विभिन्न जानकारियों को समेटे संपन्न हुआ दलित साहित्य सिनेमा और मीडिया विमर्श दस्तावेज

 

टीम एबीएन, रांची। स्कूल आफ मास कम्युनिकेशन, आरयू में 7-9अगस्त तक चले दलित साहित्य सिनेमा और मीडिया पर विमर्श दस्तावेज 09 अगस्त को मास कौम के सभागार में संपन्न हो गया। यह तीन-दिवसीय कांफ्रेंस मास कम्युनिकेशन आरयू और सुलभ इंटरनेशनल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। 

तीसरे दिन के प्रारंभ में राजस्थान व अन्य राज्यों  से आयी सफाईकर्मियों ने अपने संघर्ष और संस्मरण सुनाये। लक्ष्मी ने बताया कि मैं जब मायके में थी तो कभी साफ सफाई वाले काम नहीं की, पर विवाह के बाद मुझे वो सब करना पड़ता था जो मेरे लिए असह्य था। मैं रोती थी, प्रेग्नेंसी के समय तो मैं किसी नरक से गुजरती थी। उसके बाद मैं पति के साथ सुलभ इंटरनेशनल के सेंटर पर गयी और  सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर का काम सीखा और आज मैं गंदगी सफाई के काम से मुक्त होकर अपने पैरों पर खड़ी हूं। 

अनीता शर्मा ने भी अपने संघर्ष की कथा बतायी। इन्होंने कहा कि हमने भगवान को नहीं देखा, हमारे लिए भगवान तो बिंदेश्वर पाठक सर ही हैं। हम इनके लिए भारत रत्न की मांग करते हैं। इस आयोजन में ब्राह्मण बना दिया वीडियो गीत भी  दिखायी गयी। 

निदेशक मास कम्युनिकेशन डॉ सिन्हा ने कहा कि मैंने गांधी अंबेडकर को नहीं देखा, पर मुझे फख्र है कि मैंने डॉ बिंदेश्वर पाठक को देखा। मैं सोचता हूं कि आखिर ये छुआछूत और दलितों की उपेक्षा कब तक चलेगा। इन्हें भारत रत्न देने की बात की जाती है, पर मैं तो कहता हूं कि डॉ पाठक तो भारत रत्न हैं ही। इनकी बदौलत 50 हजार लोग आजीविकारत हैं। छुआछूत मिट रही है। दलितों को रोजगार-सम्मान मिल रहा है। ये क्या भारत रत्न से कम है? हमें इस देश में हजारों डॉ बिंदेश्वर पाठक की आवश्यकता है। 

मौके पर रांची विश्वविद्यालय के फाइनांस अफसर डॉ केएएन शाहदेव ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने विस्तार से नागवंशी राजाओं और यहां के मुंडा समाज के बीच के दो हजार सालों के संबंधों को विस्तार से बताया। संतोष किड़ो ने भी अपने विचार रखे और मुंडाओं के पारंपरिक किस्सागोई पर प्रकाश डाला। कुंदन चौधरी ने भारतीय सिनेमा में आदिवासियों के किरदार पर अपने विचार रखे। 

वासवी किड़ो ने पारंपरिक जड़ी बूटियों पर आधारित चिकित्सा पद्धति होरोपैथी के बारे में बताया। साथ ही इसके संरक्षण की बात कही। हमें वेबसाइट और इंटरनेट की दुनिया से बाहर निकलना चाहिए। झारखंड और आदिवासियों की विस्तृत पारंपरिक जानकारियां इंटरनेट और वेबसाइट पर नहीं मिलेंगी।  

दस्तावेज कांफ्रेंस के तीसरे दिन सभी सहयोगियों, फोटोग्राफर, कार्यकर्ताओं को निदेशक मास कम्युनिकेशन, आरयू प्रो डॉ बीपी सिन्हा ने स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। 

बेल्जियम से लौ की छात्रा और इंटर्नशिप के लिए रांची आयी वेलेंसिया ग्रेसिया ने भी कोलंबिया में आदिवासियों के जमीन खेती और अस्तित्व के संघर्ष के बारे में बताया। उन्होंने प्रोजेक्टर पर स्लाईड शो के माध्यम से कोलंबो के आदिवासियों को वस्तुस्थिति और संघर्ष को दिखाया। ब्राजील की लुसिया रोड्रिग्स ने ब्राजील की आदिवासी और जनजातियों और उनके अस्तित्व संकट के बारे में बताया। 

राजाराम महतो ने झारखंडी गीत संगीत नृत्य के बारे में बताया। वहीं स्टेफी टेरेसा मुर्मू ने आदिवासियों में परंपराओं के मौखिक स्थानांतरण और उनकी जाति उपजाति की बात की। इस अवसर पर प्रो डॉ बीपी सिन्हा (बिनोद कुमार) की बनायी फिल्म आक्रांत दिखायी गयी। जिसे पद्मश्री डॉ बिदेश्वर पाठक ने बहुत सराहा। 

विमर्श के समापन से पहले मनमोहक छऊ नृत्य  की प्रस्तुति दी गयी। जिसे सभागार  में डॉ बिंदेश्वर पाठक और दिल्ली से आयी टीम देख कर अभिभूत हो गयी। इसके साथ ही पारंपरिक मधुर नागपुरी गीतों की भी प्रस्तुति हुई। इस भव्य और  सफल कार्यक्रम के समापन पर धन्यवाद ज्ञापन मास कौम के उपनिदेशक डॉ विष्णु महतो ने किया। मौके पर सभागार में सैकड़ों छात्र, शिक्षक, कर्मी उपस्थित रहे।

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