टीम एबीएन, भुली (धनबाद)। मधुश्रावणी पर्व मिथिला में धूमधाम से मनाया जाता है। साथ ही मिथिला के लोग जहां भी निवास करते हैं मधुश्रावणी पर्व को वहीं धूमधाम से मनाते हैं। मधुश्रावणी पर्व सावन मास के शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि से मनाया जाता है और कृष्ण पक्ष के तृतीया तिथि को इसका समापन टेमी दागने की प्रथा के साथ समाप्त होता है।
इस बार अधिमास के कारण मधुश्रावणी पर्व 44 दिनों का है। सामान्यत: मधुश्रावणी पर्व 13 से 15 दिनों का ही होता है। 2004 के बाद 2023 में अधिमास के कारण मधुश्रावणी पर्व 44 दिनों तक मनाया जायेगा।
कोबर का है महत्व
मधुश्रावणी पर्व मनाने में कोबर का महत्व सांस्कृतिक रूप से भी है और धार्मिक भी। कोबर लिखने में भगवान सूर्य, शिव, पार्वती के साथ प्राकृतिक रूप से पेंड, पक्षी व जानवरों की तस्वीर बनायी जाती है। साथ ही नव दुल्हन व दूल्हा का नाम लिखा जाता है। कोबर के सामने ही पूजा के लिए हाथी, सांप, शिव, पार्वती की आकृति मिट्टी से बनाने का विधान है।
नवविवाहिता के लिए होता है खास
मिथिलानियों में नव विवाहिता मधुश्रावणी पर्व को विवाह के पहले साल में मनाती है और सुहागिन मिथिलानी मधुश्रावणी में एक दिन व्रत रख कर पति के लंबे उम्र की कामना करती है।
भुली सी ब्लॉक निवासी इंद्रकांत झा व बेबी देवी की पुत्री वसुंधरा अपने पति अवधेश के लिए मधुश्रावणी व्रत रख रही हैं। इन्द्रकांत झा ने बताया कि मधुश्रावणी पर्व में वर पक्ष व वधु पक्ष दोनों का सहयोग होता है। मधुश्रावणी पर्व ही ऐसा पर्व है जिसमे कन्या ससुराल से आये अन्न का सेवन करती है।
बेबी देवी ने बताया कि मधुश्रावणी व्रत में शिव पार्वती की कथा सुना जाता है। पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखा जाता है। व्रती वसुंधरा ने बताया कि मधुश्रावणी व्रत एक ही कपड़े में किया जायेगा और फूलों से डाली सजाने के बाद पूजा की जायेगी। इससे भगवान शिव व माता पार्वती की कथा सुनने व पूजा करने से सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।
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