पाप पुंज से भरे, लदे
डहे हुए से हम
मन की चंचलता
पाप-पुण्य से बंधे हुए से हम
कुछ करते, कुछ सोचते
कुछ करने को तैयार मन
बुद्धि कलियुगी भटकाती
बिलगाती और रुलाती
भाग दौड़कर थकते-थकते
मन को भाता अंधकारमय कोठरी
असहज हो बंद आखें
कथित नींद में क्या नहीं पाते
अंतहीन दुख और सुख
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