भारतीय राजनीति के भीष्म : अटल, सदैव अटल...

 

एनके मुरलीधर

एबीएन एडिटोरियल डेस्क। राजनैतिक जीवन में शुद्धता की, मूल्यों की, आदर्श के सामने राजसत्ता को छोटा गिनने की या सिद्धांतों पर अडिग रहकर न झुकने, न समझौता करने के आदर्श को जीने वाले महानायक एवं शासन में सुशासन के प्रेरक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर को भारत सरकार प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाती है। भारतीय राजनीति के महानायक, अजातशत्रु, हिंदी कवि, पत्रकार, प्रखर वक्ता एवं भारतीय जनता पार्टी के 96 वर्षीय दिग्गज नेता, अटल विहारी वाजपेयी ने न केवल देश के लोगों का दिल जीता है, बल्कि विरोधियों के दिल में भी जगह बनाकर, अमिट यादों को जन-जन के हृदय में स्थापित कर हमसे जुदा हुए थे। 

उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर के मूल निवासी पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे। वहीं शिंदे की छावनी में 25 दिसंबर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में उनकी सहधर्मिणी कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटलजी का जन्म हुआ था। महात्मा रामचंद्र वीर द्वारा रचित अमर कृति विजय पताका पढ़कर अटलजी के जीवन की दिशा ही बदल गयी। छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ तो पढ़ा ही, साथ-साथ पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलतापूर्वक करते रहे। अटलजी ने किशोर वय में ही एक अद्भुत कविता लिखी थी- हिंदू तन-मन हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू मेरा परिचय, जिससे यह पता चलता है कि बचपन से ही उनका रुझान देश हित, राष्ट्रीयता एवं हिंदुत्व की तरफ था। 

राजनीति के साथ-साथ समष्टि एवं राष्ट्र के प्रति उनकी वैयक्तिक संवेदनशीलता, जिजीविषा, व्यापक दृष्टि आद्योपांत प्रकट होती ही रही है। उनके संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियां, राष्ट्रव्यापी आंदोलन, जेल-जीवन आदि अनेक आयामों के प्रभाव एवं अनुभूति से जुड़े विचार उनके काव्य में सदैव ही दिखाई देते थे। अटल विहारी वाजपेयी ने पांच दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, केंद्रीय विदेश मंत्री व प्रधानमंत्री- पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे, अनूठे रहे। घाल-मेल से दूर। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। भारत सरकार ने सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से उनको अलंकृत किया।  वाजपेयी बेहद नम्र इंसान थे और वह अंहकार से कोसों दूर थे। उनके प्रभावी एवं बेवाक व्यक्तित्व से पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू भी प्रभावित थे और उन्होंने कहा था कि अटलजी एक दिन भारत के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। 

आज भारतीय जनता पार्टी की मजबूती का जो धरातल बना है, वह उन्हीं की देन है। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वे इसे अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताते थे। 1980 में वे भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे। वे नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक। 1962 से 1967 और 1986 में वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे। वे संसद में बहुत प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं और महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके भाषण खासे गौर से सुने जाते रहे हैं, जो भारत के संसदीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है। 

अटल विहारी वाजपेयी 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वे लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के साझा घोषणापत्र पर लड़े गये और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली। एनडीए का नेतृत्व करते हुए मार्च 1998 से मई 2004 तक, छह साल भारत के प्रधानमंत्री रहे। 

इस दौरान उनकी सरकार ने 11 और 13 मई 1998 को पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश घोषित कर दिया। इस कदम से उन्होंने भारत को निर्विवाद रूप से विश्व मानचित्र पर एक सुदृढ़ वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। यह सब इतनी गोपनीयता से किया गया कि अति विकसित जासूसी उपग्रहों व तकनीकी से संपन्न पश्चिमी देशों को इसकी भनक तक नहीं लगी। यही नहीं इसके बाद पश्चिमी देशों द्वारा भारत पर अनेक प्रतिबंध लगाये गये लेकिन वाजपेयी सरकार ने सबका दृढ़तापूर्वक सामना करते हुए आर्थिक विकास की ऊचाइयों को छुआ। उन्होंने पडौसी देश पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सौहार्दपूर्ण बनाने की दृष्टि से भी अनेक उपक्रम किये। 19 फरवरी 1999 को सदा-ए-सरहद नाम से दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू की गई। कुछ ही समय पश्चात पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ की शह पर पाकिस्तानी सेना व उग्रवादियों ने कारगिल क्षेत्र में घुसपैठ करके कई पहाड़ी चोटियों पर कब्जा कर लिया। अटल सरकार ने पाकिस्तान की सीमा का उल्लंघन न करने की अंतर्राष्ट्रीय सलाह का सम्मान करते हुए धैर्यपूर्वक किंतु ठोस कार्यवाही करके भारतीय क्षेत्र को मुक्त कराया।  

दुनिया के सबसे बड़ी सड़क परियोजना स्वर्णिम चर्तुभुज का निर्माण कर पूरे देश को एक विश्व स्तरीय सड़क से जोड़ने का काम किया। आज वह सड़क देश के विकास में अहम भूमिका निभा रही है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से देश के पांच लाख गांवों के विकास को मानों पंखअटल विहारी वाजपेयी चाहे प्रधानमन्त्री के पद पर रहे हों या नेता प्रतिपक्ष- बेशक देश की बात हो या क्रान्तिकारियों की, या फिर उनकी अपनी ही कविताओं की, नपी-तुली और बेवाक टिप्पणी करने में अटलजी कभी नहीं चूके।

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