अनुमान से ज्यादा पिघल रहे हैं हिमालयी ग्लेशियर

 

मुकुल व्यास 

एबीएन सेंट्रल डेस्क। गर्म जलवायु हिमालय के ग्लेशियरों को पिघला रही है। भारतीय उपमहाद्वीप के अरबों लोगों के लिए ये ग्लेशियर पानी के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन ग्लेशियरों की बर्फ सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों को पोषित करती है। 

ग्लेशियरों की बर्फ सिर्फ जीवनदायक जल का स्रोत ही नहीं है, यह पृथ्वी और हमारे महासागरों के ऊपर एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। ये चमकीले सफेद धब्बे अंतरिक्ष में अतिरिक्त गर्मी को परावर्तित करते हैं और ग्रह को ठंडा रखते हैं। 

सिद्धांत रूप से आर्कटिक भूमध्य रेखा की तुलना में ठंडा रहता है क्योंकि सूर्य से अधिक गर्मी बर्फ से परावर्तित होकर वापस अंतरिक्ष में चली जाती है। दुनिया भर के ग्लेशियर कई सौ साल पुराने हो सकते हैं। 

इनसे हमें यह वैज्ञानिक रिकॉर्ड मिलता है कि समय के साथ जलवायु कैसे बदल गई है। उनके अध्ययन से हमें इस बात की बहुमूल्य जानकारी मिलती है कि हमारा ग्रह किस हद तक तेजी से गर्म हो रहा है। 

एंटार्कटिका और आर्टिक के बाद दुनिया का तीसरा बड़ा बर्फ का भंडार हिमालय के पर्वतों में पाया जाता है। अब इस दुर्गम क्षेत्र के पहले संपूर्ण अध्ययन से पता चला है कि हिमालय के ग्लेशियर अपनी अरबों टन बर्फ गंवा चुके हैं। 

समय-समय पर अनेक वैज्ञानिक अध्ययनों में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने के बारे में चेतावनी दी जा चुकी है। लेकिन नई बात यह है कि यह नुकसान वैज्ञानिकों द्वारा लगाए अनुमानों से कहीं बहुत ज्यादा है। 

एक नये अध्ययन से पता चलता है कि हिमालय की झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर नुकसान को काफी कम करके आंका गया है। इसकी वजह यह है कि उपग्रह पानी के नीचे होने वाले ग्लेशियर के परिवर्तनों को देखने में अक्षम हैं। 

शोधकर्ताओं ने पाया कि पिछले आकलन में वृहत हिमालय में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के कुल नुकसान को 6.5 प्रतिशत कम करके आंका गया था। मध्य हिमालय में 10 प्रतिशत कम आकलन हुआ, जहां हिमनद से बनी झीलों का विकास सबसे तेज था। 

इस क्षेत्र से एक दिलचस्प मामला गेलोंग को झील का है, जिसमें ग्लेशियर क्षति का 65 प्रतिशत कम आकलन हुआ है। पानी के नीचे बड़े पैमाने पर होने वाले परिवर्तनों का पता लगाने में उपग्रह इमेजिंग की सीमाएं हैं। इसी वजह से यह चूक हुई। 

इससे ग्लेशियरों के संपूर्ण नुकसान के बारे में हमारी समझ में अंतर आया है। इस क्षेत्र में 2000 से 2020 तक सिकुड़ते हुए ग्लेशियरों से बनी झीलों की संख्या में 47 प्रतिशत, क्षेत्रफल में 33 प्रतिशत और आयतन में 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 

इस विस्तार के परिणामस्वरूप ग्लेशियर द्रव्यमान का 2.7 जीटी (ग्रॉस टनेज) का अनुमानित नुकसान हुआ। पिछले अध्ययनों ने इस नुकसान पर विचार नहीं किया था क्योंकि प्रयुक्त उपग्रह डेटा केवल झील के पानी की सतह को माप सकते हैं, लेकिन पानी के नीचे की बर्फ को नहीं नाप सकते जो पानी में बदल जाती है। 

क्षेत्रीय जल संसाधनों और हिमनद-झीलों में आकस्मिक बाढ़ के प्रभावों को समझने के लिए ये निष्कर्ष बहुत महत्वपूर्ण है। झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों से बड़े पैमाने पर होने वाले नुकसान को समझकर शोधकर्ता इन ग्लेशियरों के वार्षिक द्रव्यमान संतुलन का अधिक सटीक आकलन कर सकते हैं। 

नया अध्ययन हिमालय के ग्लेशियरों के नुकसान के कारणों को समझने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। साथ ही शोध यह भी दशार्ता है कि दुनिया में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर हो रहे नुकसान को भी समझने की जरूरत है। पूरी दुनिया में 2000 और 2020 के बीच ग्लेशियरों का नुकसान 12 प्रतिशत होने का अनुमान है। 

आस्ट्रिया की ग्राज यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिक और इस अध्ययन के सह-लेखक टोबियास बोल्च ने कहा कि ग्लेशियरों के नुकसान के पूवार्नुमान मॉडलों में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों के नुकसान को भी शामिल किया जाना चाहिए। एक अन्य सह-लेखक डेविड रोंस ने कहा कि 21वीं सदी में ग्लेशियरों के कुल नुकसान में झील में समाप्त होने वाले ग्लेशियरों का प्रमुख योगदान बना रहेगा। 

बड़े पैमाने पर नुकसान होने पर ग्लेशियर मौजूदा अनुमानों की तुलना में अधिक तेजी से गायब हो सकते हैं। ग्लेशियरों के अधिक सटीक अध्ययन से शोधकर्ता हिमालय के संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्र में भविष्य में जल संसाधन की उपलब्धता का बेहतर अनुमान लगा सकते हैं। आज पृथ्वी पर लगभग 10 प्रतिशत भूमि क्षेत्र ग्लेशियरों की बर्फ से ढंकी हुई है। 

लगभग 90 प्रतिशत बर्फ अंटार्कटिका में है, जबकि शेष 10 प्रतिशत ग्रीनलैंड की आइस कैप में है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में तेजी से ग्लेशियरों के पिघलने से भी समुद्र की धाराएं प्रभावित होती हैं, क्योंकि भारी मात्रा में ग्लेशियरों का पिघला हुआ ठंडा हुआ पानी समुद्र के गर्म पानी में प्रवेश कर रहा है।

 इससे समुद्र की धाराएं धीमी हो रही हैं। जैसे-जैसे जमीन पर बर्फ पिघलेगी, समुद्र के स्तर का बढ़ना जारी रहेगा। वैसे 1900 की शुरुआत से ही दुनिया भर के कई ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसकी मुख्य वजह मानवीय गतिविधियां हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद कार्बन डाइआक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने तापमान बढ़ा दिया। 

ध्रुवों में भी तापमान बढ़ा। इसके परिणामस्वरूप ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। अगर हम आने वाले दशकों में उत्सर्जन पर काफी हद तक अंकुश लगाने में कामयाब भी हो जाते हैं तो भी 2100 से पहले दुनिया के बचे हुए ग्लेशियरों में से एक-तिहाई पिघल जाएंगे। 

जहां तक समुद्री बर्फ की बात आती है, तो आर्कटिक में सबसे पुरानी और सबसे मोटी बर्फ का 95 प्रतिशत हिस्सा पहले ही खत्म हो चुका है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि उत्सर्जन अनियंत्रित रूप से बढ़ता रहा, तो वर्ष 2040 तक गर्मियों में आर्कटिक बर्फ मुक्त हो सकता है क्योंकि समुद्र और हवा का तापमान तेजी से बढ़ता रहेगा। (लेखक विज्ञान मामलों के जानकार हैं।)

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse