अंबेडकर जयंती पर आजादी, संविधान व लोकतंत्र की रक्षा के लिए एकजुट होने का लें संकल्प

 

संजय पासवान

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। जाति उन्मूलन चाहने वाले, दलित मुक्ति के लिए पूंजीवाद और जातिगत भेदभाव के खिलाफ वैचारिक संघर्ष को जरूरी मानने वाले क्रांतिकारी समाज सुधारक संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर का 14 अप्रैल को 132वां जन्मदिन मनाया जा रहा है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब जब धरती पर जुल्म बढ़ा है, तो जुल्म के खिलाफ शोषित पीड़ित लोगों ने जंग लड़ी है और जिसमें जीत भी मिली है। जिसका नेतृत्व करने वाले नायक का नाम इतिहास में अमिट है।

 यह भी हकीकत है कि जुल्म अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए इंसान को कई बार यातनाएं भी मिली है और कुर्बानियां भी देनी पड़ी है, लेकिन इस सब की बदौलत ही दुनिया में क्रांतियां हुई है, बदलाव आया है। बुनियादी बदलाव बिना बदनामी और बलिदान के संभव नहीं है। 

इसके लिए समर्पित संघर्षशील नेतृत्वकारी लोगों को दैवीय बनाकर, मसीहा, महामानव कहना या भगवान बना देना अज्ञानता, गैर वैज्ञानिक जनविरोधी सोच है। इससे समाज में जड़ता और रूढ़ीवादिता मजबूत होती है। इससे जन संघर्ष को कमतर कर दिया जाता है। इंसान जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है। 

जनसाधारण के बीच से यदि कोई जनता के दुख दर्द को ठीक से समझे, जनता के हक और अधिकारों के लिए सार्थक और सतत प्रयास करे, भ्रष्ट और लालची नहीं बने, बदनामी सहन कर सके और जरूरत पड़ने पर बलिदान भी दे सके, तो वह व्यक्ति महान बन सकता है। 

किसी नायक का पूजा करना भी उचित नहीं है। जैसा बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी कहा है कि क्योंकि इससे तानाशाही पनपती है, मिथ्या अवतारवाद को बढ़ावा मिलता है। आमलोगों में जनसंघर्षों के प्रति उदासीनता पनपती है।

ज्योतिबा फुले, अंबेडकर जैसे क्रांतिकारी नायकों ने ईश्वर अल्लाह के आदेश से नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थितियों में इंसान की बेहतरी और बदलाव के लिए अपने ज्ञान और विवेक का बेहतरीन इस्तेमाल किया था। संगठन बनाकर बुनियादी बदलाव का प्रयास किया था। 

आज भारत को शोषणमुक्त, समतामूलक बनाने के लिए आर्थिक शोषण के साथ साथ जातिगत भेदभाव और शोषण से मुक्ति अत्यंत जरूरी है। साथ ही महिलाओं के साथ भेदभाव, धर्म के नाम पर अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत के खिलाफ भी बोलना जरूरी है। क्योंकि वोट के खातिर हिंदु मुसलमान के बीच भड़काये दंगों में दलितों का इस्तेमाल बड़े स्तर पर हो रहा है। जिसके कारण रोजी रोटी के लिए संघर्ष कमजोर पड़ रहा है। 

चिंता की बात यह है कि समतामूलक भारत बनाने के लिए मार्गदर्शक हमारे समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष संविधान और लोकतंत्र पर हमले तेज हो रही हैं और कॉरपोरेट हितैषी, जातीय विषमता एवं सांप्रदायिक राजनीति और विचारधारा को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसलिए इन हमलों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाना भी देश की जरूरत है। 

इस वर्ष देश के दो राज्यों केरल और तमिलनाडु में वाइकोम आंदोलन की 100वीं वर्षगांठ मनायी जा रही है। वाइकोम आंदोलन वह आंदोलन है, जिसके माध्यम से केरल और तमिलनाडु में पिछड़ों और दलितों ने आंदोलन किया था और मंदिरों में प्रवेश का अधिकार जीता था। 

इस आंदोलन का इतना असर था कि पूरे केरल में किसी भी जाति के मंदिर में प्रवेश पर कोई रोक नहीं थी। आज वामपंथी शासन वाला राज्य केरल में दलित उत्पीड़न की घटनाएं न के बराबर हैं। लेकिन यह उत्तर, पश्चिम या पूर्वी भारत में नहीं हो सका। 

उत्तर भारत के बड़े राज्यों की बात करें तो आज दलितों के खिलाफ अत्याचारों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। 2018 से दलितों के खिलाफ अपराध के 1.3 लाख से अधिक मामले दर्ज किये गये हैं और यूपी, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश में दलितों के खिलाफ अपराध के मामले में सबसे ऊपर हैं।

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति  के खिलाफ अपराध के अधिकतम 36,467 मामले दर्ज किये गये, इसके बाद बिहार (20,973 मामले), राजस्थान (18,418) और मध्य प्रदेश में (16,952) मामले दर्ज हुए हैं। सनद रहे कि ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्हें बाहुबलियों, सामंतों और पुलिस की धमकियों की वजह से दर्ज नहीं किया जाता है।  

देश आजाद हुए 75 साल हो गया है, लेकिन चिंता की बात यह है कि महात्मा फुले, अंबेडकर, भगत सिंह, गांधी के सपनों का भारत नहीं बन पाया। आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का बेरहमी से दोहन के परिणामस्वरूप हम दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था जरूर बन गये हैं, लेकिन मानव विकास सूचकांक में भारत का स्थान 131वां है। 

वैश्विक भूख सूचकांक में हम 94वें पायदान पर हैं। सतत विकास के मानकों में भारत का स्थान 193 देशों की सूची में 117वां है। जेंडर समानता की दृष्टि से हमारा का स्थान 156 देशों में 140वां है। डेमोक्रेसी इंडेक्स में 167 देशों की सूची में भारत का स्थान 142वां है। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स के तहत 180 देशों की सूची में इंडिया का स्थान 142वां है।  

निजीकरण के कारण आरक्षण पर खतरा मंडरा रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य का तेजी से निजीकरण हो रहा है। आजादी के 75 वर्ष बाद भी शिक्षा पर जीडीपी का लगभग तीन प्रतिशत और स्वास्थ्य पर मात्र दो प्रतिशत ही खर्च किया जा रहा है। बेरोजगारी में दुनिया में पहले स्थान पर चल रहे हैं हम। करीब 35 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। किसान और मजदूर बदहाल है। 

राजनीति में बढ़ते धनबल और अपराधीकरण ने लोकतंत्र को बुरी तरह से कमजोर कर दिया है। जाति-धर्म के नाम पर नफरत और हिंसा तेजी से बढ़ रही है। 

विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे बुद्धिजीवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, छात्र-युवा, किसान-मजदूर, सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, यहां तक कि पत्रकारों को भी यूएपीए कानून लगाकर प्रताड़ित किया जा रहा है। 

नागरिकों की निजता खतरे में है। क्रोनी कैप्टलिज्म एवं जाति धर्म के नाम पर विभाजन की राजनीति ने हमारी आजादी को खतरे में डाल दिया है। संविधान और लोकतंत्र को कमजोर किया है। पूंजीवादी विकास के चलते जल, जंगल, जमीन के परंपरागत हक से आदिवासी वंचित हो रहे हैं। 

ज्योतिबा फुले, अंबेडकर, भगत सिंह व गांधी के वैचारिक विरासत को बचाने के लिए सांप्रदायिक कॉरपोरेट गठजोड़ के खिलाफ हमें बाबा साहेब की जयंती पर अपनी आजादी, संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के लिए साझा संघर्ष तेज करने का संकल्प लेना होगा। (लेखक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिवमंडल सदस्य हैं।)

Newsletter

Subscribe to our website and get the latest updates straight to your inbox.

We do not share your information.

abnnews24

सच तो सामने आकर रहेगा

टीम एबीएन न्यूज़ २४ अपने सभी प्रेरणाश्रोतों का अभिनन्दन करता है। आपके सहयोग और स्नेह के लिए धन्यवाद।

© www.abnnews24.com. All Rights Reserved. Designed by Inhouse