बात हो गयी है। हाथियों के उपद्रव से ग्रामीण जन प्रभावित हैं। इतना ही नहीं पक्षियों का कलरव भी कम हो गया है। अनेक पक्षियों की प्रजाति विलुप्त होने की कगार में हैं उनमें- चील, गिद्ध, कौआ, गौरेया प्रमुख हैं।
आज हमारी नदियां भी सुरक्षित नहीं है। उनका अस्तित्व खतरे में है। नदियों पर कूड़ा-कचड़ा का अम्बार हो गया है। नदियों की स्वेद जल धारा मैली हो गयीं हैं। ऐसे में समुन्नत भारत की कल्पना कैसे संभव है? रामराज में ऐसी स्थिति नहीं थीं। उस समय नदियाँ साफ-सुथरी और संरक्षित थीं। यथा-
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।
बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।
भारत को उन्नत बनाने के लिए ऋषि संस्कृति के साथ-साथ कृषि संस्कृति को भी बढ़ावा देनी होगी। हमारे देश में आये दिन समाचार पत्रों, न्यूज चैनेलों के माध्यम से पता चलता है कि आमुक किसान ने आत्महत्या की। किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? इसकी पड़ताल जरूरी है। इस देश की विडंबना है कि कृषि-कार्य करने वालों को समाज उनके सीधेपन, भलेपन के कारण उन्हें हमेशा से हेय दृष्टि से देखती आयी है। उन्हें बेवकूप समझा जाता है। समाज व देश में किसानों का मसीहा बनकर अपना स्वार्थ साधना करने वालों की भी कमी नहीं है। मानस में वर्णित किसानों की ऐसी दशा नहीं थी। वे उन्नत और समृद्ध थे। यथा-
ससि सम्पन्न सदा रह धरनी।
त्रेता भइ कृतयुग कै करनी।
कोरोना महामारी वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती है। इससे भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व प्रभावित है। इस महामारी ने वैश्विक स्तर पर मानवता के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है। इससे निजात पाने के लिए पूरी दुनिया तत्पर है। कुछ हद तक सफलताएं मिली हैं। पूर्णता की खोज जारी है। रामचरितमानस में चिकित्सीय धर्म का भी एक सुंदर प्रसंग मिलता है।
जहाँ मेघनाथ युद्ध-भूमि में छिपकर लक्ष्मण पर शक्ति-बाण चलाता है। लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं। उस समय विभीषण सलाह देते हैं कि लंका में सुषेण नाम का एक वैद्य रहता है, जो इसका उपचार कर सकता है। हनुमान राम की प्ररेणा से वैद्य को लाते हैं। तब सुषेण शत्रु पक्ष का वैद्य होने की बात कहते हुए चिकित्सा करने से मना करता है। तब राम उन्हें चिकित्सीय धर्म को बतलाते हैं। फिर वह लक्ष्मण की चिकित्सा (उपचार) करता है। कोरोना काल में चिकित्सीय धर्म का ह्रास हुआ है।
भारत की समुन्नोति के लिए पड़ोसी राज्यों से बेहतर संबंध होना भी जरूरी है। हम आये दिन समाचारों के माध्यम से देखते-सुनते आ रहे हैं कि भारत-पाक सीमा पर तनाव हुआ, गोली-बारी हुई। इसलिए पड़ोसी राज्यों से प्रगाढ़ संबंध हो ऐसा सामर्थ्य और शक्ति को भी विकसित करना होगा। मानस में वर्णित कथानुसार अयोध्या का लंका से अच्छा संबंध था।
समुन्नत भारत के निर्माण में संस्कृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। संस्कृति का संरक्षण, संवर्द्धन आवश्यक है। स्वतंत्रता के पूर्व भारतीय संस्कृति को कलुशित करने के लिए विदेशी आक्रांता आये, परन्तु असफल रहे। वे यहीं के हो गये। उसी प्रकार यहां की नदियां, सभी दिशाओं से बेगवती रूप से बहती हुई समुद्र में मिल जाती हैं। भारतीय संस्कृति सर्वग्राही है। भारतीय संस्कृति में राम तथा रामकथा का अप्रतिम स्थान है। राम के आदर्शों की चर्चा सभी धर्म, सम्प्रदाय व पंथ के लोग करते हैं। राम भारतीय संस्कृति के प्रेरणास्रोत हैं। उनके चरित्र से संस्कृति को सीख मिलती हैं। यथा-
अनुज सखा सँग भोज करहीं।
मातु पिता अग्या अनुसरहीं।
प्रात:काल उठि कै रघुनाथा।
मातु पिता गुरु नावहिं माथा।।
आयसु मागि करहिं पुर काजा।
भारतीय संस्कृति की उदारता सर्वविदित है। यह उदारता हमें राम के चरित्र से मिलती है। मानस के कथानुसार राम विभीषण को यह जानते हुए भी अपनाते हैं कि उनके बड़े भाई रावण ने सीता का हरण किया है। वानरराज सुग्रीव राम को अगाह करते हुए कहते हैं। यथा-
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई
आवा मिलन दसानन भाई
कह प्रभु सखा बूझिए काहा।
कहइ कपीस सुनहु नर नाहा।
जानि न जाइ निसाचर माया
काम रूप केहि कारन आया।
सुग्रीव की इतनी बात सुनने के बाद उन्हें आश्वस्त करते हुए राम कहते हैं कि संसार में जितने भी राक्षस हैं, उन्हें लक्ष्मण क्षण भर में समाप्त कर सकते हैं। इसलिए विभीषण को मेरे पास आने दीजिए। यथा-
जग महुं सखा निसाचर जेते।
लछिमन हनइ निमिष महुं तेते।।
उभय भांति तेहि आमहु हंसि कह कृपा निकेत
भारत को समुन्नत बनाने के लिए भारतीय प्रबुद्ध जनों, साहित्यकारों, जनताओं के बीच वापसी सामंजस्य का होना जरूरी है। किंतु यथा स्थिति ठीक इसके विपरीत है। आज के साहित्यकारों में एक खेमा बन गया है। अपने ही खेमे के रचना व रचनाकारों की प्रशंसा करते हैं, उन्हें आगे बढ़ाते हैं। ऐसे में साहित्य का वास्तविक उत्थान कैसे हो सकता है? जबकि तुलसीदास साहित्य के उद्देश्य को स्पष्ट करते कहते हैं। यथा-
कीरति भनिति भूति भलि सोई।
सुरसरि सम सब कहं हित होई।
राम सुकीरति भनिति भदेसा।
असमंजस अस मोहि अंदेसा।।
तुसली कृत रामचरितमानस को पढ़ने के बाद चता चलता है कि उन्होंने राम की कथा में शुरू से अंत तक सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है। साथ-ही मानवता के निर्माण में सहानुभूति एवं नैतिकता का उच्चतर चरित्र प्रस्तुत किया है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- तुलसीदास के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय-शक्ति में है।
उन्हें लोक शास्त्र दोनों का बहुत व्यापक ज्ञान प्राप्त था। उनके काव्य-ग्रन्थों में जहां लोक-विधियों के सूक्ष्म अध्ययन का प्रमाण मिलता है, वहीं शास्त्र के गंभीर अध्ययन का भी परिचय मिलता है। लोक और शास्त्र के इस व्यापक ज्ञान ने उन्हें अभूतपूर्व सफलता दी। उसमें केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय नहीं है, वैराग्य और गार्हस्थ का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण का, पुराण और काव्य का, भावावेग और अनासक्त चिंतन का, ब्राह्मण और चांडाल का, पंडित और अपंडित का समन्वय। रामचरितमानस के आदि से अंत दो छोरों पर जानेवाली परा-कोटियों को मिलाने का प्रयत्न है।
तुलसीदास हिंदी साहित्य के प्रतिमान हैं। उनके रामादर्श समुन्नत भारत के निर्माण में भी प्रेरक और प्रासंगिक लगते हैं। तुलसी हिन्दी के गौरव हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में- यदि कोई पूछे कि जनता के हृदय पर सबसे अधिक विस्तृत अधिकार रखनेवाला हिन्दी का सबसे बड़ा कवि कौन है, तो इसका एक मात्र यही उत्तर ठीक हो सकता है कि भारतहृदय, भारतीकंठ, भक्तचूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदास।
समुन्नत भारत के निर्माण में रामचरितमानस की भूमिका अपरिहार्य है। यह एक कालजयी रचना है। शाश्वत जीवन-मूल्य का खजाना है। तत्कालीन समय का प्रामाणिक दस्तावेज है। युगीन यथार्थ है। जिसका ध्येय है- मानवता की सुरक्षा और वसुधा की रक्षा। तुलसी के दशरथ और राम यद्यपि पुरानी शासन-व्यवस्था के राजा हैं, तथपि वे आधुनिक लोकतांत्रिक भावनाओं के अनुरूप लगते हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस से शंबूक-बध तथा सीता-निर्वासन जैसे प्रसंगों को निकाल दिया है।
साथ-ही राम के चरित्र में उदारता, शरणागत-वत्सलता एवं समाज के उपेक्षित, शोषित वर्गों के प्रति आत्मीयता को उनके आधार-ग्रन्थों की अपेक्षा अधिक व्यापक बनाया है। वे सनातन संस्कृति और शाश्वत जीवन मूल्य के प्रतिबद्ध कवि हैं। अत: हम कह सकते हैं कि समुन्नत भारत के निर्माण में भरत की भायप भगति और परहित सरिस धर्म नहिं भाई तथा सीय राम मय सब जग जानी का आदर्श बेहतर हो सकता है। (लेखक तुलसी अध्ययन केंद्र, चोगा, सोनाहातू, रांची, झारखंड के निदेशक हैं।)
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