एबीएन एडिटोरियल डेस्क (डॉ अशोक नाग)। विगत दिनों की बरसात में देश के शहरों में बाढ़ और जल जमाव की स्थिति भयावह हो गयी है। सौभाग्य से झारखंड एक ऐसा राज्य है जो पठारी होने के कारण बाढ़ की समस्या से मुक्त है। लेकिन विगत कुछ वर्षो से होने वाले जलवायु परिवर्तन और शहरों के बिना किसी योजना के विकास के कारण हमारी रांची में जल जमाव और बाढ़ की स्थिति देखी जा रही है। अगर ध्यान से सोचा जाए तो रांची में ड्रेनेज सिस्टम नाम की कोई चीज है ही नहीं। अगर ऐसी स्थिति रही तो आने वाले समय में हमें भारी कठिनाई का सामना करना होगा। जैसी की खबर आ रही है कि हमारी नदियों के किनारे पर पूर्ण अतिक्रमण हो चुका है। जमशेदपुर में बाढ़ से सैकड़ों घर डूब चुके हैं। अब इस बार की बरसात को ही देखें। झमाझम वारिश बीते 3-4 दिनों से रांची में हो रही है और रांची के अधिकांश शहरी इलाके में बाढ़ जैसी हालात हो गये हैं। आज तक करीब 1200 करोड़ खर्च करके भी पठारी इलाके रांची में बाढ़ के हालात पैदा हो गये हैं। पुराने लोगों से पूछिये आज से 25-30 साल पहले जब आज के जैसा बिना प्लानिंग का शहर नहीं पनपा था, घनघोर बारिश के आधे घंटे में ही पूरी रांची और साफ होकर पानी अपना रास्ता ढूंढ़ता स्वर्णरेखा नदी में मिल जाता था, पानी के निकासी के अपने रास्ते थे। हिनू पुल, डोरण्डा पुल, कोकर डिस्टलरी पुल, कांके पुल, चुटिया पुल, करमटोली पुल, बरियातु रोड, कलवेट, आदि का निर्माण ही पानी को सुगमता से निकालने के लिए हुआ था। सभी तालाब आपस में जुड़े थे। उदाहरण के लिए भुतहा तालाब (वर्तमान जयपाल सिंह स्टेडियम), जेल तालाब, लालपुर तालाब, गुदड़ी तालाब सभी एक दूसरे से जुड़े थे। पानी निकासी का स्थान नियत था, आज भी देखें तो जिन इलाकों में जल निकासी के स्थानों को भरकर फ्लैट, अपार्टमेंट, घर जोे अधिकांश बिना रजिस्ट्री, म्यूटेशन के हैं, में ही पानी अधिक जमता है और बाढ़ की स्थिति आ जाती है। जयपाल सिंह स्टेडियम के ऊपर अपर बाजार की स्थिति देखिए, कोकर, लालपुर की स्थिति देखिए, बरियातु, मोराहाबादी, हरिहर सिंह रोड की स्थिति देखिए कमोवेश पूरी रांची की स्थिति दिनोदिन नारकीय होती जा रही है। इसके जिम्मेवार कौन हैं? आज के दिन भी रांची नगर निगम के 2037 मास्टर प्लान को अपने मोबाइल में खोलिए इसमें पानी निकासी के रास्ते प्लाट नं0 सहित दिखाई देंगे, पर उन प्लॉटों पर अवैध मकान बनकर तैयार हैं जिसके कारण पानी निकासी के रास्ते अवरूद्घ होते हैं और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। रांची नगर निगम बिना प्लानिंग के करोड़ों रूपये खर्च करता है और सिर्फ पक्की नालियों का निर्माण, बिना ये समझे कि पानी कहां जायेगा? तालाब जीर्णोद्घार के नाम पर तालाब का सीमेंटीकरण कर तालाब को सिमेंट का हॉज बनाया जा रहा है। हम बरसात में बाढ़ सदृश्य विभीषिका झेलते हैं और उसको अपनी नियति समझते हैं, पर सच्चाई यह है कि यह कुछ अदूरदर्शी प्रशासनिक अधिकारियों और प्लानर की करस्तानी है। 1200 करोड़ में स्थिति सुधार नहीं सके, इन सबकी मंशा, नियत और क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। इन सबका हल आज भी कठिन नहीं है, आवश्यकता है ईमानदार और सख्त पहल की। भगवान बिरसा मुण्डा की समाधि कोकर में डिस्टलरी पुल के पास क्यों है? कभी सोचा इसके बारे में, इसका कारण है कि जब भगवान बिरसा की मृत्यु कारागार में हुई तो लोगों में आक्रोश दंगा न फैले, इसलिए रातों-रात उनके शव को डिस्टलरी पुल के समीप फेंक दिया गया, ताकि जलप्रपात के रूप में बहते करम नदी से होकर भगवान बिरसा का शव स्वर्णरेखा नदी में मिल जाए? आज वहां क्या स्थिति है, वर्षों साल पहले बने डिस्टलरी पुल को ढहा कर करम नदी, जिससे मोराहाबादी, बरियातु, लालपुर, मेन रोड का पानी निकलता था, के मुहाने पर नगर निगम द्वारा पार्क बना दिया गया जो हर बरसात में डूब जाता है। करमटोली तालाब से होकर बहने वाली करम नदी का अस्तित्व ही अवैध निर्माण कर खत्म कर दिया गया है। जबकि आज भी मास्टर प्लान 2037 जो रांची नगर निगम के वेबसाईट में उपलब्ध है में पानी निकासी या पानी का इलाका करमटोली चौक से होकर डिस्टलरी पुल दिखा रहा है। कौन है जिम्मेवार? प्रशासनिक अक्षमता का खामियाजा जनता क्यों भुगते। हमारी रांची शहर के हर पानी निकासी इलाकों को धड़ल्ले से बेचा जा रहा और अवैध निर्माण कर पानी निकासी के रास्ते को अवरूद्घ कर बाढ़ की स्थिति लाई जा रही है। इन सबका समाधान क्या है? इन सबका समाधान है दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्लानिंग कर कठोरता के साथ उसे लागू कराना। इन उपायों को तुरंत करें : पूरे शहर का पानी जिन जगहों से निकलता हो उसे चिह्नित करें। (जैसे कोकर डिस्टलरी पुल से होकर, जुमार नदी से होकर, चुटिया नदी से होकर, स्वर्णरेखा नदी की ओर) पानी ट्रीटमेंट प्लान्ट उन स्थानों पर लगायें ताकि गंदा पानी साफ होकर नदी में जाए। निचली और ऊंची भूमि को चिह्नित करें और कम से कम 50 फीट पानी निकासी हेतु जमीन को चिह्नित कर अधिग्रहित करें और अतिक्रमण को बलपूर्वक हटाये जायें। इस मुख्य 50 फीट पानी निकासी हेतु जमीन में अतिक्रमण किसी कीमत पर न हो और 5 फीट दोनों तरफ वृक्ष लगाए जायें। इस मुख्य 50 फीट निकासी हेतु जमीन को शहर की हर नालियों से जोड़ा जाए। जहां नाली सम्भव न हो वहां पाइपलाईन बिछायी जाए, पर टोपोग्राफी (ऊंची-नीची जमीन की माप) का विशेष ध्यान रखा जाए। इन 5 बिन्दुओं पर ही अमल कर हम अपनी पठारी रांची में बाढ़ आने से बचा सकते हैं। उपाय आसान है पर दृढ़-इच्छाशक्ति और सही प्लानिंग कर ही हम अपनी रांची को फिर से पुरानी रांची बना सकते हैं। रांची की स्वर्णरेखा, हरमू, पोटपोटो सहित सभी नदियों के तट पर वृक्षारोपण होने के साथ ही गंदे पानी नदियों में डाले जाए इसके लिये भी व्यवस्था हो जाए। यह सही सिस्टम से ही संभव है। (लेखक समाजसेवी, पर्यावरणविद हैं।)
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